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Khabaron Ke Khiladi: निकाय चुनाव में भाजपा की बंपर जीत के क्या मायने? विश्लेषकों ने बताया किसे क्या हुआ हासिल

Sat, 17 Jan 2026 09:02 PM IST
संध्या न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: संध्या Updated Sat, 17 Jan 2026 09:02 PM IST
सार

महाराष्ट्र निकाय चुनाव में भाजपा गठबंधन को बड़ी जीत मिली। वहीं लंबे समय तक यहां राज कर रही शिवसेना को भी उखाड़ फेंका। आज इसी पर चर्चा की आखिर भाजपा गठबंधन की इतनी बड़ी जीत के क्या मायने हैं। 

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Khabaron Ke Khiladi What do BJP's landslide victories in the local body elections mean
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजे शुक्रवार को आ गए। राज्य की 29 महानगर पालिकाओं में से अधिकांश में भाजपा सबसे बड़ा दल बनकर उभरी है। राज्य की 2869 वार्डों में से 1441 में पार्टी को जीत मिली है। यहां तक की राज्य की सबसे बड़ी महानगर पालिका बीएमसी में भी भाजपा ने करीब तीन दशक से चला आ रहा शिवसेना का दबदबा भी खत्म कर दिया। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इन्हीं नतीजों का विश्लेषण किया गया। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, राकेश शुक्ल, पूर्णिमा त्रिपाठी, अजय सेतिया और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 

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अनुराग वर्मा: विरासत वाली सियासत के खात्मे की शुरुआत उसी दिन हो गई थी, जब संजय राऊत ने उद्धव ठाकरे को कांग्रेस के साथ गठबंधन कराया। चाहे ठाकरे परिवार की राजनीति हो या पवार परिवार की राजनीति, महाराष्ट्र में इन परिवारों की राजनीति अब खत्म हो गई है। अब महाराष्ट्र में राष्ट्रीय राजनीति वाले दलों की राजनीति होगी। 

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अजय सेतिया: उद्धव और राज के पास कोई विकल्प भी नहीं था, कि वो दोनों साथ आते और मराठी मानुस की बात करते। ये चुनाव यह संदेश दे रहे हैं कि वोटों की ठेकेदारी अब नहीं चलेगी। अब ऐसा दिखने लगा है कि मुसलमान हों या पिछड़े सब ने इन ठेकेदारों से दूरी बना ली है। अब ये अपने बीच के नेता को चुनना चाह रहे हैं।  

पूर्णिमा त्रिपाठी: राज ठाकरे जिस दिन से उद्धव के साथ आए, उसी दिन से गैर मराठियों के साथ भय की राजनीति शुरू हो गई थी। राज ठाकरे की ओल्ड स्टाइल मराठी मानुस वाली राजनीति देखकर गैर मराठियों ने उद्धव की पार्टी से दूरी बना ली। इसका उद्धव को नुकसान हुआ। भाजपा ने इसका भरपूर फायदा उठाया। भाजपा ने हर जगह अच्छा प्रदर्शन किया है। हालांकि, उद्धव की पार्टी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। शिंदे के पास शिवसेना का सिंबल है तो ऐसा हो सकता है कि आने वाले समय में ठाकरे के साथ जो वोट रहता था वो शिंदे के साथ चला जाए। 

राकेश शुक्ल: मुंबई में विकास के काम हुए हैं, उसका असर इस चुनाव में पड़ा है। देवेंद्र फडणवीस की रणनीति ऐसी थी जिसे विपक्षी भी नहीं समझ पाए, न ही उनके सहयोगी समझ पाए। इसी का नतीजा है आज पूरे महाराष्ट्र में देवा भाऊ के पोस्टर लगे हुए दिख रहे हैं। जहां तक बात महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की है तो दोनों राज्यों की स्थिति अलग है। इसलिए दोनों की तुलना इस तरह से नहीं की जा सकती है। 

विनोद अग्निहोत्री: मुझे लगता है कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे दोनों मिलकर अपने पिता और चाचा की विरासत बचाने में सफल रहे। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे का वोट तो एक ही है। पार्टी टूट गई, एकनाथ शिंदे पार्टी की सिंबल ले गए। अधिकांश पार्षद अपने साथ ले गए। उनमें से ज्यादातर हार गए। इस चुनाव में उन्होंने अपने कोर वोट को सिक्योर किया है। मुझे लगता है अब मुंबई में शिवसेना और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई होगी।

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