Kargil War: मुशर्रफ यह धमकी नहीं देते तो कारगिल में बमबारी नहीं कर पाती वायुसेना, जहाज गिरे तो बदली रणनीति
Kargil War: परवेज मुशर्रफ की रणनीति के बारे में कोई नहीं जानता था। तब तक कारगिल की स्थिति का सही विश्लेषण भी नहीं था। इस सवाल ने सभी को बांध कर रख दिया गया था। नतीजा, वायुसेना का इस्तेमाल समय पर नहीं हो सका...
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कारगिल की लड़ाई में भारतीय एयरफोर्स का इस्तेमाल, इस निर्णय पर पहुंचना आसान नहीं था। इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और तीनों सेनाओं के प्रमुखों को खासी माथापच्ची करनी पड़ी। तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह को मुश्किल से राजी किया गया। पाकिस्तान के तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ, जिन्होंने कारगिल लड़ाई की व्यूह रचना की थी, उन्होंने भारत को एक धमकी दे दी। वह लड़ाई के बीच का समय था। मुशर्रफ को यह भनक लग गई थी कि भारत अब कारगिल में वायु सेना का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है। फिर क्या था, मुशर्रफ ने भी सीधी धमकी दे डाली। उन्होंने कहा, भारत ने कोई बड़ा कदम यानी एयर मारक क्षमता का इस्तेमाल किया या मिसाइल जैसा कुछ दागा तो पाकिस्तान उसका जवाब देगा। मुशर्रफ की यही धमकी रामबाण साबित हुई। उस दौरान की परिस्थितियों और पाकिस्तानी जनरल की धमकी के मद्देनजर, भारतीय सेना ने वायुसेना के सीमित इस्तेमाल के लिए राजनीतिक नेतृत्व को राजी कर लिया।
शक्तिशाली वायुसेना थी, लेकिन इस्तेमाल पर सहमति नहीं ...
कारगिल की लड़ाई में भारत के पास एक शक्तिशाली वायुसेना थी। हालांकि इसका इस्तेमाल बहुत देरी से हो सका। कारगिल की लड़ाई में भारतीय सेना के प्रमुख रहे वेद प्रकाश मलिक ने अपनी किताब 'फ्रॉम सरप्राइज टू विक्टरी' के चेप्टर 'दा डार्क विंटर' में लिखा है कि उस वक्त एयरफोर्स का इस्तेमाल करने के लिए राजनीतिक नेतृत्व को राजी करना आसान नहीं था। अगर तीनों सेनाओं में सहमति बनी तो केंद्र सरकार तैयार नहीं हुई। कारगिल की लड़ाई के दौरान कई ऐसी परिस्थितियां बन गई थीं, जिनके बीच भारत के राजनीतिक नेतृत्व और सेना को अहम निर्णय लेने में देरी का सामना करना पड़ा। भारत के जांबाज सैनिक अपने अदम्य साहस के बलबूते धीरे-धीरे पाकिस्तानी सेना द्वारा कब्जाई गई चोटियों को खाली करा रहे थे। सरकार में बैठे लोगों द्वारा यह तर्क दिया गया कि वायुसेना कारगिल में उतरती है, तो स्थिति बिगड़ जाएगी। पहले एलओसी से घुसपैठ हटाई जाए, इस पर काम शुरू हुआ। इसके बाद भी जब वायुसेना की जरूरत महसूस हुई तो एक 'रामबाण' चलाया गया।
परवेज मुशर्रफ ने जवाब दिया और बात बन गई ...
