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चिंताजनक: बादलों तक पहुंचा माइक्रोप्लास्टिक, वर्षा से फसलें कर रहा दूषित;पहली बार वैज्ञानिकों को मिले सबूत
Mon, 02 Oct 2023 05:13 AM IST
शिव शरण शुक्ला
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Mon, 02 Oct 2023 05:13 AM IST
सार
हर साल प्लास्टिक के करीब एक करोड़ टन टुकड़े नदियों और बाढ़ के पानी के जरिये जमीन से समुद्र में पहुंच रहे हैं, जहां से वो वायुमंडल में अपना रास्ता खोज लेते हैं। बादलों में इनकी मौजूदगी एक बड़े खतरे की ओर इशारा करती है।
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माइक्रोप्लास्टिक (सांकेतिक तस्वीर)।
- फोटो : iStock
विस्तार
जापानी वैज्ञानिकों को पहली बार बादलों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी के सबूत मिले हैं, जो सागरों के जरिये पहुंचे हैं। ये इन्सानों की सेहत के साथ पर्यावरण के लिहाज से बेहद हानिकारक और खतरनाक साबित हो सकते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका जलवायु और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
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हर साल प्लास्टिक के करीब एक करोड़ टन टुकड़े नदियों और बाढ़ के पानी के जरिये जमीन से समुद्र में पहुंच रहे हैं, जहां से वो वायुमंडल में अपना रास्ता खोज लेते हैं। बादलों में इनकी मौजूदगी एक बड़े खतरे की ओर इशारा करती है। एक बार बादलों में पहुंचने के बाद यह कण वापस 'प्लास्टिक वर्षा' के रूप धरती पर गिरते हैं। इस तरह जो कुछ भी हम खाते पीते हैं, यह उसे दूषित करते हैं। जर्नल एनवायरनमेंट केमिस्ट्री लेटर्स में प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने माउंट फूजी के शिखर के साथ-साथ इसकी दक्षिणपूर्वी तलहटी और माउंट ओयामा के शिखर से 1,300 से 3,776 मीटर की ऊंचाई पर बादल से लिए पानी के नमूनों का विश्लेषण किया है। इसके भौतिक व रासायनिक गुणों की जांच करने के लिए वैज्ञानिकों ने इमेजिंग तकनीक की मदद ली है।
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बादलों के निर्माण को करते हैं प्रभावित
बादलों से मिले नमूनों में कार्बोनिल और हाइड्रॉक्सिल जैसे माइक्रोप्लास्टिक भी मिले हैं जो पानी को आकर्षित करने की विशेषता रखते हैं। इसका मतलब है कि उन्होंने बादल, बर्फ और पानी की बूंदों के निर्माण में भूमिका निभाई होगी। रिसर्च से पता चलता है कि बहुत ज्यादा ऊंचाई पर मौजूद माइक्रोप्लास्टिक्स न केवल बादलों के निर्माण को प्रभावित कर सकते हैं बल्कि यह जलवायु पर भी असर डाल सकते हैं।
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जलवायु के बदलाव को भी तेज कर रहे
शोध के दौरान यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि एक बार प्लास्टिक के महीन कण जब ऊपरी वायुमंडल में पहुंचते हैं तो सूर्य के पराबैंगनी विकिरण के संपर्क में आने से टूटने लगते हैं। इस वजह से ग्रीनहाउस गैसें उत्पन्न होती हैं जो जलवायु में आ रहे बदलावों को काफी तीव्र कर सकती हैं।
प्लास्टिक के इन महीन कणों ने इन्सानी शरीर में प्रवेश का रास्ता भी ढूंढ लिया है। अब तक फेफड़ों, प्लेसेंटा, हृदय, नसों और रक्त में भी इसके होने के प्रमाण सामने आ चुके हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह इन्सानों में हृदय और फेफड़ों संबंधी बीमारियों के साथ-साथ कैंसर का भी कारण बन सकते हैं।
खून में भी...यूनिवर्सिटी ऑफ एम्सटर्डम के मेडिकल केंद्र के अनुसार लोगों के खून में पॉलीइथिलीन टेरेफ्थलेट, और स्टायरीन पॉलिमर के बने माइक्रोप्लास्टिक मौजूद हैं। लोगों के ब्लड सैंपल से सामने आया था कि करीब 80% लोगों के खून में प्लास्टिक के अंश हैं। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि ये माइक्रोप्लास्टिक खून से निकलकर अंगों में जमा भी हो सकते हैं और गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकते हैं। प्लास्टिक बनाने में बिस्फेनॉल-ए केमिकल का इस्तेमाल होता है जो माइक्रोप्लास्टिक में मिला होता है। इससे कैंसर होने का भी खतरा है। खून में प्लास्टिक के पार्टिकल होने से ब्लड प्रेशर में तेजी आने का डर रहता है।