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Karnataka High Court: 'पति का पत्नी को आमदनी का जरिया मानना मानसिक क्रूरता', कर्नाटक हाईकोर्ट ने की टिप्पणी

Wed, 20 Jul 2022 07:52 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरु
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरु Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Wed, 20 Jul 2022 07:52 PM IST
सार

कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह स्पष्ट है कि पति का याचिकाकर्ता के प्रति कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं था। पति के उसके प्रति रवैया ऐसा था जिसके कारण याचिकाकर्ता को मानसिक और भावनात्मक रूप से परेशानी झेलनी पड़ी। 
 

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Karnataka High Court said Treating wife as a source of income is tantamount to mental cruelty by husband
कोर्ट का फैसला - फोटो : amar ujala

विस्तार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि पति का अपनी पत्नी को सिर्फ ‘आमदनी’ का जरिया मानना मानसिक क्रूरता है। न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति जे. एम. काजी और न्यायमूर्ति जे. एम. काजी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की है। गौरतलब है कि हाईकोर्ट तलाक के मामले में सुनवाई कर रहा था। 

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इस मामले में सुनवाई करने के बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने दंपति को तलाक की अनुमति दे दी। अपना फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि यह स्पष्ट है कि पति ने याचिकाकर्ता को मात्र आमदनी का एक साधन माना। कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह स्पष्ट है कि पति का याचिकाकर्ता के प्रति कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं था। पति के उसके प्रति रवैया ऐसा था जिसके कारण याचिकाकर्ता को मानसिक और भावनात्मक रूप से परेशानी झेलनी पड़ी। 
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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता महिला ने अपने बैंक खातों के विवरण और अन्य दस्तावेज अदालत को दिखाए, जिसके अनुसार उसने अपने पति को बीते कुछ सालों में 60 लाख रुपये ट्रांसफर किये थे।  जानकारी के मुताबिक, दंपती ने 1999 में चिक्कमगलुरु में शादी की थी। इसके दो साल बाद 2001 में उनका एक बेटा हुआ था। महिला ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि उसके पति का परिवार वित्तीय संकट में था, जिसके कारण परिवार में अक्सर झगड़े होते थे। पति के परिवार का कर्ज उतारने कि लिए उसने संयुक्त अरब अमीरात में नौकरी की इतना ही नहीं अपने पति के नाम पर उसने कृषि भूमि भी खरीदी। इसके बाद भी वह वित्तीय रूप से स्वावलंबी होने की बजाय पत्नी की आय पर निर्भर रहने लगा। 
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इन सब कारणों के कारण उसने 2017 में तलाक के लिए अर्जी दाखिल की थी। हालांकि महिला द्वारा दी गई तलाक की अर्जी को एक पारिवारिक अदालत ने 2020 में खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता महिला ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख किया। उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत के आदेश को खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय ने कहा कि पारिवारिक अदालत ने याचिकाकर्ता (पत्नी) की दलील न सुनकर बड़ी गलती की है। इसके बाद अदालत ने दोनों की तलाक को मंजूर कर लिया। 

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