सेना की ओर से परवेज मुशर्रफ तक यह बात पहुंचाई गई कि भारत अब वायुसेना का इस्तेमाल कर सकता है। इसके बाद मुशर्रफ ने धमकी दे दी। मुशर्रफ की यह धमकी काम कर गई। पाकिस्तानी सेना, उस वक्त कारगिल में थी और ऊपर से अब यह धमकी, इन सब बातों ने राजनीतिक नेतृत्व को वायुसेना के सीमित इस्तेमाल की मंजूरी देने के लिए राजी कर लिया। एक रिटायर्ड अधिकारी का कहना है कि कारगिल में समय रहते वायुसेना का साथ मिल जाता तो थलसेना के इतने अफसर और जवान शहीद न होते। राजनीतिक नेतृत्व और सेना के बीच कम तालमेल की बातें सामने आईं। दूसरी तरफ पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ खुद को सुप्रीम मानकर चल रहे थे। पाकिस्तानी नौसेना और एयरफोर्स को भी मुशर्रफ के ऑपरेशन की ज्यादा भनक नहीं लगी। एक हेलीकॉप्टर में सवार होकर मुशर्रफ, एलओसी पार कर चुकी ऑपरेशन बदर की अग्रिम पंक्ति से मिलने चला आया था। यह उनका निजी दुस्साहस था।
वाइस चीफ ऑफ एयरस्टाफ चंद्रशेखर ने क्या कहा
परवेज मुशर्रफ की रणनीति के बारे में कोई नहीं जानता था। तब तक कारगिल की स्थिति का सही विश्लेषण भी नहीं था। इस सवाल ने सभी को बांध कर रख दिया गया था। नतीजा, वायुसेना का इस्तेमाल समय पर नहीं हो सका। 18 मई 1999, कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की बैठक में तत्कालीन वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ चंद्रशेखर ने कारगिल में वायुसेना की मदद की बात कही। उन्होंने कहा, इस अपमानजनक स्थिति में वायुसेना की मारक क्षमता का इस्तेमाल जरूरी है। सीसीएस ने उनके प्रपोजल को नकारते हुए कहा, इससे स्थिति बिगड़ सकती है। दोनों देशों के बीच ट्रैक-2 डायलाग की संभावना खत्म हो जाएगी। तत्कालीन सेनाध्यक्ष वीपी मलिक चाहते थे कि कारगिल में वायुसेना को भेजा जाए। मलिक ने लिखा है, चंद्रशेखर ने मुझे विश्वास दिलाया था कि कारगिल में वायुसेना की उपस्थिति जरूरी है। वायुसेना और नेवी के मामले में हम पाकिस्तान पर भारी पड़ते हैं। कई दिन तक बैठकें चली, लेकिन लड़ाकू जहाजों को उड़ाने की मंजूरी नहीं मिली। सीसीएस अपनी बात पर अड़ी थी कि वायुसेना कारगिल नहीं जाएगी। अभी पाक के इरादों का पता नही है, हमारी छोटी सी गलती भयानक युद्ध को बुलावा दे सकती है। 23 मई 1999 को हुई बैठक में नौसेना प्रमुख सुशील कुमार भी शामिल हुए। उन्होंने वायुसेना के इस्तेमाल का समर्थन किया। वायुसेना अध्यक्ष अनिल यशवंत टिपनिस ने उस वक्त तक इस पहल को खास तवज्जो नहीं दी थी। उनका तर्क था कि ज्यादा ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर ले जाना जोखिम भरा है।
टिपनिस ने जनरल मलिक को लिखा, एक बार फिर सोचें
वायुसेना अध्यक्ष अनिल यशवंत टिपनिस ने जनरल मलिक को पत्र लिखकर हवाई मारक क्षमता और राजनीतिक एवं सामरिक बाध्यता के बारे में बताया। अंत में लिखा, एक बार फिर सोचें। मलिक ने जवाब दिया कि कारगिल व लद्दाख में लड़ रही सेना को वायुसेना का सहयोग जरूरी है। मैं इसके लिए सीसीएस के सामने आपका यानी टिपनिस का विरोध करूंगा। सीसीएस की बैठक में एनएसए ब्रजेश मिश्र, रॉ-आईबी, आर्मी इंटेलीजेंस और रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अफसर मौजूद थे। जब सबकी राय मेल खाने लगी तो विदेश मंत्री जसवंत सिंह अड़ बैठे। उन्हें मुशर्रफ की धमकी के बारे में बताया तो वे भी वायु सेना भेजने के लिए तैयार हो गए। 24 मई को राजनीतिक नेतृत्व की स्वीकृति मिलते ही वायुसेना कारगिल पहुंच गई।
पहले ही दिन वायुसेना का एमआई-35 हेलिकॉप्टर, मौसम खराब होने के कारण उड़ नहीं सका। दो दिन बाद एक एमआई-17 हेलीकॉप्टर गिर गया। इसके बाद दो मिग मार गिराए गए। वायुसेना को कारगिल में भेजना, एक गलत निर्णय तो नहीं था, इस पर विचार हुआ। पता चला कि लड़ाकू जहाज, टारगेट पर निशाना नहीं लगा पा रहे थे। इसके बाद वायुसेना ने रणनीति बदली। लगातार स्ट्राइक करनी शुरू कर दी। लड़ाकू जहाजों ने 250-1000 किलोग्राम तक बम बरसाने शुरू कर दिए। पाकिस्तानी सेना भागने लगी। थलसेना ने कारगिल की जीत को 'ऑपरेशन विजय', वायुसेना ने 'ऑपरेशन सफेद सागर' और नौसेना, जिसकी सीधी कोई भूमिका नहीं थी, उसने इसे 'ऑपरेशन तलवार' का नाम दिया।