Insaaf Ke Sipahi: इंसाफ के सिपाही लड़ेंगे 2024 का महायुद्ध, क्या विपक्षी दलों को साथ ला सकेंगे कपिल सिब्बल?
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विस्तार
पिछले कुछ दिनों में विपक्षी एकता स्थापित करने की तीन शुरुआती कोशिशें हो चुकी हैं। कांग्रेस ने रायपुर अधिवेशन में यह तय किया था कि वह 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मजबूत टक्कर देने के लिए समान विचारधारा वाले दलों को साथ लाने की कोशिश करेगी। इसके पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने न केवल विपक्षी दलों की एकता स्थापित करने का प्रयास किया, बल्कि (विपक्षी दलों की एकता में) कांग्रेस की भूमिका को स्वीकार करते हुए उसे इसके लिए पहल करने की अपील की। इन सबसे अलग, तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी को साथ लेकर एक अलग मोर्चा बनाने की भी कोशिश की है।
लेकिन अचानक ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 'एकला चलो' नीति की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी किसी विपक्षी खेमे में नहीं शामिल होगी और अपने दम पर चुनाव में उतरेगी। ममता बनर्जी की इस घोषणा ने विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की इन सभी कोशिशों की भ्रूण हत्या कर दी। यह माना जाने लगा कि 2024 को लेकर सभी दलों को एक साथ लाने की कोई कोशिश कामयाब नहीं होगी और इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।
कपिल सिब्बल की पहल
विपक्षी खेमे में छाई इसी निराशा के बीच पूर्व कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने एक नई पहल की है। उन्होंने 'इंसाफ के सिपाही' नाम से एक मंच बनाकर सभी गैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इसमें शामिल होने की अपील की है। उन्होंने इसके लिए अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, ठाकरे और केसीआर सहित कई अन्य मुख्यमंत्रियों से अपील की है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भी इससे जुड़ने के लिए आमंत्रित किया है। अरविंद केजरीवाल ने तो इस मंच से जुड़ने की न केवल घोषणा कर दी है, बल्कि दूसरे लोगों को भी इससे जुड़ने के लिए कहा है।
इंडिया अगेंस्ट करप्शन जैसा मंच
कपिल सिब्बल के इस ब्रेन चाइल्ड को इंडिया अगेंस्ट करप्शन की तर्ज पर बनाया जा रहा अराजनीतिक संगठन माना जा रहा है। इसका उद्देश्य, जैसा कि कपिल सिब्बल ने स्वयं कहा है, देश में कहीं भी हो रहे असंवैधानिक कार्यों और किसी भी वर्ग के साथ हो रहे अन्याय को रोकना है। लेकिन चूंकि, कपिल सिब्बल ने यह भी कह दिया है कि आरएसएस अपनी शाखाओं के जरिए देश में अव्यवस्था पैदा करने की कोशिश कर रहा है, समझा जा सकता है कि इसके निशाने पर भाजपा, आरएसएस और केंद्र सरकार रहने वाली हैं।
लेकिन क्या इंडिया अगेंस्ट करप्शन की तरह 'इंसाफ के सिपाही' को जनता की दृष्टि में विश्वसनीयता हासिल हो सकेगी और वह केंद्र के खिलाफ एक जनमत गढ़ने में कामयाब हो सकेगी? क्या इसके जरिए सिब्बल केंद्र के खिलाफ सभी दलों को एक साथ एक मंच पर लाने में सफल हो सकेंगे?
विश्वसनीयता की समस्या
इंडिया अगेंस्ट करप्शन की स्थापना देश में फैले भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए 26 फरवरी 2007 को की गई थी। इस संगठन ने यूपीए-2 सरकार में हुए कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ 2011-12 में दिल्ली में जमकर प्रदर्शन किया। इसका परिणाम हुआ कि मनमोहन सिंह सरकार को लोकसभा चुनाव 2014 में करारी हार का सामना करना पड़ा। इस आंदोलन की सफलता के लिए अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल जैसे उन नेताओं को श्रेय दिया जा सकता है जिनकी विश्वसनीयता जनता के बीच बहुत ज्यादा थी।
लेकिन विपक्ष के पास सबसे बड़ी समस्या 'विश्वसनीयता' की ही है। उसके पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो जनता के बीच भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की अगुवाई कर सके। विपक्ष के ज्यादातर बड़े नेताओं के ऊपर पहले ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। कई नेता पहले ही देश की विभिन्न अदालतों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अदालती कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। ऐसे में केंद्र के खिलाफ इस तरह की अगुवाई करने के लिए कोई विश्वसनीय चेहरा नहीं है जिसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।
इंडिया अगेंस्ट करप्शन के गर्भ से पैदा हुई आम आदमी पार्टी के कई नेताओं पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। इस पार्टी के मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय की हिरासत में हैं और जमानत पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार विरोधी किसी नए संगठन की छवि पर इंडिया अगेंस्ट करप्शन की 'नकारात्मक छवि' का असर दिखाई पड़ सकता है और जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता पर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
भाजपा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ेगी चुनाव
एक रणनीति के अंतर्गत भाजपा हमेशा उन मुद्दों पर चुनाव लड़ती है, जिन पर पहले की सरकारों, दूसरे राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को घेरा जा सके। किसी राज्य में सत्तारूढ़ होने के बाद भी वह अपने मुद्दों को चुनावी मुद्दा नहीं बनने देती और पूर्व की विपक्षी दलों की सरकारों के मुद्दे पर चुनाव खींच ले जाती है। भाजपा की यह रणनीतिक चतुराई गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक हर जगह देखने को मिली है।
भाजपा अगला लोकसभा चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ने की योजना बना चुकी है। विपक्षी दलों के नेताओं पर सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के द्वारा की जा रही कार्रवाई उसके इस एजेंडे को खाद-पानी देने का काम करेंगे। ऐसे में, जैसा कि इंसाफ के सिपाही का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, यदि विपक्षी दलों के द्वारा केंद्र पर विपक्षी नेताओं की केंद्रीय जांच एजेंसियों से उत्पीड़न का आरोप लगाया जाता है, वह भी भाजपा के इसी एजेंडे को पूरा करता हुआ दिखाई पड़ सकता है।
ध्यान रखना होगा कि केंद्र में दो कार्यकाल पूरा करने जा रही नरेंद्र मोदी सरकार पर अभी भी भ्रष्टाचार का कोई गंभीर आरोप नहीं चिपक सका है। तमाम सर्वेक्षण अभी भी यह बता रहे हैं कि जनता की निगाह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता बनी हुई है। ऐसे में कपिल सिब्बल का प्रयास कितना सफल हो पाएगा, इस पर कुछ कहना मुश्किल है।