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Caste Census: 'कर्नाटक में 'पूरी तरह वैज्ञानिक' जाति जनगणना'; आयोग के प्रमुख ने आरोपों को सिरे से खारिज किया
Thu, 23 Nov 2023 06:38 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Thu, 23 Nov 2023 06:38 PM IST
सार
कर्नाटक में जाति जनगणना को लेकर कई आरोप लगे। राज्य में पिछड़े वर्ग के के लिए बने आयोग ने इसे 'पूरी तरह वैज्ञानिक' करार दिया। आयोग के पूर्व प्रमुख एच कंथाराजू ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि गलत आंकड़ों और सर्वे के आरोप बेबुनियाद हैं।
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कर्नाटक में जाति जनगणना पर आयोग के पूर्व प्रमुख का बयान (फोटो-प्रतीकात्मक)
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
कर्नाटक में जातिगत जनगणना का मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है। कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व अध्यक्ष एच कंथाराजू ने कहा, जनगणना का अभ्यास "पूरी तरह से वैज्ञानिक" था। उन्होंने गुरुवार को जोर देकर कहा कि सर्वे पर हर किसी को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन सर्वे से पहले ही टिप्पणी करना ठीक नहीं है।
गौरतलब है कि आयोग के पूर्व अध्यक्ष एच कंथाराजू को कर्नाटक में सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण का वास्तुकार माना जाता है। इसे "जाति जनगणना" के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना के लिए किया गया "सर्वेक्षण वैज्ञानिक है या अवैज्ञानिक, इसे सत्यापित करने की जरूरत है।" उन्होंने कहा कि सर्वे पूरी तरह वैज्ञानिक रिपोर्ट है। इस पर विस्तार से काम करने के अलावा उन्होंने खुद पूरी प्रक्रिया देखी है।
आयोग के पूर्व प्रमुख कंथाराजू ने दावा किया कि जाति जनगणना के दौरान प्रदेश के हर घर तक पहुंचने का प्रयास किया गया है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया को अवैज्ञानिक कहना सरासर गलत है। उन्होंने कहा कि आयोग की सर्वे रिपोर्ट पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले रिपोर्ट को पढ़ने की जरूरत है। इसे अभी तक किसी ने नहीं देखा है। रिपोर्ट देखे बिना अनर्गल टिप्पणी करना किसी मामले पर पहले से निर्णय लेने जैसा है। ऐसा नहीं होना चाहिए।
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गौरतलब है कि 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 170 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण शुरू किया था। 2015 में शुरू हुआ सर्वे 2018 में पूरा हो गया था, लेकिन लगभग पांच साल बीतने के बावजूद अभी तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।
कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष कंथाराजू के नेतृत्व में जाति जनगणना की रिपोर्ट तैयार हो गई थी। हालांकि, मुख्यमंत्री के रूप में सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल में रिपोर्ट या तो स्वीकार नहीं की गई या इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। कर्नाटक के दो प्रमुख समुदायों - वोक्कालिगा और लिंगायत ने कंथाराजू आयोग की सर्वेक्षण रिपोर्ट को अवैज्ञानिक करार दिया है। उन्होंने मांग की है कि रिपोर्ट खारिज कर नए सिरे से सर्वेक्षण कराया जाए।
बता दें कि बिहार सरकार ने हाल ही में जाति सर्वेक्षण के निष्कर्ष जारी किए हैं। इसके बाद दूसरे राज्यों में भी इस तरह की मांग जोर पकड़ने लगी है। कर्नाटक में कांग्रेस की सीएम सिद्धारमैया सरकार पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री ने कहा है कि रिपोर्ट मिलने के बाद ही वह अंतिम फैसला लेंगे।
आयोग की रिपोर्ट को प्रमाणिक बताते हुए कंथाराजू ने कहा, सर्वेक्षण के दौरान प्रत्येक घर से 55 प्रश्न पूछे गए। उन्होंने कहा कि सवालों की सूची में जाति भी एक कारक थी। धर्म दूसरा कारक था। विशेषज्ञ की राय के आधार पर कर्नाटक की जनता से संपत्ति, कृषि भूमि, सिंचाई सुविधा समेत कई बिंदुओं पर सवाल किए गए। आयोग ने किसी को पिछड़े के रूप में पहचान दिलाने के लिए जरूरी सभी संभावित जानकारी और डेटा जुटाने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा, चाहे वह वोक्कालिगा हो या लिंगायत समुदाय; लोगों को अपनी राय रखने की पूरी आजादी है। हालांकि, उन्हें इसका अंदाजा नहीं है कि टिप्पणी का आधार क्या है, लेकिन वैज्ञानिक आधार पर संपन्न प्रक्रिया पर टिप्पणी ऐसी टिप्पणी निराधार है।
कंथाराजू ने कहा, हमने जो काम किया है वह सरकार की संपत्ति है। प्रकाशन के बाद ही रिपोर्ट के सही या गलत होने पर टिप्पणी करना ठीक होगा। अगर सचमुच रिपोर्ट में गलतियां पाई जाएंगी, तो उन्हें भी इसे स्वीकार करने से कोई ऐतराज नहीं।
कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के वर्तमान अध्यक्ष के. जयप्रकाश हेगड़े के नेतृत्व में आयोग अगले कुछ महीनों में सरकार को रिपोर्ट सौंप सकती है। हालांकि, रिपोर्ट के प्रकाशन से पहले ही सर्वेक्षण विवादों में घिर गया है। सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर गहरे मतभेद की खबरें सामने आ रही हैं। कड़े सामुदायिक विरोध के अलावा सर्वेक्षण की मूल "वर्क-शीट" प्रति गायब होने की बात भी सामने आई है।
