Kargil Vijay Diwas: बीएसएफ की किसी भी चौकी पर घुसपैठ नहीं कर सके पाकिस्तानी, दुश्मन की 120 संचार तकनीक
Kargil Vijay: कारगिल में भारत और पाकिस्तान की सेना के बीच 84 दिनों तक चली लड़ाई में देश के सैनिकों ने जो पराक्रम दिखाया, इसे आज भी याद किया जाता है। ऐसी ही एक कहानी है दुश्मन के 120 संचार तकनीक की। सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान इतने मुस्तैद थे कि पाकिस्तानी, बीएसएफ की किसी भी चौकी पर घुसपैठ नहीं कर सके। पढ़िए बलिदानी सपूतों के अदम्य शौर्य की अमर गाथा
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कारगिल की लड़ाई के दौरान सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' के अधिकार क्षेत्र वाली किसी भी चौकी पर पाकिस्तानी सेना घुसपैठ नहीं कर सकी थी। वजह, बीएसएफ ने अपनी किसी भी चौकी को एक पल के लिए भी खाली नहीं छोड़ा था। चाहे जो भी विषम परिस्थितियां रही हों, बीएसएफ जवान अपनी चौकी पर डटे रहे। दिसंबर/जनवरी 1998-99 के महीनों में जब पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ हुई तो उसके बाद दुश्मन ने राशन सामग्री, गोला-बारूद, चिकित्सा सुविधाओं और गोपनीयता मोड वाले वायरलेस संचार के साथ अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी। दुश्मन ने संचार लाइनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक अलग टेलीफोन लाइन भी बिछा दी थी। उन्होंने पश्तो, दर्दी आदि भाषाओं में पारंगत वायरलेस ऑपरेटरों का उपयोग करके भ्रामक 120 संचार तकनीकों का इस्तेमाल किया। इन्हें भारतीय सैनिक शायद ही समझ पाते थे। वजह, भारतीय सेना के अधिकांश जवान, उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से थे।
सीमा सुरक्षा बल के पीआरओ के मुताबिक, कारगिल की लड़ाई में बीएसएफ के लिए यह गर्व की बात थी कि उनके जिम्मेदारी वाले क्षेत्र में घुसपैठ का एक भी मामला नहीं हुआ। क्योंकि कोई भी बीएसएफ चौकी, चाहे वह कितनी भी कठिन, दुर्गम और हड्डियों को कंपा देने वाली सर्दियों में असहनीय क्यों न हो, खाली नहीं की गई। कारगिल युद्ध के दौरान बीएसएफ के जवान स्वतंत्र रूप से रक्षात्मक स्थिति में रहे। वे चट्टान की तरह डटे रहे और यह सुनिश्चित किया कि दुश्मन, उनके क्षेत्र में कोई बढ़त हासिल न कर सके। यह बीएसएफ कर्मियों के लिए श्रेय की बात है कि युद्ध के दौरान भी, बल के महानिदेशक, ईएन राम मोहन, आईपीएस, तत्कालीन कश्मीर फ्रंटियर के महानिरीक्षक के विजय कुमार, आईपीएस के साथ, दुश्मन के तोपखाने, मोर्टार और वायु रक्षा तोपों के लिए अतिसंवेदनशील क्षेत्र में वाहन चलाते समय एक वाहन दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए।
ये अधिकारी, वहां लड़ रहे अपने जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए गए थे। एससी नेगी, कमांडेंट, 8 बटालियन बीएसएफ और उनके समर्पित अधिकारियों की टीम ने उत्साही सैनिकों का नेतृत्व किया। इसके बाद 9 मई को, मुख्यालय 15 कोर ने एक मध्यम रेजिमेंट और 1 नागा बटालियन को बटालिक जाने का आदेश दिया। उसी दिन, दुश्मन ने कारगिल पर बहुत भारी बमबारी की। वहां के गोला-बारूद के भंडार को उड़ाने में दुश्मन सफल रहा। उस समय एससी नेगी और वाईएस राठौर, डिप्टी कमांडेंट, एडजुटेंट, ब्रिगेड के भूमिगत ऑपरेशन कक्ष में मौजूद थे। वे दैनिक ब्रीफिंग और डीब्रीफिंग में भाग ले रहे थे। भारी गोलाबारी के कारण वे सभी चार घंटे तक वहीं फंसे रहे। यह बहुत अफरा-तफरी का समय था।
पूरे शहर पर लगातार बमबारी हो रही थी। कई नागरिक मारे गए और कई घायल हो गए। योजना के अनुसार, बीएसएफ की प्रशिक्षण कंपनी को बटालिक क्षेत्र में भेजा गया। उन्हें एक पूर्व-जांच किए क्षेत्र में तैनात किया गया। उस समय श्रीनगर में लगभग 150 बीएसएफ सैनिक फंसे हुए थे, क्योंकि 'जोजी ला' अभी भी बंद था। ब्रिगेड के निर्देश पर, ज़ोजी ला को आंशिक रूप से साफ कर दिया गया। इसके बाद बीएसएफ सैनिकों को सेक्टर की व्यवस्था के तहत श्रीनगर से ज़ोजी ला और फिर वाईएस राठौर के नेतृत्व में ज़ोजी ला से चेन्नीगुंड पहुंचाया गया। उसी दिन, यूनिट को बटालिक क्षेत्र में 121 प्रशासनिक ठिकानों पर तैनात सैनिकों की जगह लेने के लिए सभी उपलब्ध सैनिकों को भेजने और पहले से तैनात सैनिकों को ऊंची चौकियों पर ले जाने का आदेश दिया गया।
यूनिट को बटालिक क्षेत्र में सिंधु नदी पर सभी पुलों पर कब्जा करने का काम सौंपा गया था। यह सबसे कठिन दौर था, क्योंकि सैनिकों को रात के अंधेरे में लाइटें बंद करके वाहनों में ले जाया जा रहा था। यह ऑपरेशन बिना किसी आराम के और भारी तोपखाने की गोलाबारी के बीच लगभग 30-36 घंटों में पूरा हुआ। बटालियन मुख्यालय चेन्नीगुंड काकसर क्षेत्र में शामिल किए जाने वाले सभी सैनिकों के लिए लॉन्चिंग पैड बना। 171 बटालियन बीएसएफ के डिप्टी कमांडेंट सुखबीर सिंह यादव, 171 बटालियन बीएसएफ के अग्रिम दल के प्रभारी अधिकारी के रूप में युद्ध के बीच पहुंचे थे।
171 बटालियन बीएसएफ के सैनिकों को सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बिना किसी अनुकूलन के भी 8 बटालियन बीएसएफ के एफडीएल में तैनात किया जाना था। यादव ने भारी गोलाबारी के बीच सैनिकों के शामिल होने की प्रक्रिया की व्यक्तिगत निगरानी करने का फैसला किया। एफडीएल में जाते समय, पाकिस्तानी तोपों से भारी गोलाबारी हो रही थी। इसके बावजूद बीएसएफ के डिप्टी कमांडेंट यादव, आगे बढ़ते रहे। यह सबसे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सैनिकों के लिए व्यक्तिगत चिंता प्रदर्शित करने का सर्वोच्च उदाहरण था।