JDU Meeting: अफवाहों के बीच नीतीश और ललन पर सभी की निगाहें, विपक्ष के साथ रहना ही ज्यादा सुरक्षित
बिहार में राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के करीबी एक सूत्र का कहना है कि नीतीश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति 2016 की तरह मजबूत नहीं है। कभी वह बिहार में पॉलिटिकल ड्राइविंग सीट पर होते थे। लेकिन अमित शाह ने बड़ी चतुराई से यह सीट उनसे छीन ली है...
विस्तार
जेडीयू के अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने अपना पक्ष रख दिया है। उन्होंने कहा कि जब उन्हें इस्तीफा देना होगा, तो वह मीडिया वालों को सलाह लेने के लिए बुला लेंगे। उन्होंने कहा जनता दल यूनाइटेड एक है, और एक रहेगा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी ललन सिंह के इस्तीफे की खबर को खारिज कर दिया। जेडीयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने भी सबकुछ बकवास करार दिया। बिहार के मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी इसे मीडिया की ही उपज बताया। हालांकि नीतीश कुमार और ललन सिंह के साथ-साथ जेडीयू को लेकर अफवाहों का बाजार लगातार गर्म है।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने तो दावा कर दिया कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पद पर कुछ ही दिन के मेहमान हैं। गिरिराज ने यहां तक संभावना जताई कि जेडीयू का राजद में विलय भी हो सकता है।
दिल्ली में इतना तूफान क्यों उठ रहा है?
आप जनपथ के चौराहे से गुजरिए और जंतर मंतर की तरफ जाने वाले गोलचक्कर से जेडीयू दफ्तर जाने वाले रास्ते की तरफ मुड़ जाइए। दोनों ही गोलचक्करों पर तीर का निशान और इकलौते नीतीश कुमार के तमाम पोस्टर दिखाई देंगे। जेडीयू मुख्यालय के बाहर भी इसी तरह का वातावरण दिखाई देगा। जेडीयू के दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष भी दिख जाएंगे, लेकिन जेडीयू के अध्यक्ष ललन सिंह गायब मिलेंगे। लेकिन जैसे ही जेडीयू कार्यालय में भीतर की तरफ बढ़ेंगे, तो आपको सामने ही नीतीश कुमार का नया पोस्टर और दूसरी तरफ ललन सिंह का हाथ जोड़कर अभिवादन करने वाला पोस्टर दिखेगा। मुख्य दरवाजे पर ही दोनों नेताओं के एक साथ पोस्टर दिखेंगे। यहां से सीढ़ी पर ऊपर चढ़ेंगे, तो नीतीश कुमार और ललन सिंह दोनों के पोस्टर मिलते जाएंगे।
कार्यालय पर मिले जेडीयू नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि दिल्ली में मीडिया की खबर को देखिए। वह पोस्टर को आधार मानकर खबर चला रहा है। यह मीडिया इस तरह के सवाल कभी भी भाजपा से न तो पूछने जाता है और न ही कोई राजनीतिक कल्पना करके इस तरह की खबर छापता है। फिलहाल दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कल होगी। जेडीयू के सूत्र ने ही बताया कि नीतीश कुमार और ललन सिंह दिल्ली आ चुके हैं।
'नीतीश ने कभी घाटे की राजनीति नहीं की'
संभावनाओं पर मीडिया बहुत शोर मचाता है। यह कहना है जेपी आंदोलन में शामिल और नीतीश तथा लालू के करीबी का। सूत्र का कहना है कि नीतीश कुमार को लेकर अधिक संभावना तलाशने की जरूरत नहीं। कई बार ऐसी संभावनाएं गलत और प्रायोजित होती हैं। सूत्र का कहना है कि यहां भी इसी तरह के आसार हैं। नीतीश कहीं नहीं जाने वाले। और न ही जेडीयू अध्यक्ष लालन सिंह। हर हाल में नीतीश और ललन विपक्ष के साथ रहेंगे।
बिहार में राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के बीच कभी सेतु का काम करने वाले एक अन्य सूत्र का कहना है कि नीतीश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति 2016 की तरह मजबूत नहीं है। कभी वह बिहार में पॉलिटिकल ड्राइविंग सीट पर होते थे। दूसरी प्रभावी सीट लालू प्रसाद के पास थी। भाजपा के नेता और देश के गृहमंत्री अमित शाह ने बड़ी चतुराई से यह सीट उनसे छीन ली है। सूत्र का कहना है कि अब जेडीयू और खासकर नीतीश कुमार को भाजपा से कुछ खास नहीं मिलने वाला है। इसे नीतीश भी समझते हैं। वैसे भी नीतीश ने कभी बहुत घाटे की राजनीति नहीं की है। इसलिए संभावना न तलाशिए। जनवरी 2024 के तीसरे सप्ताह तक इंतजार कीजिए।
क्यों उठ रहा है धुआं?
