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Khabaron Ke Khiladi: क्या 2027 को ध्यान में रखकर इस बार उत्तर प्रदेश के उपचुनाव से पीछे हट गई कांग्रेस?
Sat, 26 Oct 2024 04:12 PM IST
शिव शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिव शुक्ला
Updated Sat, 26 Oct 2024 04:12 PM IST
सार
Uttar Pradesh Bypolls: कांग्रेस ने तमाम अटकलों को विराम देते हुए उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में मैदान से हटने का फैसला किया। कहा गया कि जिस तरह हरियाणा चुनाव में अखिलेश यादव ने मैदान में न उतरने की राहुल गांधी की बात मानी, उसी बात का सम्मान रखते हुए कांग्रेस ने उपचुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया, लेकिन क्या कांग्रेस का यह फैसला सही है?
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खबरों के खिलाड़ी।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी 37 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। वहीं, कांग्रेस भी एक से बढ़कर छह सीट पर पहुंच गई। इसके बाद माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश की नौ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में कांग्रेस कम से कम दो सीटों पर तो चुनाव जरूर लड़ेगी। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस ने उपचुनाव में यूपी के मैदान से हटने का निर्णय ले लिया। कांग्रेस का यह निर्णय उसे फायदा पहुंचाएगा या नुकसान, इस बार खबरों के खिलाड़ी में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, राकेश शुक्ला और समीर चौगांवकर मौजूद थे।
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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कहां पीछे रह गई?
समीर चौगांवकर: उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में कांग्रेस पांच सीटों पर लड़ना चाहती थी। अखिलेश ये सीटें देने के मूड में नहीं थे। इन सीटों पर कांग्रेस की कभी पकड़ नहीं रही। उसे पता था कि वह लड़ती तो उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो जाती। लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा इस उपचुनाव को महत्वपूर्ण मान रही है। वह किसी भी सीट पर जोखिम नहीं उठाना चाहती। इसलिए उसने सोच-समझकर उम्मीदवार तय किए हैं।
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क्या कांग्रेस का यह फैसला सही माना जाए?
राकेश शुक्ला: 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 400 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन जमानतें जब्त हो गईं। कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं को यह दिखाने के लिए सपा पर इस बार दबाव बनाया कि वह भी दौड़ में है। कांग्रेस 2027 में सौदेबाजी का मौका गंवाना नहीं चाहती, इसलिए वह उपचुनाव में पीछे हट गई। उसमें उसकी बुद्धिमानी ही है। उधर, भाजपा के लिए यह उपचुनाव महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि चुनौतीपूर्ण हैं। 2027 से पहले योगी आदित्यनाथ यह संदेश देना चाहते हैं कि अगर उनकी पसंद के उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं तो उनके चुनाव जीतने की संभावना ज्यादा रहेगी। सपा और कांग्रेस को अपनी-अपनी हैसियत पता है। सपा जानती है कि हरियाणा में अगर उसे कुछ सीटें कांग्रेस दे भी देती तो वो कितनी सीटें जीत पाती।
अवधेश कुमार: चुनौती दोनों तरफ है। उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में 2024 के लोकसभा चुनाव का नरैटिव कायम है या नहीं, यह पता चलेगा। उधर, कांग्रेस का उपचुनाव से पूरी तरह पीछे हट जाना सही नहीं है। पहला द्वंद्व यह है कि सपा मानती है कि हमने कांग्रेस को आगे बढ़ने दिया तो यह हमारे लिए खतरा बनेगी। 2019 में राहुल गांधी जब वायनाड गए तो वो मुस्लिम वोटरों को संदेश देने के लिए वहां गए। दूसरा द्वंद्व यह है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस यह मानती है कि सपा उसकी ताकत भले ही न हो, लेकिन गठबंधन में साथ रहने से कांग्रेस के मुस्लिम वोट सपा को मिलते रहेंगे। इसके बदले में कांग्रेस उपचुनाव में एक-दो सीटें लड़ने के लिए मांग सकती थी।
सपा के सामने क्या चुनौती है?
विनोद अग्निहोत्री: कांग्रेस के सामने दुविधा यह है कि उसे राष्ट्रीय राजनीति में सपा का समर्थन चाहिए और उत्तर प्रदेश में जमीन भी चाहिए। कांग्रेस ने यह सही निर्णय किया कि वह उपचुनाव में नहीं उतरेगी। कांग्रेस ने यह संदेश दे दिया कि हम मैदान से हट गए हैं, अब सपा सभी सीटें जीतकर दिखाए। अगर परिणाम सपा के पक्ष में नहीं आते तो कांग्रेस यह कहने की स्थिति में रहेगी कि लोकसभा चुनाव में साथ लड़ने से नतीजे बेहतर रहे, लेकिन कांग्रेस ने चुनाव नहीं लड़ा तो वोट बिखर गया।
रामकृपाल सिंह: कांग्रेस की राजीव गांधी के समय से नीति रही कि वह भाजपा को रोकने के लिए कुछ भी त्याग करने को तैयार रहेगी। यही उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में दिख रहा है। जब आप चुनाव ही नहीं लड़ेंगे तो कार्यकर्ता कहां जाएगा। अगर नेताओं के कहने से वोटर मिल जाता तो मायावती-अखिलेश के हाथ मिलाने से वोटर एकजुट क्यों नहीं हो पाया? कांग्रेस बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, सब जगह सीटें छोड़ रही है। कांग्रेस किस दौर में है, पता नहीं। कांग्रेस का वोट बैंक जिन दलों ने छीन लिया, वह अब उन्हीं के भरोसे है। कांग्रेस यह भूल जाती है कि जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, बिहार जैसे राज्यों में उसे बेदखल करने वाली पार्टी भाजपा नहीं, बल्कि वही क्षेत्रीय दल हैं, जिनके साथ उसने आज हाथ मिला रखा है। अगर वह क्षेत्रीय दलों के सामने ही कमजोर है, तो वह कैसे राष्ट्रीय विकल्प बनेगी। इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस सरकारें गिराने की हैसियत रखती थी, राजीव गांधी के समय से कांग्रेस की भूमिका सिर्फ भाजपा को रोकने वाली हो गई है।