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कानों देखी: योगी जी और 2019, प्रियंका संभालेंगी जिम्मेदारी
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 27 Aug 2018 09:51 PM IST
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प्रियंका गांधी वाड्रा
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योगी जी और 2019
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार कदम उठा रहे हैं। वहीं भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और संघ दोनों राज्य के हालात से खुश नहीं है। पार्टी के अंदरुनी सूत्रों का मानना है कि यही हाल रहा तो लोकसभा चुनाव में नुकसान बड़ा हो सकता है। लेकिन योगी की कुछ अपनी समस्याएं हैं। राज्य के मंत्रियों के सुर भी अपने हिसाब से चल रहे हैं।
दूसरे योगी ने साफ कर दिया है कि वह तो योगी संन्यासी हैं। उनका रुपये-पैसे से क्या लेना-देना। इसलिए वह सबकुछ कर सकते हैं, लेकिन पार्टी के अन्य संसाधनों का इंतजाम उनसे संभव नहीं है। बताते हैं कि इसके लिए भी बीच का रास्ता निकाला जा रहा है।
केंद्र सरकार चाहती है कि भाजपा शासित सभी राज्य अपने यहां सरकारी पदों समेत अन्य पर भर्ती प्रक्रिया तेजी से शुरू करें। केंद्र सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं का जमीनी स्तर पर प्रचार प्रसार हो। इस मामले में योगी सरकार लगातार सक्रिय है, लेकिन इन सबके बावजूद वह पार्टी कार्यकर्ताओं और संघ के लोगों को खुश नहीं कर पा रहे हैं।
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मैं थारे से दूर कब था?
राजस्थान राजनीतिक रूप से तिलिस्मी राज्य बन रहा है। सरकारी अधिकारी भी मानने लगे हैं कि स्विंग स्टेट में चुनाव बाद वसुंधरा की सरकार आनी मुश्किल है। जनता वसुंधरा से नाराज है और सरकार विरोधी लहर है। भाजपा भी मजबूरी में वसुंधरा के चेहरे को आगे रखकर चुनाव अभियान का आगाज कर चुकी है। वसुंधरा की निगाह चेहरा घोषित होने के बाद भाजपा के राज्य स्तरीय संगठन, उसके कामकाज, टिकट बंटवारे पर पूरा हस्तक्षेप बनाए रखने की है।
इसको लेकर अंदरूनी टसल का दूसरा भाग जारी हैं। इसके सामानांतर कांग्रेस ने सचिन पायलट को राज्य का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। वह खुद को अपना चेहरा पेश करके चल रहे हैं। लेकिन सचिन पायलट की लोकप्रियता अशोक गहलोत के मुकाबले कम है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सीपी जोशी समेत अन्य नेताओं को मिशन राजस्थान के लिए फ्री कर दिया है।
कांग्रेस अध्यक्ष चाहते हैं कि अशोक गहलोत राज्य में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के लिए हर स्तर पर अपना सहयोग दें, लेकिन खुद को केंद्रीय राजनीति के लिए ठीक समझें। वहीं जब राजस्थान में कोई गहलोत से पार्टी के भावी मुख्यमंत्री के चेहरे के पूछता है तो कह देते हैं कि मैं थारे से दूर कब था?
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार कदम उठा रहे हैं। वहीं भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और संघ दोनों राज्य के हालात से खुश नहीं है। पार्टी के अंदरुनी सूत्रों का मानना है कि यही हाल रहा तो लोकसभा चुनाव में नुकसान बड़ा हो सकता है। लेकिन योगी की कुछ अपनी समस्याएं हैं। राज्य के मंत्रियों के सुर भी अपने हिसाब से चल रहे हैं।
दूसरे योगी ने साफ कर दिया है कि वह तो योगी संन्यासी हैं। उनका रुपये-पैसे से क्या लेना-देना। इसलिए वह सबकुछ कर सकते हैं, लेकिन पार्टी के अन्य संसाधनों का इंतजाम उनसे संभव नहीं है। बताते हैं कि इसके लिए भी बीच का रास्ता निकाला जा रहा है।
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केंद्र सरकार चाहती है कि भाजपा शासित सभी राज्य अपने यहां सरकारी पदों समेत अन्य पर भर्ती प्रक्रिया तेजी से शुरू करें। केंद्र सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं का जमीनी स्तर पर प्रचार प्रसार हो। इस मामले में योगी सरकार लगातार सक्रिय है, लेकिन इन सबके बावजूद वह पार्टी कार्यकर्ताओं और संघ के लोगों को खुश नहीं कर पा रहे हैं।
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मैं थारे से दूर कब था?
