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Khabaron Ke Khiladi: संसद में धक्कामुक्की तक आई बात, क्या शत्रुता में बदल चुके हैं सियासी मतभेद?

Sat, 21 Dec 2024 09:27 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Sat, 21 Dec 2024 09:27 PM IST
सार

इस हफ्ते के ‘खबरों के खिलाड़ी’ में संसद सत्र के आखिरी दिन हुए हंगामे पर चर्चा हुई। 

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Khabaron Ke Khiladi: matter even reached scuffle in Parliament, political differences turned into hostility?
खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संसद का शीतकालीन सत्र शुक्रवार को समाप्त हो गया। सत्र के आखिरी दिन जमकर हंगामा हुआ। पक्ष-विपक्ष के बीच जारी गतिरोध धक्कामुक्की तक पहुंच गया। इन सबके केंद्र में संविधान निर्माता बीआर आंबेडकर रहे। इस हफ्ते के ‘खबरों के खिलाड़ी’ में इसी पर चर्चा हुई।  चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, राकेश शुक्ल, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 

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पूर्णिमा त्रिपाठी: जो भी हुआ वह कहीं से भी न्यायसंगत नहीं बताया जा सकता है। संसद की गरिमा तार-तार हुई है। संविधान पर जो बहस हुई वह काफी अच्छी रही है। लेकिन, सत्र के अंत में जो कुछ भी हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण है। संसद में मसल पावर की कोई जगह नहीं है। संविधान की चर्चा के दौरान जिस तरह का माहौल बन गया था, गृह मंत्री का भाषण खत्म होने तक जो माहौल बन गया था, उसके बाद कुछ न कुछ होना था। जो इस रूप में सामने आया। संसद का सत्र बेशक खत्म हो गया है लेकिन ये हंगामा फिलहाल खत्म होता नहीं दिख रहा है। इसे लेकर दोनों तरफ से राजनीति होगी। 
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अवधेश कुमार: हमें इस स्थिति से ऊपर उठना होगा कि हम किसके साथ हैं या किसके विरोध में हैं। कम से कम संसद के परिसर में यह स्थिति पैदा होगी सांसदों के बीच हिंसा होगी। सांसद घायल होंगे और विपक्ष के नेता पर ऐसे आरोपों में मामला दर्ज होगा। फिर विपक्ष के सांसद भी इस तरह का मामला दर्ज कराएंगे। इसके बारे में किसी ने नहीं सोचा होगा। जब राजनीति सामान्य मतभेद से उठकर शत्रुता और घृणा में परिवर्तित हो जाएगी तो वह कहां जाएगी इसके बारे में कल्पना नहीं की जा सकती है। 
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अनुराग वर्मा: यह ऐसा मामला था कि इस पर दोनों ओर से वीडियो क्लिप आएंगी, लेकिन जो घटनाक्रम रहा है उसे देखें तो इस बार का सत्र कई मायने में नई तरह का था। नेहरू गांधी परिवार का एक बहुप्रतिक्षित चेहरे का संसद में प्रवेश हुआ। प्रियंका ने अपने पहले भाषण में जो समझदारी दिखाई उस पर राहुल गांधी ने एक तरह से पानी फेर दिया। मुझे शक है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि यह एक सोची समझी रणनीति हो कि बहन एक तरह से बात करेंगी और भाई एक तरह से बात करेंगे। जिससे कैडर एक्टिवेट हो। हालांकि, कैडर एक्टिवेट हुआ या नहीं यह तो समय बताएगा। कहीं न कहीं राहुल गांधी को यह समझना पड़ेगा कि सदन के अंदर एक्टिविस्ट मत बनिए।

राकेश शुक्ल: 18वीं लोकसभा में सबसे ज्यादा शिक्षित सांसद चुनकर आए हैं। शिक्षित सांसदों के बीच में जो सबसे बड़ा विषय था वो संविधान था। लेकिन, देखने को जो मिल रहा है और जो घटना हुई उसने नेताओं की छवि को धूमिल किया है। नेताओं को यह प्रयास करना होगा कि नई पीढ़ी का राजनीति की तरफ रुझान बढ़े। दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहला कि प्रताप सारंगी गिरे और उन्हें चोट आई। दूसरी बात इस घटना के बाद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह बिलकुल नहीं कहा कि उन्होंने किसी सांसद ने धक्का नहीं मारा। रही बात राजनीति कि तो दोनों तरफ से आंबेडकर को हाईजैक करने की होड़ चल रही है। क्योंकि आंबेडकर वोट बैंक का प्रतीक हो चुके हैं। 

समीर चौगांवकर: संसद ही नहीं संसद के बाहर भी पार्टियों का व्यवहार कटुता के ऐसे स्तर पर चला गया है। भाजपा को लोकसभा चुनाव में जिस तरह का नुकसान हुआ, उसी डर के चलते अमित शाह को सामने आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ी। मुझे लगता है कि जैसे ही धक्कामुक्की वाली बात आई वैसे ही लोकसभा सचिवालय को घटना का वीडियो जारी करना चाहिए था। जिससे सारी बात साफ हो जाती। आंबेडकर के मामले में दोनों पक्ष वोट बैंक की राजनीति साधने की कोशिश कर रहे हैं। 


विनोद अग्निहोत्री: पिछले कई वर्षों से मैं यह बात कह रहा हूं कि लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष विरोधी नहीं होते बल्कि दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंदी होते हैं। पिछले कुछ वर्षों से जो शत्रुता का भाव विकसित हुआ है वो इसकी वजह है। जहां तक इस घटना की बात है तो सच्चाई सीसीटीवी से पता चलेगी। जब सत्ता पक्ष भी जवाबी कार्रवाई करेगा तो इस तरह की घटनाएं बढ़ेंगी। कोई भी एक पक्ष अपनी जिद को छोड़ देता तो ये घटना नहीं होती। चेयर और संसदीय कार्यमंत्री सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सेतु का काम करते हैं। वो व्यवस्था अब खत्म सी हो गई है।

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