क्या जम्मू कश्मीर के न्यायाधीश संविधान को लागू करने की शपथ लेते हैं?
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क्या संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत राष्ट्रपति के आदेश के बिना जम्मू-कश्मीर में किसी संवैधानिक संशोधन का लागू नहीं होना न्यायाधीशों के लिए वहां भारतीय संविधान के क्रियान्वयन को अनिवार्य नहीं बनाता। क्या जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के न्यायाधीश संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं या नहीं। हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार से जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश जी रोहिणी और न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की पीठ ने दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि फिलहाल वे इस मामले में गुणदोष में जाए बिना सुनवाई करेंगे। खंडपीठ ने यह आदेश उस समय दिया जब याचिकाकर्ता के वकील ने आरोप लगाया कि ऐसा लगता है कि जम्मू कश्मीर में हाईकोर्ट के न्यायाधीश भारतीय संविधान को लागू करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
खंडपीठ ने कहा कि पहली नजर में उसका मानना है कि फोरम कनवीनियेंस के सिद्धांत को देखते हुए याचिकाकर्ता के लिए जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट से गुहार लगाना उचित होगा।
ऐसा लगता है जम्मू कश्मीर के न्यायाधीश निष्ठा की शपथ नहीं लेते
खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई के लिए 13 फरवरी की तारीख तय करते हुए याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि ऐसा लगता है कि जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भारत के संविधान को लागू करने के लिए निष्ठा की शपथ नहीं लेते हैं।
हम इस मुद्दे पर केंद्र और जम्मू कश्मीर राज्य का पक्ष सुनना चाहते हैं। मालूम हो कि याची वकील सुरजीत सिंह ने संविधान आदेश 1954 को चुनौती दी है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 368 के एक प्रावधान को जोड़ा गया है।
प्रावधान में कहा गया है कि ऐसा कोई भी संशोधन जम्मू कश्मीर राज्य के मामले में उस समय तक प्रभावी नहीं होगा जब तब राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 के उपबंध (1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश से लागू नहीं किया जाए।