राजस्थान राजनीतिक रूप से तिलिस्मी राज्य बन रहा है। सरकारी अधिकारी भी मानने लगे हैं कि स्विंग स्टेट में चुनाव बाद वसुंधरा की सरकार आनी मुश्किल है। जनता वसुंधरा से नाराज है और सरकार विरोधी लहर है। भाजपा भी मजबूरी में वसुंधरा के चेहरे को आगे रखकर चुनाव अभियान का आगाज कर चुकी है। वसुंधरा की निगाह चेहरा घोषित होने के बाद भाजपा के राज्य स्तरीय संगठन, उसके कामकाज, टिकट बंटवारे पर पूरा हस्तक्षेप बनाए रखने की है।
इसको लेकर अंदरूनी टसल का दूसरा भाग जारी हैं। इसके सामानांतर कांग्रेस ने सचिन पायलट को राज्य का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। वह खुद को अपना चेहरा पेश करके चल रहे हैं। लेकिन सचिन पायलट की लोकप्रियता अशोक गहलोत के मुकाबले कम है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सीपी जोशी समेत अन्य नेताओं को मिशन राजस्थान के लिए फ्री कर दिया है।
कांग्रेस अध्यक्ष चाहते हैं कि अशोक गहलोत राज्य में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के लिए हर स्तर पर अपना सहयोग दें, लेकिन खुद को केंद्रीय राजनीति के लिए ठीक समझें। वहीं जब राजस्थान में कोई गहलोत से पार्टी के भावी मुख्यमंत्री के चेहरे के पूछता है तो कह देते हैं कि मैं थारे से दूर कब था?
रॉ के पूर्व सचिव आलोक जोशी रह गए...
रामनाथ कोविंद और सत्यपाल मलिक
जोशी जी रह गए
सबसे चौंकाने वाली खबर जम्मू-कश्मीर से हैं। वहां अमित शाह ने अपने करीबी और बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक को गवर्नर बनवा दिया। पूरे राजनीतिक जीवन में सत्ता से करीब का रिश्ता रखने वाले मलिक की तैनाती ने प्रशासनिक हलके में हलचल सी मचा दी है। हलचल यूं है कि इस पद पर कुछ जाने माने पूर्व खुफिया और जांच अधिकारियों की निगाह थी।
एनआईए के पूर्व चीफ शरद कुमार, आईबी के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा और रॉ के पूर्व सचिव आलोक जोशी भी इस दौड़ में शामिल थे। अपने एनसीए की पहली पसंद दिनेश्वर शर्मा थे, लेकिन कहा जा रहा है कि उनके नाम पर पीएमओ को कुछ आपत्ति थी। इसके बाद उत्तराखंड के आलोक जोशी सबसे प्रबल उम्मीदवार माने जा रहे थे।
समझा जा रहा था कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल वोहरा जी को मिली दो माह का सेवा विस्तार पूरा होने के बाद कभी भी जोशी की भाग्य का पिटारा खुल सकता है, लेकिन शाह की सलाह पर पूरा पासा ही पलट गया। अब देखना है जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार का यह दांव कितना सफल हो पाता है।
प्रियंका संभालेंगी जिम्मेदारी
प्रियंका गांधी को बड़ी जिम्मेदारी संभालनी पड़ सकती है। वैसे प्रियंका पिछले कई सालों से काफी बड़ी जिम्मेदारी संभाल रही हैं। वह बिना सामने आए, कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी रणनीतिकार की भूमिका निभा रही हैं। पार्टी के प्लेनरी सेशन से लेकर हर तैयारी में प्रियंका की पर्दे के पीछे से भूमिका रहती हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल में भी प्रियंका की भूमिका थी।
वह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कार्यालय की भी खोज-खबर लेती रहती थीं, लेकिन अब इससे काम नहीं चलने वाला है। प्रियंका की इस जरूरत को न केवल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, बल्कि यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी भी समझ रही हैं। कारण साफ है कि सोनिया गांधी की तबियत अच्छी नहीं चल रही है। चिकित्सकों ने सोनिया को नमी, धूप, धूल, ठंड से सावधान रहने की चेतावनी पर विशेष सलाह दी है।
