जानिए क्यों सुरक्षा परिषद की सदस्यता के झांसे में नहीं आए पं. जवाहर लाल नेहरू
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भारत में चीन के स्थान पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता के दावे को लेकर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पंडित जवाहर लाल नेहरू की भूमिका पर सवाल उठाया है, लेकिन कूटनीति के जानकार जेटली के इस सवाल पर उन्हें आईना दिखा रहे हैं। भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अफसर और कूटनीति के जानकार राजदूत के पी फैबियन का कहना है कि भारत के पास दो ऐसे मौके आए जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को सदस्यता की लालच परोसी गई।
अगस्त 1950 में एक बार अमेरिका की तरफ से और 1955 में दूसरी बार रूस की तरफ से हालांकि दोनों बार का प्रस्ताव गंभीर नहीं था। यह दोनों प्रस्ताव एक तरह से कूटनीतिक चाल थी और भारत को नए झांसे में उलझाने की कोशिश। बताते हैं पंडित नेहरू की चतुराई और समझ के चलते दोनों बार इसे असफलता हाथ लगी।
क्यों आया था प्रस्ताव
पहली बार प्रस्ताव अमेरिका के विदेश विभाग से आया था और इसका मकसद भारत और चीन के बीच में रिश्तों में आंच लाना था। बताते हैं अगस्त 1950 में अमेरिका के विदेश विभाग ने वाशिंगटन में भारतीय राजदूत तत्कालीन राजदूत विजय लक्ष्मी पंडित को दिया था। विजय लक्ष्मी पंडित से अमेरिका के विदेश विभाग ने कहा कि चीन के बदले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीट पर भारत आ सकता है। पंडित नेहरू ने इसके बाबत प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को पत्र लिखा और पत्र में जोड़ा कि उन्होंने अमेरिकी विभाग का प्रस्ताव सुनने के बाद उन्हें हतोत्साहित कर दिया है। इसके जवाब में प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने लिखा कि भारत चीन की कीमत पर भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का पक्षधर नहीं हो सकता।
दूसरी बार प्रस्ताव 1955 में पंडित नेहरू की सोवियत संघ रूस की यात्रा के दौरान आया। तब इसे प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गैनिन ने दिया। यह विदेश विभाग के रिकार्ड में है कि पंडित नेहरू ने इसका बहुत चतुराई से जवाब दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री बुल्गैनिन के प्रस्ताव पर कहा कि चीन के स्थान पर भारत के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता। प्रधानमंत्री नेहरू ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्ताव भारत और चीन के बीच में मतभेद पैदा करने के लिए है और भारत किसी अनावश्यक विवाद का हिस्सा नहीं बनना चाहता।
पंडित नेहरू ने कहा कि अमेरिकी, रूस, ब्रिटेन यदि भारत को स्थायी सदस्यता देने के पक्षधर हैं तो उन्हें संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना चाहिए। पंडित नेहरू ने लिखा कि जहां तक मैं समझता हूं अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में न तो प्रधानमंत्री निकोलाई समेत अन्य संशोधन के पक्षधर हैं और न ही इसका उचित समय है। भारतीय विदेश नीति के जानकारों कहना है कि पंडित नेहरू के इस पक्ष का रूस के तत्कालिन प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गैनिन ने समर्थन किया और माना कि संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन नहीं हो पाएगा और इसका सही समय भी नहीं है।
गंभीर नहीं था प्रस्ताव
कूटनीति के जानकार फैबियन का कहना है कि दरअसल दोनों बार भारत के पास प्रस्ताव जरूर आए, लेकिन अमेरिका और रूस खुद इसके प्रति बहुत गंभीर नहीं थे। प्रस्ताव में ही गंभीरता नहीं थी। इसलिए प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा कि पहले अंतरराष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए भारत को बिना किसी विवाद का हिस्सा बनाए ताजा स्थिति से निबटने की पहल हो। चीन को स्थाई सदस्यता दी जाए और इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार या उसमें सुधार के बारे में प्रयत्न हो। फैबियन ने भारतीय कूटनीति पर डिप्लोमेसी : इंडियन स्टाइल नाम से प्रसिद्ध किताब लिखी है।
क्यों खेल में शामिल नहीं हुए नेहरू
दरअसल नेहरू अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का खेल समझ रहे थे। उन्हें कम्युनिस्ट चीन, कम्युनिस्ट सोवियत रूस का लगाव, अमेरिका और ब्रिटेन की कूटनीतिक पेचीदगियां समझ में आ रही थी। तब चीन और भारत में अच्छे रिश्ते थे। पंडित नेहरू को इसका साफ आभास हो रहा था कि यह कोशिश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट का प्रस्ताव रखकर भारत और चीन के बीच में दूरी पैदा करना है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीट के लिए चीन का दावा अधिक मजबूत था और पंडित नेहरू इस खेल में शामिल होकर न तो क्षेत्रीय शत्रुता को दावत देने के पक्षधर थे और न ही भारत को विवादास्पद स्थिति में ले जाने के। इसलिए उन्होंने सावधानी से निर्णय लिए। इसके बारे में भारतीय संसद को भी जानकारी दी, क्यों भारत संयुक्त राष्ट्र में चीन की स्थायी सदस्यता का पक्षधर है।
असल का पेंच कुछ और था
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और अन्य विश्व में शांति, स्थायित्व की स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर की ड्रॉफ्टिंग कर रहे थे। अन्य की भूमिका इसमें बहुत सीमित थी। अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट की इच्छा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ रूस और चीन को लेने की थी, लेकिन साम्राज्यवादी मानसिकता के ब्रिटेन के विंस्टन चर्चिल को यह रास नहीं आ रहा था कि एक गैर यूरोपियन देश को ब्रिटेन के बराबरी का स्थान मिले। ऐसे में रूजवेल्ट फ्रांस को स्थायी सदस्यता देने पर सहमत हो गए।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन को स्थान न दिए जाने की स्थिति में सोवियत संघ रूस ने यूएन ड्राफ्टिंग का बहिष्कार कर दिया। जनवरी 1950 में सोवियत संघ रूस फिर इसमें लौट आया। इसलिए मामला पेंचीदा था। एक कारण अमेरिका और कोरिया के बीच में हुए युद्ध का भी है। इस युद्ध की स्थिति के पैदा होने से पहले पंडित नेहरू का कहना था कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रूमैन चीन से बात करें। टकराव को रोका जा सकता है, लेकिन अमेरिका ने चीन के महत्व को नकारते हुए उसे खारिज कर दिया।
जून 1950 में युद्ध शुरू होने के दौरान भी पंडित नेहरू ने यही सलाह दी, लेकिन राष्ट्रपति ट्रूमैन ने खारिज कर दिया। बाद में अमेरिका इस युद्ध को नहीं जीत सका। संघर्ष विराम हुआ। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया दो देश बन गए। यदि पंडित नेहरू की सलाह मानी गई होती तो कूटनीति के जानकारों का मानना है कि न तो कोरिया बंटता और न ही अमेरिका, कोरिया के हजारों लोगों की युद्ध में जान जाती। बताते हैं यह सभी पृष्ठभूमि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की कूटनीति में काफी अहम थी।