कर्नाटक: बहुमत के नजदीक आकर ठिठकी भाजपा, कांग्रेस का बड़ा दांव, अब राज्यपाल के पाले में गेंद
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कर्नाटक विधानसभा के त्रिशंकु नतीजे आने के साथ ही सरकार बनाने के लिए सियासी नाटक शुरू हो गया। मंगलवार को घोषित नतीजे में बहुमत के जादुई आंकड़े से महज 8 सीट दूर ठिठक गई भाजपा को सरकार बनाने से रोकने के लिए कांग्रेस (78) ने जदएस (38) को बिना शर्त समर्थन का ऐलान कर दिया। वे राज्यपाल से मिलने भी पहुंच गए। लेकिन, पूरे नतीजे आने तक उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया।
इस बीच, शाम 6 बजे भाजपा की ओर से येदियुरप्पा ने राज्यपाल से मिलकर सबसे बड़े दल (104 सीट) के नाते अपना दावा पेश किया। 15 मिनट बाद ही कांग्रेस-जदएस के नेता भी राज्यपाल से मिलने पहुंच गए।
222 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 112 विधायकों के समर्थन की जरूरत है। किसी दल के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं होने के कारण गेंद अब राज्यपाल वजुभाई वाला के पाले में है। नतीजों में कांग्रेस को भारी झटका लगा है।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपनी दो सीटों में से एक चामुंडेश्वरी पर 36 हजार वोटों से चुनाव हार गए, वहीं उनके दस मंत्रियों को भी शिकस्त का सामना करना पड़ा। सिद्धारमैया बादामी सीट से भी 1696 वोटों के मामूली अंदर से जीत पाए। स्थिति स्पष्ट होने के बाद सिद्धारमैया ने पद से इस्तीफा दे दिया।
बसपा का खाता खुला :
जदएस के साथ गठबंधन के तहत 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बसपा के एन महेश ने कोलेगल सीट से कांग्रेस के एआर कृष्णमूर्ति को 19,500 मतों से हराया।
भाजपा और कांग्रेस के विधायक दल की बैठक आज :
भाजपा के विधायक दल की बैठक बुधवार को होगी, जिसमें येदियुरप्पा को विधायक दल का नेता चुनने की औपचारिकता को पूरा किया जाएगा। कांग्रेस के विधायक दल की बैठक भी बुधवार को होनी है।
भाजपा के सामने दोहरी चुनौती
भाजपा को अगले लोकसभा चुनाव में इस सूबे में जदएस-कांग्रेस की सामूहिक चुनौती से जूझना होगा। इस चुनाव में कांग्रेस और जदएस का संयुक्त वोट करीब 56 फीसदी है, जो भाजपा के वोट से करीब 20 फीसदी ज्यादा है। पार्टी के लिए मुश्किल यह है कि यूपी में सपा-बसपा भी इसी प्रयोग को आजमा रही है। बीते लोकसभा चुनाव में विपक्ष में बिखराव के कारण ही भाजपा को महज 31 फीसदी वोटों के सहारे 283 सीटें हासिल हुई थी। जबकि वर्ष 1999 में 29 फीसदी वोट ला कर पार्टी को महज 182 सीटें ही मिली थी।
देवगौड़ा ने इसलिए थामा कांग्रेस का दामन
जदएस सूत्रों के मुताबिक देवगौड़ा ने गैर भाजपा सरकार की स्थिति में फिर से पीएम पद पाने की संभावना के अलावा राज्य में दलित और मुसलिम वोट बैंक के छिटकने के डर से भाजपा से दूरी बनाई। अगले ही साल लोकसभा चुनाव हैं। इसके अलावा उन्हें भाजपा से सीएम पद मिलने की उम्मीद नहीं थी।
ये है परंपरा
स्थापित परंपरा के मुताबिक त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में राज्यपाल सबसे बड़े दल या चुनाव पूर्व गठबंधन को सरकार बनाने का न्यौता देते हैं और सदन में बहुमत साबित करने का मौका देते हैं। चूंकि कांग्रेस और जदएस का चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं था, लिहाजा यह राज्यपाल पर है कि वे किसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। भाजपा के तीन केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रकाश जावडेकर और जेपी नड्डा पार्टी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए जमे हुए हैं।
नतीजों के बाद अब ये हैं विकल्प
भाजपाः इस बात की पूरी संभावना है कि राज्यपाल सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को न्यौता देंगे। सदन में बहुमत साबित करने के लिए वह दो निर्दल और बसपा के एक विधायक को अपने पाले में ला सकती है। इसके अलावा कांग्रेस या जदएस के कुछ विधायकों से इस्तीफा दिलवा सकती है। इससे बहुमत का आंकड़ा घट जाएगा, जिसे पार करना उसके लिए आसान हो जाएगा।
कांग्रेस: चुनाव बाद जदएस से गठबंधन करने के कारण कांग्रेस के इस मोर्चे को न्यौता मिलने की उम्मीद कम। अगर भाजपा बहुमत साबित नहीं कर पाती है तो राज्यपाल इस मोर्चे को आमंत्रित कर सकते हैं, लेकिन इसकी संभावना कम है।
मोदी का जादू कायम
शाह का तोड़ नहीं
मोदी के अलावा अगर भाजपा में किसी के सिर पर इस जीत का सेहरा बंधना चाहिए तो वे हैं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह। चुनाव प्रबंधन में इस समय उनका कोई सानी नहीं है। उनकी अथाह ऊर्जा और अनथक प्रयास बेमिसाल हैं।
राहुल की राह में रोड़े
गुजरात के बाद कर्नाटक में भी उनका ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ बुरी तरह फेल हुआ। मठों और मंदिरों में मत्था टेकना काम नहीं आया। उदासीन राजनेता की छवि तोड़ी लेकिन मोदी के करिश्मा को तोड़ने के लिए उनके तरकश में कोई तीर नहीं है।
कांग्रेस को फंड का टोटा
देश के तमाम राज्यों से सफाया होने के बाद कांग्रेस के पास कर्नाटक ही एक ऐसा राज्य बचा था, जहां से पार्टी का खर्च पूरा होता था। इस राज्य को खोने का मतलब साफ है कि भविष्य में पार्टी को फंड की भारी कमी होने वाली है।
लिंगायत कार्ड नहीं चला
कांग्रेस द्वारा लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने का दाव उल्टा पड़ा। भाजपा जनता को यह समझाने में सफल रही कि कांग्रेस के पास ‘बांटो और राज करो’ के अलावा चुनाव जीतने की कोई दूसरी रणनीति नहीं है।