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Khabaron Ke Khiladi: दिल्ली चुनाव में बयानों पर बवाल, किसे नफा, किसका नुकसान; बता रहे हैं खबरों के खिलाड़ी

Sat, 11 Jan 2025 09:02 PM IST
श्वेता महतो न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: श्वेता महतो Updated Sat, 11 Jan 2025 09:02 PM IST
सार

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में अरविंद केजरीवाल को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। लोकसभा चुनाव में मुस्लिम और दलित मतदाताओं ने कांग्रेस का समर्थन किया। मतदान के बदले रुझान को देखते हुए सत्ताधारी दल- आम आदमी पार्टी समेत विपक्ष को भी नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ रही है। 'खबरों के खिलाड़ी' मंच पर दिल्ली की सियासत से जुड़े तमाम पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।

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Khabaron Ke Khiladi debate on Delhi assembly election 2025 BJP AAP Congress news in hindi
'खबरों के खिलाड़ी' मंच पर दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 से जुड़े पहलुओं पर चर्चा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली में चुनाव की तारीखें घोषित होने के साथ ही सियासी पारा चढ़ा हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के यूपी-बिहार के लोगों पर दिए बयान पर विवाद छिड़ा हुआ है। वहीं, जाट वोट पर भी सियासत हो रही है। इन सबके बीच भाजपा के पूर्व सांसद रमेश बिधूड़ी के प्रियंका गांधी के बयान पर भी जमकर बवाल हो रहा है।  इन सियासी बयानों के क्या मायने हैं? किस बयान से कौन से मतदाता को साधने की कोशिश हो रही है? इसी पर इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
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राकेश शुक्ल: यह पहला चुनाव है जिसमें अरविंद केजरीवाल सबसे ज्यादा संकट में दिख रहे हैं। लोकसभा चुनाव में जिस तरह से मुस्लिम और दलित कांग्रेस के साथ गए हैं, वो उन्हें भयभीत किए हुए है। 2015 और 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उस तरह से नहीं लड़ी थी। इस वजह से उन्हें (आप को) प्रचंड जीत मिली थी। दलित, मुस्लिम और पूर्वांचल-बिहार का वोटर करीब 40 फीसदी है। इन सभी को साधने की कोशिश केजरीवाल कर रहे हैं। 
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पूर्णिमा त्रिपाठी: केजरीवाल दो बार सरकार में रहे। पिछले करीब 11 साल से वो सत्ता में हैं। 11 साल में किसी भी सरकार के लिए एंटी इनकंबेंसी एक फैक्टर हो ही जाता है। उसी एंटी इनकंबेंसी ने केजरीवाल की चिंताएं बढ़ाई हैं। ये बात सच है कि 2015 और 2020 का चुनाव कांग्रेस लड़ी ही नहीं थी। इस बार कांग्रेस थोड़ी एक्टिव दिख रही है। बेशक कांग्रेस चाहे बहुत सीटें जीतने की स्थिति में नहीं दिख रही हो, लेकिन वो वोट काटने की स्थिति में दिख रही है। संकट भाजपा के पास भी है। हर कोई अपने संकट से कैसे निकलता है यह देखना होगा। 

समीर चौगांवकर: पिछले दो चुनाव अगर हम देखें तो केजरीवाल के दो कार्यकाल में भाजपा के पास कोई खास मुद्दा मिला नहीं था। इस बार पहली बार है जब भाजपा के पास मुद्दा है। और इन मुद्दों के चलते केजरीवाल पहली बार रक्षात्मक दिखाई दे रहे हैं। मुझे लगता है कि यह चुनाव मुख्य रूप से भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच ही होगा। 


अनुराग वर्मा: ये बात सही है कि भारतीय राजनीति में वोटर के लिए भ्रष्टाचार इतना बड़ा मुद्दा कभी नहीं रहा है। हमारे पास बड़े नेताओं के भ्रष्टाचार की पूरी सूची है, लेकिन केजरीवाल का मामला थोड़ा अलग है। उनकी पार्टी जो कह कर आई थी उससे जो यू-टर्न लिया, अगर भाजपा उसे मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है तो वह सही है। मुझे लगता है कि 70 में से 11 सीटें ऐसी थीं जो बहुत छोटे अंतर की थीं। वो 11 सीटें भाजपा और आप दोनों के लिए बहुत अहम होंगी। कांग्रेस किस तरह से चुनाव लड़ती है यह भी देखना होगा। अगर कांग्रेस मजबूती से चुनाव लड़ी तो इसका नुकसान आप को हो सकता है।  

अवधेश कुमार: शीशमहल पर जिस तरह की चर्चा हो रही है वो तो होनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या मुख्यमंत्री के आवास और प्रधानमंत्री आवास की तुलना होनी चाहिए या नहीं। यह एक बड़ा विषय है कि दिल्ली के बजट को देखिए, दिल्ली के आकार को देखिए, दिल्ली के मुख्यमंत्री के काम को देखिए और उनके ऊपर के खतरों के देखिए। फिर सोचिए क्या इतने बड़े भवन की आवश्यकता थी।
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