Blood Test: घर से लिए ब्लड सैंपल को इतने तापमान में रखें, वर्ना सैंपल हो सकता है खराब, रिपोर्ट हो सकती है गलत!
दरअसल, फ्लेबोटोमी प्रक्रिया का इस्तेमाल ब्लड सैंपल लेने के लिए किया जाता है। स्वास्थ्य सेवाओं में इस्तेमाल होने वाली यह एक सरल और पुरानी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में बहुत सावधानी रखनी पड़ती है क्योंकि इसका हर स्टेप सैंपल की क्वालिटी और लैब में होने वाली गलती को रोकने में अहम भूमिका निभाता है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
मानव शरीर में खून ही वो माध्यम है,जिसके जरिए हमारे अंग ठीक से काम करते है। इसलिए किसी भी गंभीर बीमारी का पता लगाने के लिए अक्सर ब्लड टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है। ब्लड टेस्ट या तो हॉस्पिटल या फिर लैब में होता है। लेकिन आजकल कई लैब्स ने होम विजिट की सुविधा शुरू कर दी है। ऐसे में बस एक कॉल करके अपनी पसंदीदा डायग्नोस्टिक सेंटर के साथ अपॉइंटमेंट बुक कर सकते हैं। ये लोग खुद घर आकर आपका ब्लड सैंपल लेते हैं और कुछ ही देर में आपको रिपोर्ट भी उपलब्ध करा देते हैं। अगर आप भी ब्लड टेस्ट के लिए फ्लेबोटोमिस्ट को घर बुला रहे हैं तो यहां हम आपको बताएंगे कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं ?
दरअसल, फ्लेबोटोमी प्रक्रिया का इस्तेमाल ब्लड सैंपल लेने के लिए किया जाता है। स्वास्थ्य सेवाओं में इस्तेमाल होने वाली यह एक सरल और पुरानी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में बहुत सावधानी रखनी पड़ती है क्योंकि इसका हर स्टेप सैंपल की क्वालिटी और लैब में होने वाली गलती को रोकने में अहम भूमिका निभाता है। अगर ब्लड सैंपल लेने में कोई गलती हुई तो इससे मरीज को परेशानी हो सकती है और टेस्ट की रिपोर्ट भी गलत आ सकती है। इतना ही नहीं, इससे मरीज की जान भी खतरे में पड़ सकती है। तकनीकी के क्षेत्र में काम करने वाली एक निजी संस्थान ने हाल ही में ब्लड सैंपल कलेक्शन को लेकर एक रिसर्च की है। इस रिसर्च को करने वाले विष्णु शशिधरन ने विस्तार से समझाया है कि ब्लड सैंपल लेते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और सैंपल को स्टोर करने के लिए तापमान कितना होना चाहिए।
सैंपल लेने के दौरान होने वाली गलतियां
विष्णु शशिधरन अपने रिसर्च में बताया कि,जब भी लैब टेस्ट के नतीजे गलत आते हैं तो अक्सर टाइपिंग मिस्टेक को दोष दिया जाता है, लेकिन असली समस्या तो सैंपल लेने की प्रक्रिया में ही होती है। सैंपल लेने से लेकर लैब में जांच तक होने वाली प्रक्रिया में कई गलतियां हो सकती हैं, खासकर अगर सैंपल घर से ही लिया जा रहा हो। सबसे जरूरी है कि नमूने को सही तापमान पर रखा जाए, जो कि 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए। भारत की गर्मी को देखते हुए सैंपल को सही तापमान पर रखना बहुत मुश्किल होता है, खासकर जब सैंपल को लंबी दूरी तक ले जाना पड़ता है और तापमान -2 डिग्री से लेकर 50 डिग्री तक रहता है। ज्यादा तापमान की वजह से ब्लड सैंपल में कुछ बायोकैमिकल बदलाव हो सकते हैं। खून में कई तरह के सेल्स, प्रोटीन और एंजाइम होते हैं, जो तापमान बदलने से खराब हो सकते हैं। इससे टेस्ट के नतीजे गलत आ सकते हैं और मरीज को सही इलाज नहीं मिल पाएगा।
ब्लड सैंपल स्टोर करने का सही तरीका और तापमान कितना होना चाहिए
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के अनुसार, ब्लड सैंपल को स्टोर करने के लिए आपको नीचे बताए उपायों को अपनाने चाहिए। ध्यान रहे कि खून के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग तरीके से रखा जाता है।
- रेड ब्लड सेल्स: इन्हें 1 से 6 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर 42 दिनों तक रखा जा सकता है।
