कर्नाटक चुनाव : हिजाब मुद्दे की धीमी आंच पर पकती सियासत, कड़े मुकाबले के आसार
वर्तमान में उडुपी जिले की पांचों विधानसभाओं पर भाजपा का कब्जा है। सभी का मानना है कि इस बार भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला कड़ा होगा। वैसे तो मुस्लिम वोटर सभी सीटों पर हैं, लेकिन दो सीटों पर पिछली बार वोटों के बंटवारे के कारण कांग्रेस हार गई थी। इस बार शायद ऐसा न हो।
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गवर्नमेंट प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज की छुट्टी है, गेट बंद है। यह वही स्कूल है, जिसमें उठा हिजाब का विवाद पूरे देश में सुर्खी बन गया था। यहां इंटरमीडिएट तक स्कूल न कह कर प्री यूनिवर्सिटी कहा जाता है।
उडुपी शहर के बस अड्डे से बस थोड़ी दूरी पर इस कॉलेज के ठीक सामने किताबों की दुकान पर बैठे 65 वर्षीय सतीश शिनॉय के दिल में अब भी इस बात का दर्द है कि हिजाब विवाद की काली छाया उनके शहर और स्कूल के साथ एक पहचान की तरह चस्पा कर दी गई है। शिनॉय कहते हैं, मैं पिछले 30 साल से इस कॉलेज के बाहर किताब की दुकान पर बैठ रहा हूं। समझ नहीं आया कि एकदम से यह हिजाब का मामला पूरे देश में क्यों चर्चा का विषय बन गया।
स्कूल में पढ़ने वाली बच्चियों के पीछे कौन हैं, जो मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया। बर्तन की दुकान लगाने वाले अब्दुल मुबीन भी मानते हैं कि इस मामले में फायदा चाहे जिसका हो, लेकिन सियासतदानों की वजह से विवाद बहुत बढ़ गया। कर्नाटक की राजनीति क्षेत्र के हिसाब से वैसे ही बदलती है, जैसे यहां एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए जंगलों के बीच हर मोड़ पर तेजी से रास्ते बदलते हैं। चिकमंगलूर में वोक्कालिगा व लिंगायत की बहुलता मानी जाती है, तो उडुपी की ओर चलने पर हिंदू क्षत्रिय भी प्रभावी भूमिका में हैं। मैसूर क्षेत्र में जहां जेडीएस प्रमुख पार्टी थी, तो चिकमंगलूर और उडुपी में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही नजर आता है। हालांकि, जेडीएस की भी उपस्थिति है। पिछले चुनावों में इन दोनों ही जगहों पर भाजपा काफी मजबूत रही थी।
उडुपी और चिकमंगलूर दोनों ही हैं कुछ खास
चिकमंगलूर को देश का सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक क्षेत्र माना जाता है। लोगों ने दावा किया कि ब्राजील के बाद यहीं सबसे ज्यादा कॉफी पैदा होती है। चिकमंगलूर के लोग आज भी इंदिरा गांधी को याद करते हैं। उन्होंने यहां से 1978 में उपचुनाव लड़ा था। इंदिरा ने नारा दिया था- एक वोट अपनी छोटी बेटी को दो। उन्होंने बैलगाड़ियों के साथ ही पैदल प्रचार किया। भीड़ उनके पीछे पागल रहती थी। हालांकि, कांग्रेस का यह गढ़ उसके बाद जनता पार्टी ने ढहाया।
- उडुपी अरब सागर के किनारे बसा होने के कारण अपने समुंद्री तटों की खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। यहां भगवान श्री कृष्ण का एक प्राचीन मंदिर भी है।
उडुपी में भाजपा-कांग्रेस के बीच टक्कर
वरिष्ठ पत्रकार बीबी शेट्टीगर कहते हैं कि अब यह मामला सियासी तौर पर शांत है। वर्तमान में उडुपी जिले की पांचों विधानसभाओं पर भाजपा का कब्जा है। सभी का मानना है कि इस बार भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला कड़ा होगा। वैसे तो मुस्लिम वोटर सभी सीटों पर हैं, लेकिन दो सीटों पर पिछली बार वोटों के बंटवारे के कारण कांग्रेस हार गई थी। इस बार शायद ऐसा न हो।
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की संभावना
उडुपी में हिजाब का प्रकरण चर्चित है तो चिकमंगलूर में भी दत्ता पीठ-बाबा बुडेन गिरी दरगाह का मामला भी गर्माता रहता है। दरअसल, पहाड़ी पर स्थित गुफा से जुड़े धार्मिक स्थल के बारे में हिंदूवादी संगठनों का दावा है कि यह दत्तात्रेय स्वामी का तपस्या स्थल है। वहीं, दूसरे पक्ष का कहना है कि यह काल्पनिक कहानी है और यहां पर दादा हयात मीर कलंदर उर्फ बाबा बुडेन की दरगाह सालों से हैं।
भाजपा ने ढहाया था कांग्रेस का गढ़
उडुपी कभी कांग्रेस का गढ़ था, लेकिन भाजपा ने यहां पर सबसे पहले मछुआरा समुदाय को अपने पाले में किया। धीरे-धीरे भाजपा ने यहां की सभी पांचों सीटें जीत लीं। स्थानीय जानकारों का कहना है कि इस बार भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे की संभावना कम है, इसलिए इस बार यहां कांग्रेस को कुछ फायदा हो सकता है।