{"_id":"68d52c4edd4adc55820d50d4","slug":"judicial-service-advocacy-experience-case-supreme-court-reserve-decision-district-judge-appoint-eligibility-2025-09-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"SC: न्यायिक सेवा और वकालत के अनुभव पर बहस, सुप्रीम कोर्ट ने जिला जज नियुक्ति पात्रता पर सुरक्षित रखा फैसला","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
SC: न्यायिक सेवा और वकालत के अनुभव पर बहस, सुप्रीम कोर्ट ने जिला जज नियुक्ति पात्रता पर सुरक्षित रखा फैसला
Thu, 25 Sep 2025 05:19 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Thu, 25 Sep 2025 05:19 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने जिला जज पद पर बार कोटे से नियुक्ति की पात्रता को लेकर फैसला सुरक्षित रखा है। सवाल यह है कि क्या ऐसे न्यायिक अधिकारी, जिन्होंने बेंच पर आने से पहले सात साल वकालत की हो, बार कोटे से नियुक्त हो सकते हैं। यह मामला अनुच्छेद 233 की व्याख्या से जुड़ा है और न्यायिक भर्ती प्रक्रिया पर व्यापक असर डाल सकता है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उस अहम सवाल पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है जिसमें यह तय किया जाना है कि क्या ऐसे न्यायिक अधिकारी, जिन्होंने बेंच जॉइन करने से पहले सात साल तक वकालत की हो, उन्हें बार कोटे के तहत जिला जज नियुक्त किया जा सकता है। इस मुद्दे पर पूरे देश में न्यायिक भर्ती प्रक्रिया पर असर पड़ने की संभावना है।
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले में 30 याचिकाओं पर सुनवाई की। पीठ में जस्टिस एम एम सुंदरेश, अरविंद कुमार, एस सी शर्मा और के विनोद चंद्रन शामिल थे। यह पीठ संविधान के अनुच्छेद 233 की व्याख्या कर रही है, जो जिला जजों की नियुक्ति से जुड़ा है।
अनुच्छेद 233 क्या कहता है
अनुच्छेद 233 के अनुसार, जिला जजों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा संबंधित हाईकोर्ट से परामर्श के बाद की जाती है। इसमें यह भी कहा गया है कि जो व्यक्ति पहले से ही केंद्र या राज्य की सेवा में नहीं है, वह तभी जिला जज बनने के योग्य होगा जब उसने कम से कम सात साल तक अधिवक्ता या वकील के रूप में काम किया हो और हाईकोर्ट उसे नियुक्ति की अनुशंसा करे।
विज्ञापन
बार और सेवा अनुभव का विवाद
सुप्रीम कोर्ट अब यह तय करेगा कि क्या बार में की गई प्रैक्टिस और उसके बाद की न्यायिक सेवा का संयुक्त अनुभव सात साल की पात्रता अवधि में गिना जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने इस दौरान सावधान किया कि ऐसा न हो कि केवल दो साल प्रैक्टिस करने वाला भी इस व्याख्या के तहत पात्र बन जाए। यह मामला जिला जजों और अतिरिक्त जिला जजों की सीधी भर्ती से जुड़ा है।
मामला कैसे सामने आया?
इस मुद्दे को पहले तीन जजों की बेंच ने पांच सदस्यीय संविधान पीठ को रेफर किया था। मामला एक केरल हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ा है, जिसमें एक जिला जज की नियुक्ति को इसलिए रद्द कर दिया गया था क्योंकि नियुक्ति के समय वह अधिवक्ता नहीं बल्कि न्यायिक सेवा में था। हालांकि याचिकाकर्ता का कहना था कि आवेदन के समय उसके पास बार में सात साल का अनुभव था।
भर्ती प्रक्रिया पर असर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तय करेगा कि क्या निचली न्यायिक सेवा में कार्यरत अधिकारी भी बार कोटे के तहत जिला जज पद के लिए आवेदन कर सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो यह देशभर में न्यायिक भर्ती की मौजूदा व्यवस्था को बदल देगा। यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि एडीजे के पद प्रमोशन और वकीलों की सीधी भर्ती दोनों माध्यमों से भरे जाते हैं।
पारदर्शिता और न्यायिक ढांचा
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न्यायिक सेवा और वकालत दोनों से जुड़े उम्मीदवारों के भविष्य को प्रभावित करेगा। यह फैसला आने वाले वर्षों में जिला न्यायपालिका के स्वरूप और पारदर्शिता को भी नया आयाम देगा।
विज्ञापन
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले में 30 याचिकाओं पर सुनवाई की। पीठ में जस्टिस एम एम सुंदरेश, अरविंद कुमार, एस सी शर्मा और के विनोद चंद्रन शामिल थे। यह पीठ संविधान के अनुच्छेद 233 की व्याख्या कर रही है, जो जिला जजों की नियुक्ति से जुड़ा है।
विज्ञापन
अनुच्छेद 233 क्या कहता है
अनुच्छेद 233 के अनुसार, जिला जजों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा संबंधित हाईकोर्ट से परामर्श के बाद की जाती है। इसमें यह भी कहा गया है कि जो व्यक्ति पहले से ही केंद्र या राज्य की सेवा में नहीं है, वह तभी जिला जज बनने के योग्य होगा जब उसने कम से कम सात साल तक अधिवक्ता या वकील के रूप में काम किया हो और हाईकोर्ट उसे नियुक्ति की अनुशंसा करे।
विज्ञापन
बार और सेवा अनुभव का विवाद
सुप्रीम कोर्ट अब यह तय करेगा कि क्या बार में की गई प्रैक्टिस और उसके बाद की न्यायिक सेवा का संयुक्त अनुभव सात साल की पात्रता अवधि में गिना जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने इस दौरान सावधान किया कि ऐसा न हो कि केवल दो साल प्रैक्टिस करने वाला भी इस व्याख्या के तहत पात्र बन जाए। यह मामला जिला जजों और अतिरिक्त जिला जजों की सीधी भर्ती से जुड़ा है।
मामला कैसे सामने आया?
इस मुद्दे को पहले तीन जजों की बेंच ने पांच सदस्यीय संविधान पीठ को रेफर किया था। मामला एक केरल हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ा है, जिसमें एक जिला जज की नियुक्ति को इसलिए रद्द कर दिया गया था क्योंकि नियुक्ति के समय वह अधिवक्ता नहीं बल्कि न्यायिक सेवा में था। हालांकि याचिकाकर्ता का कहना था कि आवेदन के समय उसके पास बार में सात साल का अनुभव था।
भर्ती प्रक्रिया पर असर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तय करेगा कि क्या निचली न्यायिक सेवा में कार्यरत अधिकारी भी बार कोटे के तहत जिला जज पद के लिए आवेदन कर सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो यह देशभर में न्यायिक भर्ती की मौजूदा व्यवस्था को बदल देगा। यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि एडीजे के पद प्रमोशन और वकीलों की सीधी भर्ती दोनों माध्यमों से भरे जाते हैं।
पारदर्शिता और न्यायिक ढांचा
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न्यायिक सेवा और वकालत दोनों से जुड़े उम्मीदवारों के भविष्य को प्रभावित करेगा। यह फैसला आने वाले वर्षों में जिला न्यायपालिका के स्वरूप और पारदर्शिता को भी नया आयाम देगा।
विज्ञापन
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन