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Kerala HC: हाईकोर्ट का बच्चों के खतना को गैर-जमानती अपराध घोषित करने से इनकार, याचिका की खारिज

Wed, 29 Mar 2023 07:37 AM IST
वीरेंद्र शर्मा एएनआई, कोच्चि
एएनआई, कोच्चि Published by: वीरेंद्र शर्मा Updated Wed, 29 Mar 2023 07:37 AM IST
सार

जनहित याचिका को मुख्य न्यायाधीश एस मणिकुमार और न्यायमूर्ति मुरली पुरुषोत्तम की खंडपीठ ने खारिज की। कोर्ट ने कहा, अदालत कानून बनाने वाली संस्था नहीं है।

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Kerala HC dismisses PIL seeking to declare practice of circumcision on children as non bailable offence
केरल हाईकोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

केरल हाईकोर्ट ने बच्चों के गैर-चिकित्सीय खतने की प्रथा को बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन, अवैध, संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध के रूप में घोषित करने की मांग करने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। जनहित याचिका गैर-धार्मिक नागरिकों और पांच अन्य व्यक्तियों द्वारा दायर की गई है। 
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जनहित याचिका को मुख्य न्यायाधीश एस मणिकुमार और न्यायमूर्ति मुरली पुरुषोत्तम की खंडपीठ ने खारिज की। कोर्ट ने कहा, अदालत कानून बनाने वाली संस्था नहीं है। नॉन रिलिजियस नामक एक संगठन की ओर से दायर याचिका में लड़कों के खतना प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून बनाने पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया था।
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खतना की प्रथा बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन
याचिका में कहा गया, खतना की प्रथा बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। खतने से आघात सहित कई स्वास्थ्य समस्याएं होने का खतरा होता है। साथ ही अन्य जोखिम भी होते हैं। याचिका में कहा गया है कि बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संधि, 1989 और संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा अपनाया गया नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंध, जिसका भारत एक सदस्य और हस्ताक्षरकर्ता है, इसके प्रावधानों के आधार पर इस बात पर जोर देता है कि सभी बच्चों को एक प्यार भरे वातावरण, किसी भी प्रकार के नुकसान, हमलों, दुर्व्यवहार और भेदभाव से मुक्त सुरक्षित स्थान पर रहने का अधिकार है। यह केवल उनके माता-पिता द्वारा लिए गए एकतरफा निर्णय के कारण पालन करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसमें बच्चे के पास कोई विकल्प नहीं होते हैं। याचिका में कहा गया है कि यह अंतरराष्ट्रीय संधियों के प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन है।
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खतना की प्रथा के कारण शिशुओं की मौत की कई घटनाएं हुई 
कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया था कि खतना की प्रथा के कारण शिशुओं की मौत की कई घटनाएं हुई हैं। इस प्रथा का अभ्यास क्रूर, अमानवीय और बर्बर है और यह भारत के संविधान के अनुच्छे 21 के तहत बच्चों के मूल्यवान मौलिक अधिकार, जीवन के अधिकार उल्लंघन करता है।
 
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