वहीं राहुल गांधी के ऊपर काम का बोझ काफी बढ़ गया है। कांग्रेस पार्टी भी काफी युवा हो गई है। देश युवा भी प्रियंका गांधी से तेजी से कनेक्ट हो रहे हैं। प्रस्तावित लोकसभा चुनाव भी कांग्रेस के लिए करो या मरो जैसी स्थिति लेकर आ रहा है। इसलिए ऐसे संकेत हैं कि प्रियंका गांधी को कांग्रेस पार्टी प्रचार अभियान जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकती है।
सबसे चौंकाने वाली खबर जम्मू-कश्मीर से हैं। वहां अमित शाह ने अपने करीबी और बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक को गवर्नर बनवा दिया। पूरे राजनीतिक जीवन में सत्ता से करीब का रिश्ता रखने वाले मलिक की तैनाती ने प्रशासनिक हलके में हलचल सी मचा दी है। हलचल यूं है कि इस पद पर कुछ जाने माने पूर्व खुफिया और जांच अधिकारियों की निगाह थी।
एनआईए के पूर्व चीफ शरद कुमार, आईबी के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा और रॉ के पूर्व सचिव आलोक जोशी भी इस दौड़ में शामिल थे। अपने एनसीए की पहली पसंद दिनेश्वर शर्मा थे, लेकिन कहा जा रहा है कि उनके नाम पर पीएमओ को कुछ आपत्ति थी। इसके बाद उत्तराखंड के आलोक जोशी सबसे प्रबल उम्मीदवार माने जा रहे थे।
समझा जा रहा था कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल वोहरा जी को मिली दो माह का सेवा विस्तार पूरा होने के बाद कभी भी जोशी की भाग्य का पिटारा खुल सकता है, लेकिन शाह की सलाह पर पूरा पासा ही पलट गया। अब देखना है जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार का यह दांव कितना सफल हो पाता है।
प्रियंका संभालेंगी जिम्मेदारी
प्रियंका गांधी को बड़ी जिम्मेदारी संभालनी पड़ सकती है। वैसे प्रियंका पिछले कई सालों से काफी बड़ी जिम्मेदारी संभाल रही हैं। वह बिना सामने आए, कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी रणनीतिकार की भूमिका निभा रही हैं। पार्टी के प्लेनरी सेशन से लेकर हर तैयारी में प्रियंका की पर्दे के पीछे से भूमिका रहती हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल में भी प्रियंका की भूमिका थी।
वह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कार्यालय की भी खोज-खबर लेती रहती थीं, लेकिन अब इससे काम नहीं चलने वाला है। प्रियंका की इस जरूरत को न केवल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, बल्कि यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी भी समझ रही हैं। कारण साफ है कि सोनिया गांधी की तबियत अच्छी नहीं चल रही है। चिकित्सकों ने सोनिया को नमी, धूप, धूल, ठंड से सावधान रहने की चेतावनी पर विशेष सलाह दी है।
वहीं राहुल गांधी के ऊपर काम का बोझ काफी बढ़ गया है। कांग्रेस पार्टी भी काफी युवा हो गई है। देश युवा भी प्रियंका गांधी से तेजी से कनेक्ट हो रहे हैं। प्रस्तावित लोकसभा चुनाव भी कांग्रेस के लिए करो या मरो जैसी स्थिति लेकर आ रहा है। इसलिए ऐसे संकेत हैं कि प्रियंका गांधी को कांग्रेस पार्टी प्रचार अभियान जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकती है।
रंग लाई शाह की मुहिम
Amit Shah
कर्नाटक में यह कैसा नाटक
कर्नाटक में न जाने कैसा नाटक चल रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या का मिजाज अभी भी मुख्यमंत्री वाला ही है। वह रह-रहकर अपने बयानों से नई मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। दूसरी बड़ी मुसीबत खुद राज्य के रोमांटिक मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी बन रहे हैं। वह कभी सार्वजनिक तौर पर रो देते हैं, कभी कांग्रेस के साथ गठबंधन को विष का प्याला पीने की मजबूरी बता देते हैं।
