जल्दी मुकदमा निपटाने में ध्यान रहे न्याय की हत्या न हो : सुप्रीम कोर्ट
- जस्टिस यूयू ललित, इंदु मल्होत्रा और कृष्ण मुरारी की पीठ ने सुनाया फैसला
- नौ साल की बच्ची से दुष्कर्म और उसकी हत्या के मामले में मौत की सजा पर रोक
- 13 दिन की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने लिया फैसला, दोबारा होगी सुनवाई
- निचली अदालत ने सुनाई थी फांसी की सजा, मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बरकरार रखी थी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
नाबालिग से दुष्कर्म एवं हत्या के मामले में 13 की सुनवाई के बाद मौत की सजा पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि आपराधिक मामलों के त्वरित निपटारे में न्याय की हत्या न हो।
जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने नाबालिग से दुष्कर्म व हत्या के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए इस मामले में दोबारा सुनवाई करने का आदेश दिया।
18 दिसंबर को दिए आदेश में पीठ ने कहा, मुकदमों का तेजी से निपटारा करने की जरूरत है लेकिन इसमें इस बात की पूरी गारंटी होनी चाहिए कि न्याय हुआ है। ऐसा न हो कि मामले को जल्दी निपटाने के लिए न्याय से समझौता हो और उसे दफन कर दिया जाए। इसमें यह भी जरूरी है कि आरोपी को अपना पक्ष रखने का पूरा समय दिया जाए।
पीठ अनोखीलाल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसे मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने नौ साल की बच्ची से रेप और उसकी हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए निचली अदालत से मिली फांसी की सजा को बरकरार रखा था। निचली अदालत ने महज 13 दिन की सुनवाई के बाद आरोपी को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।
सात तारीखों में दर्ज किए 13 गवाहों के बयान
पीठ ने गौर किया कि 30 जनवरी 2013 की वारदात में आरोपी को 4 फरवरी को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद निचली अदालत ने 26 फरवरी तक सात तारीखों में 13 गवाहों के बयान दर्ज किए और अगली पांच तारीखों में सुनवाई के बाद 4 मार्च 2013 को फांसी की सजा सुना दी। पीठ ने कहा, निचली अदालत का रवैया इस केस में सही नहीं था। जून 2013 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को कायम रखने का आदेश दिया।
कहां हुई गड़बड़ी
आरोपी की ओर से पेश वकील सिद्धार्थ लूथरा ने पीठ को बताया कि आरोपी का बचाव करने के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा नियुक्त अमाइकस क्यूरी को मामले का अध्ययन करने और उचित निर्देश प्राप्त करने का वक्त नहीं दिया गया। उसे अभियुक्त से बातचीत करने का भी पर्याप्त अवसर नहीं मिला। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी प्रोबेशन अधिकारी से कोई रिपोर्ट प्राप्त नहीं की गई थी, जो इस बात के लिए मूल्यवान इनपुट दे सकते थे कि क्या मामले में किसी तरह की छूट दी जा सकती है।
अमाइकस क्यूरी की नियुक्ति के भी दिए दिशा निर्देश
पीठ ने आजीवन कारावास या मौत की सजा के मामले में अमाइकस क्यूरी नियुक्त करने को लेकर भी कुछ दिशा निर्देश जारी किए। पीठ ने कहा, कम से कम 10 साल के अभ्यास वाले वकील को ही अमाइकस क्यूरी नियुक्त किया जाना चाहिए। इसके अलावा मौत की सजा की पुष्टि के संबंध में हाईकोर्ट द्वारा निपटाये गए मामलों में कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को पहले अमाइकस क्यूरी के तौर पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही यह भी जरूरी है कि अमाइकस क्यूरी को मामले का अध्ययन करने के लिए कम से कम 7 दिन का समय दिया जाए।