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Khabaron Ke Khiladi: क्या साथ आएंगे राज और उद्धव ठाकरे? विश्लेषकों ने बताया ये मजबूरी या मास्टर स्ट्रोक

Sat, 21 Jun 2025 09:25 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 21 Jun 2025 09:25 PM IST
सार

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे को अलग हुए वर्षों हो चुके हैं। हालांकि, बीते दिनों में दोनों के साथ आने की अटकलें लगती रही हैं। हाल ही में दोनों भाइयों की तरफ से इसे लेकर संकेत भी दिए गए हैं। ‘खबरों के खिलाड़ी’ में इस हफ्ते इसी पर चर्चा हुई।

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Khabaron Ke Khiladi Maharashtra Politics Uddhav Thackeray Raj Thackeray Shivsena UBT MNS Expert Analysis
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

महाराष्ट्र की सियासत में सियासी हलचल जारी है। शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के साथ आने की सुगबुगाहट है। वही, मनसे के नेताओं को सत्ता पक्ष के साथ भी देखा जा रहा है। इसी तरह उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे एक दूसरे पर जमकर हमले कर रहे हैं। बीएमसी चुनाव से पहले इस सियासी हलचल के क्या मायने हैं? दोनों भाइयों के साथ आने पर बीएमसी के चुनाव में क्या असर पड़ सकता है? इसी तरह के सवालों पर इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, समीर चौगांवकर, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी और अवधेश कुमार मौजूद रहे। 
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समीर चौगांवकर: महाराष्ट्र की राजनीति की जब भी बात होती है, खासतौर पर मुंबई की राजनीति की बात होती है तो ठाकरे परिवार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। चाहे वो उद्धव ठाकरें हों या राज ठाकरे हों। राज ठाकरे भले नहीं जीतें, लेकिन कई सीटों पर उनके उम्मीदवार दूसरे दलों को हराने में अहम भूमिका निभाते हैं। बीएमसी के चुनाव होने वाले हैं। लंबे समय से शिवसेना का बीएमसी में दबदबा बना रहा है। उद्धव और राज दोनों के पास कुछ नहीं है। कॉरपोरेशन के चुनाव में चार-पांच सौ वोट भी बहुत मायने रखते हैं। अगर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे जुट जाते हैं तो बीएमसी में ठाकरे परिवार का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है। 

अवधेश कुमार: राज ठाकरे के पार्टी 2006 में बनी थी। उसके बाद 2009 के चुनाव में उनकी पार्टी को 13 सीटें मिली थीं। उसके बाद से राज ठाकरे की पार्टी ने किसी भी चुनाव में ऐसा प्रदर्शन नहीं किया, जिससे कोई पार्टी उन्हें अपने साथ लेने की कोशिश करे। राज ठाकरे की राजनीति का आधार बाला साहेब ठाकरे की राजनीति थी। लेकिन, शुरुआत के बाद ये पार्टी लगभग समाप्त हो गई। राज ठाकरे बाला साहेब के भतीजे हैं। अगर उसे हटा दें तो उनकी पार्टी लगभग नष्ट प्राय है। राज ठाकरे का भाजपा से लगातार संवाद रहा है लेकिन, उत्तर भारतीयों पर उनके हमले उन्हें भाजपा के साथ आने में बाधा हैं। 
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विनोद अग्निहोत्री: यह मजबूरियां और विवशता जो है वही दोनों को करीब ला रही है। यह बात सही है कि राज ठाकरे की राजनीति अवसरवाद की राजनीति रही है। 2009 और 2014 में उन्होंने भाजपा के साथ जाने की कोशिश की थी। वहीं, 2019 के चुनाव में वो भाजपा पर बेहद आक्रामक रहे। उस दौर में कहा जाता था कि वो शरद पवार के टच में हैं। वहीं, 2024 में फिर से उनकी नजदीकियों की बात भाजपा के साथ कही गई। ठाकरे परिवार का मुंबई में सबसे ज्यादा प्रभाव रहा है। मौजूदा स्थिति में ठाकरे परिवार मुंबई को तभी अपने पास रखने की उम्मीद कर सकता है जब दोनों साथ आएं। मुझे दोनों के साथ आने की संभावना दिख रही है। क्योंकि दोनों की मजबूरी है। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: दोनों भाइयों के सामने अस्तित्व का संकट है। शिवसेना का भी प्रदर्शन विधानसभा चुनाव में कुछ खास नहीं रहा है। पार्टी का नाम और निशान एकनाथ शिंदे को दिया गया है। इस स्थिति में उद्धव को लग रहा है कि राज ठाकरे के साथ आने पर शायद उस शिवसेना को पुनर्जीवित कर सकेंगे, जो राज ठाकरे के वक्त शिवसेना थी। दोनों को यह महसूस हो रहा है कि ठाकरे विरासत के नाम पर जो एक मजबूत विरासत है, वे दोनों के साथ आने से मुंबई और आसपास के इलाकों में काफी फायदा होगा। हालांकि, उद्धव ठाकरे अगर राज ठाकरे के साथ जाते हैं तो इंडिया गठबंधन के साथ उनका भविष्य नहीं बचेगा। इसलिए उद्धव ज्यादा व्याकुल दिख रहे हैं। 

रामकृपाल सिंह: कोई भी पार्टी हो उसके लिए दो चीजें जरूरी होती हैं। पहला सत्ता और दूसरा माया। सत्ता अभी दूर दिखाई दे रही है तो माया की जरूरत पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है। बीएमसी का बहुत बड़ा बजट होता है। शिवसेना वहां लंबे समय तक रही है। वही कोशिश है कि दोनों साथ आएंगे तो जीत न भी पाएं तो एक बड़ी ताकत जरूर बन जाएंगे।
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