बांग्लादेश का कांतोज्यू मंदिर : पूजापाठ हिंदू करते हैं तो देखभाल मुसलमानों की जिम्मेदारी
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बांग्लादेश में 90 फीसदी से अधिक आबादी मुस्लिम है। यहां मस्जिदों के अलावा कुछ मंदिर भी हैं। इनमें एक प्रमुख मंदिर है दिनाजपुर जिले के कहरोल में 18 वीं सदी का बना कांतोज्यू मंदिर। राधा-कृष्ण के इस मंदिर की खासियत यह है कि इसमें पूजापाठ हिंदू करते हैं, लेकिन इसके रखरखाव की जिम्मेदारी मुस्लिम संभालते हैं। वे रोजाना मंदिर की सफाई करते हैं। साल में दो-तीन बार मंदिर के चारों ओर बनी छोटी-छोटी मूर्तियों की पॉलिश की जाती है।
विनय कुमार मोहंतो, जो कि इस एतिहासिक मंदिर का कामकाज देखते हैं, वे कहते हैं कि ये मंदिर अब पूरी दुनिया में प्रसिद्ध होता जा रहा है। केवल भारत से ही नहीं, बल्कि अमेरिका, जर्मनी, नेपाल, श्रीलंका, जापान, मलेशिया, ब्रिटेन और सिंगापुर आदि देशों से श्रद्धालु इस मंदिर में आते हैं। मंदिर के आसपास मुस्लिम आबादी है। वे भी यहां आते हैं। इस मंदिर को बांग्लादेश सरकार ने अपनी धरोहर घोषित किया है।
स्थानीय पुलिस भी यहां तैनात की गई है। खास बात है कि यहां पर कभी कोई ऐसी घटना नहीं हुई, जिससे मंदिर में पूजापाठ करने वाले लोगों को भय महसूस हुआ हो। रोजाना एक हजार से ज्यादा लोग यहां आते हैं। इनमें अधिकांश पर्यटक होते हैं। साल में एक बार मेला लगता है। मंदिर की हर एक टाइल पर महाभारत और रामायण काल की घटनाओं और प्रसंगों का उल्लेख है। कलाकृतियों के जरिए गीता में लिखी बातों को समझाने का प्रयास किया गया है।
दर्शनों के वक्त मूर्ति बरामदे में रखी जाती है, बाद में अंदर ले जाते हैं
विनय कुमार मोहंतो बताते हैं, कांतोज्यू मंदिर की एक बड़ी खासियत यह है कि यहां पर राधा-कृष्ण की मूर्तियां स्थायी नहीं हैं। दिन में इन मूर्तियों को दर्शन के लिए बरामदे में रखा जाता है। शाम को ये मूर्तियां वापस अंदर रख दी जाती हैं। शुरू से यही परंपरा चली आ रही है। इसकी वजह ये है कि मंदिर ऊंचाई पर है और यहां एक साथ ज्यादा लोगों के खड़े होने की जगह नहीं है, इसलिए मंदिर के नीचे खड़े होकर राधा-कृष्ण के दर्शन किए जाते हैं। बरामदे में मूर्तियों को रखने के लिए आसन बनाया गया है।
1704 में रखी गई थी आधारशिला, 48 साल में पूरा हुआ निर्माण कार्य
बताते हैं कि साल 1704 में दिनाजपुर के राजा प्राणनाथ ने इस मंदिर की आधारशिला रखी थी। करीब 48 साल में यह नौ मंजिला मंदिर पूरा हो सका। हालांकि जब साल 1752 में यह मंदिर बनकर पूरा हुआ तब तक प्राणनाथ का स्वर्गवास हो चुका था। उनके बेटे राजा रामनाथ ने इस मंदिर का निर्माण कार्य पूरा कराया। यह मंदिर टेराकोटा भवन शैली का बेजोड़ नमूना है। साल 1897 में जब यहां भूकंप आया तो मंदिर की कई मंजिलें गिर गई थीं।
मुस्लिम अपनी दुकानों-घरों से बाहर निकल कर देखते हैं शोभायात्रा
राजा रामनाथ के समय से ही यहां पर एक परंपरा चलती आ रही है। जन्माष्टमी के दिन राधा- कृष्ण की मूर्ति को राजमहल में ले जाया जाता था। उस दिन पूरे शहर को सजाया जाता था। अब राजा तो रहे नहीं, लेकिन उनकी परंपराओं का सम्मान अभी तक जारी है। शोभायात्रा के जरिए इन मूर्तियों को नाव में रखकर राजा के महल तक ले जाया जाता है। यह मूर्ति करीब दो माह तक वहीं रहती है। उसके बाद इसे सड़क मार्ग से दोबारा मंदिर में लाते हैं। जब यह शोभायात्रा शहर की सड़कों पर पहुंचती है तो मुस्लिम समुदाय के लोग अपनी दुकानों और घरों से बाहर निकलकर शोभायात्रा देखते हैं। कई जगह इन मूर्तियों पर माल्यार्पण भी होता है।