यह धुआं सूत्रों के हवाले से उठ रहा है। इसके तर्क में विजय चौधरी और ललन सिंह के संबंध, ललन सिंह के नेतृत्व में जेडीयू की खराब परफार्मेंस, ललन सिंह के राजद और खासकर लालू यादव से संबंध जैसे तर्कों को आधार बनाया जा रहा है। पटना के वरिष्ठ पत्रकार संजय वर्मा कहते हैं कि राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह, तेजस्वी यादव से सॉफ्ट कॉर्नर रख रहे हैं। लालू परिवार से करीबी खटास बढ़ा रही है। वह कहते हैं कि ललन के कारण ही आरसीपी सिंह और उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश का साथ छोड़ा। ऐसे में ललन के साइड लाइन होते ही कुशवाहा लौट सकते हैं और कोइरी, कुर्मी वोट नीतीश को मजबूत बना देगा। इसलिए नीतीश के ललन से नाराज होने की संभावना में दम है। ललन सिंह अब राजनीति में ठंडे पडऩे वाले हैं। आलोक वर्मा बिहार की राजनीति पर काफी काम कर रहे हैं। आलोक कहते हैं कि नीतीश को पता है कि ललन सिंह के भाजपा में समीकरण ठीक नहीं हैं। फिर भाजपा के साथ दूसरी बार जाने के बाद लालू के साथ नीतीश ने लौटकर सरकार बनाई न? कांग्रेस के साथ लालू के रिश्ते नीतीश से अधिक मजबूत हैं। कांग्रेस और नीतीश के बीच की कड़ी लालू प्रसाद ही हैं। बड़ा सवाल यह भी है कि नीतीश कितनी बार पलटी मारेंगे? राजनीति में क्रेडिबिलिटी भी कुछ होती है? दूसरे, नीतीश को पता है कि जेडीयू चुनौती के दौर से गुजर रही है। उसे लोकसभा चुनाव हो या विधान सभा, पार पाने के लिए राजद या भाजपा में से एक दल की जरूरत पड़ेगी। राजद और भाजपा में से एक दल चुनने के सवाल पर जेडीयू के पूर्व राज्यसभा सांसद का कहना है कि बदले हालात में नीतीश राजद को ही चुनेंगे। दरसल, यहां नीतीश का सम्मान बना रहेगा। वैसे भी उनके कद का राजद के पास चेहरा नहीं है। लालू यादव भी स्वास्थ्य की परेशानियों से गुजर रहे हैं।
भाजपा की भी मजबूरी है
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 17 और जेडीयू 17 सीटों पर लड़ी थी और 6 सीटों पर पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी। 2024 के परिप्रेक्ष्य में यह जटिलता बढ़ गई है। भाजपा के भरोसे उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी, लोक जनशक्ति पार्टी के दोनों गुट बैठे हैं। ऐसे में नीतीश कुमार का उधर जाना और भाजपा का सीटों का समीकरण बनाना आसान नहीं होगा। जेडीयू के नेता एक सवाल और उठा रहे हैं। वह कहते हैं कि भाजपा केवल कहानियां बनाने और फूट डालने की राजनीति करती है। जब से नीतीश कुमार राजद के साथ आए हैं, तब से एक अंतराल के बाद लगातार नीतीश के भाजपा के साथ जाने और राजद का फिर साथ छोड़ऩे की संभावना वाली खबरें कई बार छप चुकी हैं। भाजपा के नेता भी राजनीतिक फायदे के लिए इस तरह की अफवाहों को बल देते रहते हैं।