यहां तक तो ठीक है, लेकिन इन दिनों उनके रोमांटिक अंदाज की चर्चा तेज हो गई है। दो शादी वह पहले ही कर चुके हैं। इसके बरक्स एक स्थिति और है। राज्य के कांग्रेस और जद (एस) मंत्रियों, मुख्यमंत्री के बीच तालमेल भी नहीं बन पा रहा है। हालांकि एचडी कुमारस्वामी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से काफी खुश हैं।
उन्हें यह अच्छा लग रहा है कि कर्नाटक सरकार द्वारा किसानों का कर्जा माफ करने का खूब प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इन सबके साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा ने भी वहां सारे घोड़े खोल रखे हैं। भाजपा इंतजार कर रही है कि कांग्रेस-जद (एस) का मोह भंग हो।
रंग लाई शाह की मुहिम
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के राजनीतिक कौशल का जवाब नहीं। वह राजनीति की नब्ज टटोल लेते हैं। तमिल नाडु की राजनीति की नई आहट को वह पहचान रहे हैं। उन्हें पता है कि डीएमके के स्व. नेता एम करुणानिधि के दोनों बेटे के बीच में संघर्ष तेज हो चुका है। स्टालिन अपना दबदबा बनाए रखने के लिए जूझ रहे हैं तो उनके बड़े भाई अलागिरी राजनीतिक विरासत संभालने के लिए हर जंग लड़ लेना चाहते हैं।
इसी तरह से एआईडीएमके की सरकार में मुख्यमंत्री ई पलानिस्वामी, डिप्टी सीएम ओ पनीरसेल्म और टीटीवी दिनाकरण के बीच कोई स्थाई भाव वाला सामंजस्य नहीं बन पा रहा है। लिहाजा अमित शाह ने कलैनार (करुणानिधि) की आत्मा की शांति के लिए होने वाली प्रार्थना सभा तथा कार्यक्रम का निमंत्रण मिलते ही उसमें जाने की सहमति दे दी है।
इस आशय पत्र भी डीएमके मुख्यालय भेज दिया गया है। इस कार्यक्रम में डीएमके ने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को आमंत्रित किया है। कई दल के नेता अपने प्रतिनिधि भेजेंगे, जबकि अमित शाह खुद जाएंगे। इस तरह से यह पहला अवसर होगा, जब डीएमके के मंच पर विपक्ष के नेताओं के साथ अमित शाह भी होंगे। शाह की इस पहल को उनका तुरुप का पत्ता भी माना जा रहा है।
कर्नाटक में न जाने कैसा नाटक चल रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या का मिजाज अभी भी मुख्यमंत्री वाला ही है। वह रह-रहकर अपने बयानों से नई मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। दूसरी बड़ी मुसीबत खुद राज्य के रोमांटिक मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी बन रहे हैं। वह कभी सार्वजनिक तौर पर रो देते हैं, कभी कांग्रेस के साथ गठबंधन को विष का प्याला पीने की मजबूरी बता देते हैं।
यहां तक तो ठीक है, लेकिन इन दिनों उनके रोमांटिक अंदाज की चर्चा तेज हो गई है। दो शादी वह पहले ही कर चुके हैं। इसके बरक्स एक स्थिति और है। राज्य के कांग्रेस और जद (एस) मंत्रियों, मुख्यमंत्री के बीच तालमेल भी नहीं बन पा रहा है। हालांकि एचडी कुमारस्वामी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से काफी खुश हैं।
उन्हें यह अच्छा लग रहा है कि कर्नाटक सरकार द्वारा किसानों का कर्जा माफ करने का खूब प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इन सबके साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा ने भी वहां सारे घोड़े खोल रखे हैं। भाजपा इंतजार कर रही है कि कांग्रेस-जद (एस) का मोह भंग हो।
रंग लाई शाह की मुहिम
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के राजनीतिक कौशल का जवाब नहीं। वह राजनीति की नब्ज टटोल लेते हैं। तमिल नाडु की राजनीति की नई आहट को वह पहचान रहे हैं। उन्हें पता है कि डीएमके के स्व. नेता एम करुणानिधि के दोनों बेटे के बीच में संघर्ष तेज हो चुका है। स्टालिन अपना दबदबा बनाए रखने के लिए जूझ रहे हैं तो उनके बड़े भाई अलागिरी राजनीतिक विरासत संभालने के लिए हर जंग लड़ लेना चाहते हैं।
