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Karnataka: 'समान नागरिक संहिता के लिए संसद और विधानसभाएं ठोस प्रयास करें'; हाईकोर्ट ने बताया ये क्यों जरूरी

Sun, 06 Apr 2025 01:41 AM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू Published by: शिव शुक्ला Updated Sun, 06 Apr 2025 01:41 AM IST
सार

हाईकोर्ट ने कहा कि गोवा और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने पहले ही समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में कदम उठा लिए हैं। अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह उसके निर्णय की एक प्रति केंद्र सरकार और कर्नाटक सरकार के प्रधान विधि सचिवों को भेजें, ताकि ऐसी संहिता लागू करने की दिशा में विधायी प्रयास शुरू किए जा सकें।

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Karnataka High Court said Parliament and assemblies should make concrete efforts for Uniform Civil Code
कर्नाटक उच्च न्यायालय - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने संसद और राज्य विधानसभाओं से समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के लिए ठोस प्रयास करने का आग्रह किया है। अदालत ने कहा कि सभी नागरिकों, खासतौर पर महिलाओं के लिए समानता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय के सांविधानिक दृष्टिकोण के नजरिये से यह महत्वपूर्ण है। जस्टिस एच संजीव कुमार की एकल पीठ ने एक मृतक मुस्लिम महिला शहनाज बेगम के पति और भाई-बहन के बीच संपत्ति विवाद से संबंधित एक सिविल अपील पर फैसला सुनाते हुए यह सिफारिश की। इस मामले ने पर्सनल धार्मिक विधानों की ओर से संचालित उत्तराधिकार कानूनों और लैंगिक न्याय पर उनके प्रभाव के बारे में व्यापक प्रश्न उठाए हैं।

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जस्टिस कुमार ने कहा कि जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत कल्पना की गई है, समान नागरिक संहिता को लागू करने से संविधान के प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और राष्ट्रीय एकता के आदर्शों को पूरा किया जा सकेगा।

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हाईकोर्ट ने 4 अप्रैल के अपने फैसले में कहा, देश को पर्सनल लॉ और धर्म के संबंध में एक समान नागरिक संहिता की जरूरत है, तभी भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उद्देश्य प्राप्त होगा। अदालत ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि यद्यपि भारत में महिलाएं संविधान के तहत समान नगारकि हैं, लेकिन धर्म आधारित पर्सनल कानूनों के कारण उनके साथ असमान व्यवहार किया जाता है। इस असमानता को स्पष्ट करने के लिए पीठ ने हिंदू और मुस्लिम पर्सनल कानूनों के तहत उत्तराधिकार अधिकारों की तुलना की। पीठ ने कहा, जहां हिंदू कानून बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देता है, वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ भाइयों और बहनों के बीच भेद करता है- भाइयों को 'हिस्सेदार' का दर्जा देता है, जबकि बहनें दो दोयम दर्जे में रखता है जिससे उन्हें कम हिस्सा मिलता है।

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फैसले की कॉपी केंद्र को भेजने का निर्देश
हाईकोर्ट ने कहा कि गोवा और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने पहले ही समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में कदम उठा लिए हैं। अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह उसके निर्णय की एक प्रति केंद्र सरकार और कर्नाटक सरकार के प्रधान विधि सचिवों को भेजें, ताकि ऐसी संहिता लागू करने की दिशा में विधायी प्रयास शुरू किए जा सकें। 


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आंबेडकर समेत प्रतिष्ठित नेताओं के भाषणों का हवाला
अदालत में यूसीसी के समर्थन में दिए गए प्रतिष्ठित नेताओं के भाषण का हवाला दिया। पीठ ने कहा डॉ. बीआर अंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, टी कृष्णमाचारी और मौलाना हसरत मोहानी समेत तमाम प्रतिष्ठित नेताओं ने राष्ट्रीय एकता और समानता को बढ़ावा देने के लिए समान नागरिक कानूनों के प्रति समर्थन व्यक्त किया था।

संपत्तियां साझा अर्जित की गईं
अदालत समीउल्ला खान और अन्य की ओर से दायर अपीलों पर फैसला सुना रही थी, जिन्होंने शहनाज बेगम की संपत्तियों के बंटवारे को चुनौती दी थी। वादी - दो भाई और एक बहन - ने दावा किया कि विचाराधीन दोनों संपत्तियों को मृतक ने स्वयं अर्जित किया था, इसलिए, तीनों वादी, मृतक के पति (प्रतिवादी) के साथ, 50-50 के बंटवारे के समान रूप से हकदार थे। कोर्ट ने इस दावे को खारिज करते हुआ कहा कि संपत्तियां महिला और उसके पति की तरफ से संयुक्त रूप से अर्जित की गई थीं। इसके अनुसार, दोनों संपत्तियों में मृतका के दोनों भाइयों को 1/10वां हिस्सा, बहन को 1/20वां हिस्सा और पति को 3/4वां हिस्सा दिया। 

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