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Khabaron Ke Khiladi: रायबरेली-अमेठी से कांग्रेस उम्मीदवार चुनने में इतनी देरी क्यों? बता रहे खबरों के खिलाड़ी

Sat, 04 May 2024 09:15 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 04 May 2024 09:15 PM IST
सार

बीते हफ्ते अमेठी और रायबरेली सीट पर कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम के एलान को लेकर अटकलें लगती रहीं। आखिरी दिन तक यह साफ नहीं था कि आखिर इन सीटों पर कौन उम्मीदवार है।

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Khabaron Ke Khiladi Discuss Politics of Rae Bareli Lok Sabha Seat Congress Delay or Strategic Plan
रायबरेली-अमेठी से कांग्रेस उम्मीदवार चुनने में इतनी देरी क्यों हुई - फोटो : amar ujala graphics

विस्तार

राहुल गांधी ने शुक्रवार को रायबरेली लोकसभा सीट से नामांकन दाखिल किया। यह इस सीट से नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख थी। कांग्रेस ने ऐन वक्त पर इस सीट से राहुल को चुनावी मैदान में उतारने का फैसला किया। राहुल इससे पहले अमेठी से लड़ते रहे थे। वहीं, अमेठी से केएल शर्मा को टिकट मिला। इसी मुद्दे पर इस हफ्ते के 'खबरों के खिलाड़ी' में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, समीर चौगांवकर, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 
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सवाल- उम्मीदवारों के एलान में देरी को किस तरह देखते हैं?

रामकृपाल सिंह:
रायबरेली और अमेठी का नेहरू-गांधी परिवार से नाता रहा है, लेकिन इसके ये मायने नहीं हैं कि इन सीटों के जीतने से कांग्रेस का कायाकल्प हो जाएगा। 2014 में दोनों सीटें कांग्रेस ने जीती थीं। इसके बाद भी पार्टी का क्या हाल हुआ था, यह सभी को पता है। कोई परिवार, संस्था, पार्टी या कंपनी हो, उसमें अगर किसी व्यक्ति विशेष को तवज्जो दी जाने लगती है तो संगठन, पार्टी या संस्थान खत्म होने लगता है। अगर राहुल और प्रियंका, दोनों चुनाव लड़ते तो कहा जाता कि पूरा परिवार सांसद बनने के लिए लगा हुआ है। राहुल अमेठी से लड़ें या रायबरेली से लड़ें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह कहना कि अमेठी से राहुल भाग गए, ये सही नहीं है। 
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पूर्णिमा त्रिपाठी: यह कांग्रेस की रणनीति हो सकती है कि आखिरी समय में नाम का एलान किया गया। ये भी हो सकता है कि पार्टी के अंदर कुछ उहापोह रही हो। यह पार्टी के अंदर की बातें हैं, इसे हम कन्फर्म नहीं कर सकते। हालांकि, राहुल के रायबरेली से लड़ने से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल जरूर बढ़ेगा। अखिलेश यादव ने भी कन्नौज में आखिरी क्षण में जाकर नामांकन किया। 

सवाल- क्या राहुल का फैसला सही है?
अवधेश कुमार: क्या वाकई रायबरेली परिवार की ऐसी सीट है, जिसके लिए अमेठी को छोड़ा जाए? अगर पारिवारिक दृष्टि से देखें तो अगर अमेठी सीट से संजय गांधी लड़े। उनके बाद राजीव गांधी वहीं से लड़े। इसके बाद सोनिया गांधी को 1999 में अमेठी से लड़ाया गया। राहुल गांधी अमेठी से हारे, उसके बाद राहुल वहां कितनी बार गए। जिस सीट पर हारने के बाद आप वहां गए ही नहीं, उस सीट पर वह कैसे जाते?

अनुराग वर्मा: एक राष्ट्रीय नेता ने इतने लंबे समय तक इतना रहस्य बनाकर रखा और निकला क्या? यह कांग्रेस का स्ट्रैटेजिक लॉस है। पिछले चुनाव तक कांग्रेस में वो जो क्लेम करते थे वो दो सीटें होती थीं, अमेठी और रायबरेली। अब आगे उनका केवल एक सीट पर क्लेम रह जाएगा, रायबरेली। जिस तरह से राहुल गांधी ने अमेठी को छोड़ा, वो उनके एरोगेंस को दिखाता है। रायबरेली में राहुल का जीत पाना इतना भी आसान नहीं होगा। 2014 के बाद से रायबरेली सीट का वोटिंग पैटर्न काफी बदला है। 

समीर चौगांवकर: कांग्रेस चाहती होगी कि अमेठी या रायबरेली से गांधी परिवार से कोई ना कोई जरूर लड़े। अखिलेश यादव चाहते थे कि प्रियंका जरूर लड़ें। हालांकि, राहुल को लेकर उन्होंने ज्यादा कुछ नहीं कहा था। मुझे लगता है कि राहुल अगर वायनाड से लड़ रहे थे तो उन्हें रायबरेली से प्रियंका को उतारना चाहिए था। राहुल अमेठी से लड़ें या रायबरेली से लड़ें, यह उनका अपना फैसला है। नेता हमेशा चाहता है कि वह सुरक्षित सीट से लड़े। नेता अपनी सीट बदलते रहते हैं, इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। सुषमा स्वराज, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर अरुण जेटली तक ऐसे कई उदाहरण हैं। 


विनोद अग्निहोत्री: 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ से चुनाव लड़ रहे थे। अचानक समाजवादी पार्टी ने राज बब्बर को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। इसके बाद अटल जी ने गांधीनगर से नामांकन कर दिया। मुझे लगता है कि जिस दिन सोनिया गांधी ने रायबरेली छोड़ा था, उसी दिन तय हो गया था कि राहुल गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ेंगे। 

आज की तारीख में कांग्रेस प्रियंका का उपयोग उन तमाम सीटों पर कर रही है, जहां पार्टी लड़ रही है। वो पूरे देश में घूम रही हैं। अगर अमेठी से उन्हें उम्मीदवार बना दिया जाता तो वो वहां फंस जातीं क्योंकि स्मृति ईरानी कोई कमजोर उम्मीदवार नहीं हैं। किशोरी लाल शर्मा से बेहतर गैर गांधी उम्मीदवार अमेठी से नहीं हो सकता था। वो पिछले 40 साल से कांग्रेस के उम्मीदवार को अमेठी से लड़वा रहे हैं।
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