इसी तरह से एआईडीएमके की सरकार में मुख्यमंत्री ई पलानिस्वामी, डिप्टी सीएम ओ पनीरसेल्म और टीटीवी दिनाकरण के बीच कोई स्थाई भाव वाला सामंजस्य नहीं बन पा रहा है। लिहाजा अमित शाह ने कलैनार (करुणानिधि) की आत्मा की शांति के लिए होने वाली प्रार्थना सभा तथा कार्यक्रम का निमंत्रण मिलते ही उसमें जाने की सहमति दे दी है।
इस आशय पत्र भी डीएमके मुख्यालय भेज दिया गया है। इस कार्यक्रम में डीएमके ने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को आमंत्रित किया है। कई दल के नेता अपने प्रतिनिधि भेजेंगे, जबकि अमित शाह खुद जाएंगे। इस तरह से यह पहला अवसर होगा, जब डीएमके के मंच पर विपक्ष के नेताओं के साथ अमित शाह भी होंगे। शाह की इस पहल को उनका तुरुप का पत्ता भी माना जा रहा है।
गोहिल बाबा ....सच क्या है
शक्ति सिंह गोहिल
कांग्रेस के नेता शक्ति सिंह गोहिल को लेकर कांग्रेस की परेशानी बढ़ सकती है। युवा उत्साही नेता शक्ति सिंह गोहिल को जांच एजेंसी सीबीआई भी पूछताछ के लिए बुला सकती है। गोहिल बिहार से कांग्रेस के प्रभारी हैं।
खबर है कि गोहिल का नाम किसी न किसी रूप से मुजफ्फरपुर शेल्टर होम से जुड़ रहा है। कांग्रेस पार्टी मुख्यालय ने इस तरह की सभी खबरों को लेकर अपनी संवेदनशीलता बढ़ा दी है। बताते हैं गुजरात के ही युवा नेता अल्पेश ठाकोर का धीरे-धीरे कद बढ़ाया जा रहा है।
यह भी संभव है कि गोहिल पर जांच एजेंसी का खतरा बढऩे के बाद कांग्रेस ऑपरेशन डैमेज कंट्रोल में अल्पेश की सहायता ले। फिलहाल अभी इस बारे में पूरा सच सामने आना बाकी है।
अनिल एंटोनी की सक्रियता
अनिल एंटोनी की सक्रियता कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को रिझाने लगी है। अनिल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटोनी के बेटे हैं। वह पार्टी वरिष्ठ नेता अहमद पटेल के पुत्र के साथ केरल में काफी कड़ी मेहनत कर रहे हैं। बाढ़ पीडि़तों को राहत पहुंचाने के अभियान में वह अपना योगदान दे रहे हैं।
माना जा रहा है कि केरल कांग्रेस में जल्द ही अनिल एंटोनी को कोई जिम्मेदारी भी मिल सकती है। हालांकि एके एंटोनी अभी इसके खिलाफ हैं। एके एंटोनी की पत्नी एलिजाबेथ भी इसके पक्ष में नहीं हैं। एंटनी दंपति वैसे भी अपने दायरे में रहकर ईमानदारी से भरे सभ्य आचरण के लिए जाने जाते हैं। लेकिन अनिल की सक्रियता का उन्हें ईनाम तो मिलना ही चाहिए। वैसे भी वह एक मानवीय काम कर रहे हैं।
खबर है कि गोहिल का नाम किसी न किसी रूप से मुजफ्फरपुर शेल्टर होम से जुड़ रहा है। कांग्रेस पार्टी मुख्यालय ने इस तरह की सभी खबरों को लेकर अपनी संवेदनशीलता बढ़ा दी है। बताते हैं गुजरात के ही युवा नेता अल्पेश ठाकोर का धीरे-धीरे कद बढ़ाया जा रहा है।
यह भी संभव है कि गोहिल पर जांच एजेंसी का खतरा बढऩे के बाद कांग्रेस ऑपरेशन डैमेज कंट्रोल में अल्पेश की सहायता ले। फिलहाल अभी इस बारे में पूरा सच सामने आना बाकी है।
अनिल एंटोनी की सक्रियता
अनिल एंटोनी की सक्रियता कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को रिझाने लगी है। अनिल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटोनी के बेटे हैं। वह पार्टी वरिष्ठ नेता अहमद पटेल के पुत्र के साथ केरल में काफी कड़ी मेहनत कर रहे हैं। बाढ़ पीडि़तों को राहत पहुंचाने के अभियान में वह अपना योगदान दे रहे हैं।
माना जा रहा है कि केरल कांग्रेस में जल्द ही अनिल एंटोनी को कोई जिम्मेदारी भी मिल सकती है। हालांकि एके एंटोनी अभी इसके खिलाफ हैं। एके एंटोनी की पत्नी एलिजाबेथ भी इसके पक्ष में नहीं हैं। एंटनी दंपति वैसे भी अपने दायरे में रहकर ईमानदारी से भरे सभ्य आचरण के लिए जाने जाते हैं। लेकिन अनिल की सक्रियता का उन्हें ईनाम तो मिलना ही चाहिए। वैसे भी वह एक मानवीय काम कर रहे हैं।