कर्नाटक की राजनीति में बेहद प्रभावी दो समुदायों की मुखर आलोचना के बीच प्रदेश की दलित और ओबीसी आबादी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग कर रही है। सर्वेक्षण के विरोध पर सीएम सिद्धारमैया ने गुरुवार को बागलकोट में कहा; कोई नहीं जानता कि रिपोर्ट में क्या है, लेकिन इसके कंटेंट पर अटकलें लगाई जा रही हैं। बिना तथ्यों को जाने आलोचना या विरोध अच्छी बात नहीं। यह एक अच्छा विकास नहीं है।
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गौरतलब है कि आयोग के पूर्व अध्यक्ष एच कंथाराजू को कर्नाटक में सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण का वास्तुकार माना जाता है। इसे "जाति जनगणना" के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना के लिए किया गया "सर्वेक्षण वैज्ञानिक है या अवैज्ञानिक, इसे सत्यापित करने की जरूरत है।" उन्होंने कहा कि सर्वे पूरी तरह वैज्ञानिक रिपोर्ट है। इस पर विस्तार से काम करने के अलावा उन्होंने खुद पूरी प्रक्रिया देखी है।
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आयोग के पूर्व प्रमुख कंथाराजू ने दावा किया कि जाति जनगणना के दौरान प्रदेश के हर घर तक पहुंचने का प्रयास किया गया है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया को अवैज्ञानिक कहना सरासर गलत है। उन्होंने कहा कि आयोग की सर्वे रिपोर्ट पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले रिपोर्ट को पढ़ने की जरूरत है। इसे अभी तक किसी ने नहीं देखा है। रिपोर्ट देखे बिना अनर्गल टिप्पणी करना किसी मामले पर पहले से निर्णय लेने जैसा है। ऐसा नहीं होना चाहिए।
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गौरतलब है कि 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 170 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण शुरू किया था। 2015 में शुरू हुआ सर्वे 2018 में पूरा हो गया था, लेकिन लगभग पांच साल बीतने के बावजूद अभी तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।
कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष कंथाराजू के नेतृत्व में जाति जनगणना की रिपोर्ट तैयार हो गई थी। हालांकि, मुख्यमंत्री के रूप में सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल में रिपोर्ट या तो स्वीकार नहीं की गई या इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। कर्नाटक के दो प्रमुख समुदायों - वोक्कालिगा और लिंगायत ने कंथाराजू आयोग की सर्वेक्षण रिपोर्ट को अवैज्ञानिक करार दिया है। उन्होंने मांग की है कि रिपोर्ट खारिज कर नए सिरे से सर्वेक्षण कराया जाए।
बता दें कि बिहार सरकार ने हाल ही में जाति सर्वेक्षण के निष्कर्ष जारी किए हैं। इसके बाद दूसरे राज्यों में भी इस तरह की मांग जोर पकड़ने लगी है। कर्नाटक में कांग्रेस की सीएम सिद्धारमैया सरकार पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री ने कहा है कि रिपोर्ट मिलने के बाद ही वह अंतिम फैसला लेंगे।
आयोग की रिपोर्ट को प्रमाणिक बताते हुए कंथाराजू ने कहा, सर्वेक्षण के दौरान प्रत्येक घर से 55 प्रश्न पूछे गए। उन्होंने कहा कि सवालों की सूची में जाति भी एक कारक थी। धर्म दूसरा कारक था। विशेषज्ञ की राय के आधार पर कर्नाटक की जनता से संपत्ति, कृषि भूमि, सिंचाई सुविधा समेत कई बिंदुओं पर सवाल किए गए। आयोग ने किसी को पिछड़े के रूप में पहचान दिलाने के लिए जरूरी सभी संभावित जानकारी और डेटा जुटाने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा, चाहे वह वोक्कालिगा हो या लिंगायत समुदाय; लोगों को अपनी राय रखने की पूरी आजादी है। हालांकि, उन्हें इसका अंदाजा नहीं है कि टिप्पणी का आधार क्या है, लेकिन वैज्ञानिक आधार पर संपन्न प्रक्रिया पर टिप्पणी ऐसी टिप्पणी निराधार है।
कंथाराजू ने कहा, हमने जो काम किया है वह सरकार की संपत्ति है। प्रकाशन के बाद ही रिपोर्ट के सही या गलत होने पर टिप्पणी करना ठीक होगा। अगर सचमुच रिपोर्ट में गलतियां पाई जाएंगी, तो उन्हें भी इसे स्वीकार करने से कोई ऐतराज नहीं।
कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के वर्तमान अध्यक्ष के. जयप्रकाश हेगड़े के नेतृत्व में आयोग अगले कुछ महीनों में सरकार को रिपोर्ट सौंप सकती है। हालांकि, रिपोर्ट के प्रकाशन से पहले ही सर्वेक्षण विवादों में घिर गया है। सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर गहरे मतभेद की खबरें सामने आ रही हैं। कड़े सामुदायिक विरोध के अलावा सर्वेक्षण की मूल "वर्क-शीट" प्रति गायब होने की बात भी सामने आई है।
कर्नाटक की राजनीति में बेहद प्रभावी दो समुदायों की मुखर आलोचना के बीच प्रदेश की दलित और ओबीसी आबादी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग कर रही है। सर्वेक्षण के विरोध पर सीएम सिद्धारमैया ने गुरुवार को बागलकोट में कहा; कोई नहीं जानता कि रिपोर्ट में क्या है, लेकिन इसके कंटेंट पर अटकलें लगाई जा रही हैं। बिना तथ्यों को जाने आलोचना या विरोध अच्छी बात नहीं। यह एक अच्छा विकास नहीं है।