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न्याय: मनोरोगी महिला के बयान पर दुष्कर्म के दोषी ने उठाया सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी सजा

Thu, 12 Aug 2021 05:28 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Thu, 12 Aug 2021 05:28 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने एक मनोरोगी महिला द्वारा उसके साथ हुए दुष्कर्म की घटना को लेकर दी गई गवाही को विश्वसनीय मानते हुए दोषी की 10 साल की सजा कायम रखी है। महिला के साथ उत्तराखंड में दुष्कर्म की वारदात हुई थी। 
 

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Justice: The rape convict raised the question on the statement of mentally challenged woman, the Supreme Court upheld the sentence
Supreme Court - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनाए गए एक अहम फैसले में एक मनोरोगी महिला के साथ दुष्कर्म के दोषी को निचली कोर्ट द्वारा सुनाई गई 10 साल की सजा बरकरार रखी है। निचली कोर्ट ने पीड़िता की गवाही सवालों के जवाब हां या ना में देकर कराने की इजाजत दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस गवाही को विश्वसनीय माना है। दोषी व्यक्ति ने अपनी अपील में महिला के बयान पर सवाल उठाए थे। 

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36 साल की पीड़िता मानसिक रूप से 70 फीसदी अक्षम है। उसके साथ सितंबर 2015 में उत्तराखंड में दुष्कर्म हुआ था। निचली कोर्ट में गवाही के पूर्व उसे शपथ नहीं दिलाई जा सकी थी, क्योंकि वह उसका अर्थ समझने में असमर्थ थी। उत्तराखंड की कोर्ट ने आरोपी को अक्तूबर 2016 में 10 साल के कारावास की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कूट परीक्षण के दौरान पीड़िता ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री की तस्वीरों को सही ढंग से पहचाना था। 
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इसके बाद दोषी व्यक्ति ने मार्च 2019 में निचली कोर्ट के फैसले को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उसने अपील खारिज करते हुए दोषी की सजा कायम रखी थी। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। 
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गुरुवार को यह मामला सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एल. नागेश्वर राव व जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने सुना। पीठ ने कहा कि सबूतों में कुछ विरोधाभास है, लेकिन हमारा मत है कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है और उसके आधार पर भादंवि की धारा 376 (2)(l) के  तहत दोषी को सजा सुनाई जा सकती है। इस धारा के साथ मनोरोगी या शारीरिक रूप से दिव्यांग महिला के साथ दुष्कर्म के आरोपी को दंडित किया जाता है। 


दोषी के वकील ने कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई मेडिकल सबूत नहीं है, क्योंकि एफआईआर दर्ज करने व मेडिकल कराने में देरी हुई। वकील ने यह भी दलील दी कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास है। इस पर सरकारी वकील ने पीड़िता के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि यह स्पष्ट है कि यह दुष्कर्म का मामला है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने रिकॉर्ड पर रखे गए सारे सबूतों व सामग्री को सावधानीपूर्वक देखा है। अपीलकर्ता के वकील की दलीलों पर विचार के बाद हम इस बात से सहमत नहीं हैं कि निचली कोर्ट ने सजा सुनाने में चूक की। इसके साथ ही अपील खारिज कर दी गई। 

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