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Karnataka Election Result: पूरी ताकत झोंकने के बाद भी कर्नाटक में क्यों हारी भाजपा? पांच बड़े कारण

Sat, 13 May 2023 08:53 PM IST
हिमांशु मिश्रा इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Sat, 13 May 2023 08:53 PM IST
सार

आखिर पूरी ताकत झोंकने के बावजूद कर्नाटक में भाजपा क्यों हार गई? वो कौन से कारण थे, जिसके चलते भाजपा को इतना बड़ा झटका लगा? अब भाजपा आगे क्या करेगी? आइए जानते हैं... 

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Karnataka Election Result 2023 Why BJP Lost Assembly Seats in Karnataka Vidhan Sabha Chunav Know Five Reasons
कर्नाटक चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कर्नाटक चुनाव के नतीजे काफी हद तक साफ हो चुके हैं। हिमाचल प्रदेश के बाद कर्नाटक में भी भाजपा को बड़ा झटका लगा है। पिछले एक साल के अंदर ये दूसरा राज्य है, जिसकी सत्ता भाजपा के हाथ से कांग्रेस ने छीन ली। इसका बड़ा सियाासी मतलब निकाला जा रहा है। खासतौर पर भाजपा के लिए बड़ी चिंता की बात है। 
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इस साल कर्नाटक के बाद अब पांच अन्य राज्यों में चुनाव होने हैं। इनमें राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम और तेलंगाना शामिल है। इसके अलावा अगले साल यानी 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं। इसके बाद सात राज्यों में चुनाव होने हैं। कुल मिलाकर अगले दो सालों में लोकसभा के साथ-साथ 13 बड़े राज्यों के चुनाव होने हैं। इनमें कई दक्षिण के राज्य भी हैं। इसलिए भाजपा के लिए कर्नाटक की हार को बड़ा झटका माना जा रहा है। वहीं, मुश्किलों में घिरी कांग्रेस के लिए जीवनदान साबित हुई। 
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अब सवाल ये उठता है कि आखिर पूरी ताकत झोंकने के बावजूद कर्नाटक में भाजपा क्यों हार गई? वो कौन से कारण थे, जिसके चलते भाजपा को इतना बड़ा झटका लगा? अब भाजपा आगे क्या करेगी? आइए जानते हैं... 
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पहले चुनाव नतीजों के रुझान जान लीजिए
पार्टी     सीटें
कांग्रेस 136
भाजपा 65
जेडीएस 19
अन्य  04

कर्नाटक में क्यों हारी भाजपा? 
इसे समझने के लिए हमने राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अजय कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'विधानसभा चुनाव के दौरान ही कर्नाटक चुनाव की तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई थी। इस बार चुनाव में भाजपा बैकफुट पर नजर आ रही थी और कांग्रेस काफी आक्रामक थी। ऐसे में भाजपा की इस हार का मतलब साफ है।' प्रो. सिंह ने आगे भाजपा की हार के पांच बड़े कारण बताए। 

1. आंतरिक कलह बनी मुसीबत: ये सबसे बड़ा कारण है। चुनाव के दौरान ही नहीं, बल्कि इससे काफी पहले से भाजपा में आंतरिक कलह की खबरें सामने आ चुकी थीं। कर्नाटक भाजपा में कई धड़े बन चुके थे। एक मुख्यमंत्री पद से हटाए गए बीएस येदियुरप्पा का गुट था, दूसरा मौजूदा मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई का, तीसरा भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष और चौथा भाजपा प्रदेश नलिन कुमार कटील का था। एक पांचवा फ्रंट भी था, जो पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि का था। इन सभी फ्रंट में भाजपा के कार्यकर्ता पिस रहे थे। सभी के अंदर पॉवर गेम की लड़ाई चल रही थी। 

 

2. टिकट बंटवारे ने बिगाड़ा बाकी खेल : पार्टी आंतरिक कलह से जूझ रही थी। ऐसे समय टिकट बंटवारे को लेकर भी बड़ी गड़बड़ी हुई। पार्टी के कई दिग्गज नेताओं का टिकट काटना भाजपा को भारी पड़ा। पार्टी नेताओं की बगावत ने भी कई सीटों पर भाजपा को नुकसान पहुंचाया है। करीब 15 से ज्यादा ऐसी सीटें हैं, जहां भाजपा के बागी नेताओं ने चुनाव लड़ा और पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचाया। जगदीश शेट्टार, लक्ष्मण सावदी जैसे नेताओं का अलग होना भी पार्टी के लिए नुकसान साबित हुआ।

3. भ्रष्टाचार के आरोपों ने पहुंचाया नुकसान : ये मुद्दा पूरे चुनाव में हावी रहा। चुनाव से कुछ समय पहले ही भाजपा के एक विधायक के बेटे को रंगे हाथों घूस लेते हुए पकड़ा गया था। इसके चलते भाजपा विधायक को भी जेल जाना पड़ा। एक ठेकेदार ने भाजपा सरकार पर 40 प्रतिशत कमिशनखोरी का आरोप लगाते हुए फांसी लगा ली थी। कांग्रेस ने इस मुद्दे को पूरे चुनाव में जोरशोर से उठाया। राहुल गांधी से लेकर मल्लिकार्जुन खरगे और प्रियंका गांधी तक ने इस मुद्दे को खूब भुनाया। जनता के बीच भाजपा की छवि धुमिल हुई और पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। 

 

4. दक्षिण बनाम उत्तर की लड़ाई का भी असर : इसे भी एक बड़ा कारण मान सकते हैं। इस वक्त दक्षिण बनाम उत्तर की बड़ी लड़ाई चल रही है। भाजपा राष्ट्रीय पार्टी है और मौजूदा समय केंद्र की सत्ता में है। ऐसे में भाजपा नेताओं ने हिंदी बनाम कन्नड़ की लड़ाई में मौन रखना ठीक समझा। वहीं, कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने मुखर होकर इस मुद्दे को कर्नाटक में उठाया। नंदिनी दूध का मसला इसका उदाहरण है। कांग्रेस ने नंदिनी दूध के मुद्दे को खूब प्रचारित किया। एक तरह से ये साबित करने की कोशिश की है कि भाजपा उत्तर भारतीय कंपनियों को बढ़ावा दे रही है, जबकि दक्षिण के लोगों को किनारे लगाया जा रहा है। 

 

5. आरक्षण का मुद्दा पड़ा भारी : ये भी एक बड़ा कारण हो सकता है। कर्नाटक चुनाव में भाजपा ने चार प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण खत्म करके लिंगायत और अन्य वर्ग में बांट दिया। पार्टी को इससे फायदे की उम्मीद थी, लेकिन ऐन वक्त में कांग्रेस ने बड़ा पासा फेंक दिया। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 फीसदी करने का एलान कर दिया। इसने भाजपा के हिंदुत्व को पीछे छोड़ दिया। आरक्षण के वादे ने कांग्रेस को बड़ा फायदा पहुंचाया। लिंगायत वोटर्स से लेकर ओबीसी और दलित वोटर्स तक ने कांग्रेस का साथ दिया।
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