- प्लेटलेट्स: इन्हें 20 से 24 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर लगातार हिलाते हुए 5 दिनों तक रखा जा सकता है।
- प्लाज्मा: प्लाज्मा को खून निकालने के 8 घंटे के अंदर -18 डिग्री सेल्सियस या उससे कम तापमान पर जमा किया जाना चाहिए और इसे एक साल तक रखा जा सकता है।
नई तकनीक पीसीएम से हो सकेगा सुधार
रिसर्च के अनुसार, ब्लड सैंपल को सही तापमान पर रखना बहुत मुश्किल होता है, खासकर भारत जैसी जगहों पर जहां तापमान बहुत ज्यादा बदलता रहता है। इस समस्या को हल करने के लिए एक नई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे फेज चेंज मटेरियल (पीसीएम) कहते हैं। इस तकनीक से बने पैकेजिंग में सैंपल को सही तापमान पर रखा जा सकता है। ये पैकेज अलग-अलग तापमान के हिसाब से बनाए जा सकते हैं। पीसीएम और इंसुलेशन को मिलाकर ऐसे पैकेज बनाए जा रहे हैं जिनमें नमूने को सही तापमान पर सुरक्षित रखा जा सकता है।
इन सामग्रियों से अलग-अलग तरह के पैकेज बनाए जा सकते हैं, जिसमें सैंपल को अलग-अलग समय के लिए अलग-अलग तापमान पर रखा जा सकता है। यह पैकेज मजबूत होते हैं और सैंपल को सुरक्षित रखते हैं। पीसीएम यानी फेज चेंज मटेरियल एक खास तरह का पदार्थ होता है जो तापमान बदलने पर गर्मी को सोख लेता है या छोड़ता है। इससे नमूने का तापमान सही बना रहता है। ये बर्फ से अलग होते हैं क्योंकि ये लंबे समय तक ठंडक देते हैं। पीसीएम को इस तरह बनाया जाता है कि ये नमूने को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रख सकें, चाहे बाहर का तापमान कितना भी हो।
विभिन्न नमूनों के लिए अलग-अलग तरीकों और तापमान की जरूरत
दरअसल, पीसीएम का इस्तेमाल करके बनाए गए खास पैकेज नमूनों को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर सुरक्षित रख सकते हैं। इस तकनीक की मदद से नमूने को ना तो 8 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा गर्म होने दिया जाता है और न ही 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा ठंडा होने दिया जाता है, भले ही बाहर कितनी भी गर्मी हो।
रिसर्च कहती है कि, कुछ नमूने जैसे कि ब्लड प्लेटलेट्स को, 15 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच के तापमान पर रखना जरूरी होता है। ऐसे नमूनों के लिए खास तरह के पीसीएम का इस्तेमाल किया जाता है, न कि बर्फ या जेल पैक का। प्लेटलेट्स को अलग करने के लिए पूरे खून को 20 से 24 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रखना जरूरी होता है। अगर तापमान कम होगा तो प्लेटलेट्स खराब हो सकते हैं। खून लेने के 8 घंटे के अंदर प्लेटलेट्स को अलग कर लेना चाहिए और उन्हें 20 से 24 डिग्री सेल्सियस पर लगातार हिलाते हुए रखना चाहिए, नहीं तो ये आपस में चिपक सकते हैं।
क्योंकि प्लेटलेट्स को कमरे के तापमान पर रखा जाता है, इसलिए उनमें बैक्टीरिया पनप सकते हैं। इसलिए, इन्हें 24 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर स्टोर करना जरूरी है। इन्हें ले जाते समय भी 20-24 डिग्री सेल्सियस तापमान बनाए रखने वाले बॉक्स में रखना चाहिए। प्लेटलेट्स को फ्रिज में नहीं रखना चाहिए और जल्दी से जल्दी इस्तेमाल करना चाहिए।
नई तकनीक से क्या फायदे हैं?
रिसर्च के अनुसार, नमूनों को ले जाने के लिए पीसीएम आधारित पैकेजिंग का इस्तेमाल करने से स्वास्थ्य जांच में बड़ा बदलाव आ सकता है। इस तरह की पैकिंग से नमूने का तापमान सही रहता है, जिससे टेस्ट के नतीजे सही आते हैं। इससे मरीज को परेशानी नहीं होती है और उसका इलाज जल्दी हो पाता है। प्रोंगो बैग और सेल्शुर बैग जैसे उत्पाद इस बात को साबित करते हैं कि ये पैकेज असल में काम करते हैं। ब्लड सैंपल को सही तरीके से एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बहुत जरूरी है। इसके लिए सरकार को नियम बनाने चाहिए, जिससे लैब में सही तरीके से जांच हो सके और मरीज को सही इलाज मिल सके।