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Jaishankar: 'नियमों के साथ खिलवाड़ की जा रही है' संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था पर फिर भड़के विदेश मंत्री जयशंकर
Thu, 22 Feb 2024 11:46 AM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 22 Feb 2024 11:46 AM IST
सार
जयशंकर ने कहा कि 'जब संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ था तो उस वक्त इसके करीब 50 सदस्य थे। आज इसके चार गुना ज्यादा सदस्य देश हैं। ऐसे में ये स्वभाविक बात है कि संयुक्त राष्ट्र पुराने ढर्रे के आधार पर नहीं चल सकता।'
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विदेश मंत्री एस जयशंकर
- फोटो : ANI
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विस्तार
नई दिल्ली में वैश्विक कूटनीतिक विमर्श के कार्यक्रम रासीना डायलॉग 2024 का आयोजन किया जा रहा है। गुरुवार को इस कार्यक्रम में भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने शिरकत की। जयशंकर ने अपने चिर-परिचित अंदाज में एक बार फिर सधे हुए शब्दों में संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की खामियों को उजागर किया और आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र आज भी पुरानी व्यवस्था के आधार पर ही संचालित हो रहा है।
'पुराने ढर्रे के आधार पर नहीं चल सकता संयुक्त राष्ट्र'
जयशंकर ने कहा कि 'जब संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ था तो उस वक्त इसके करीब 50 सदस्य थे। आज इसके चार गुना ज्यादा सदस्य देश हैं। ऐसे में ये स्वभाविक बात है कि संयुक्त राष्ट्र पुराने ढर्रे के आधार पर नहीं चल सकता। अगर पिछले पांच वर्षों को देखें तो कई बड़े मुद्दे हैं, जिनका हम बहुपक्षीय समाधान नहीं निकाल सके हैं। नतीजे नहीं मिल रहे हैं, तभी सुधार की मांग उठ रही है। कई मामलों में नियमों के साथ खिलवाड़ हुआ है। हम वैश्वीकरण की बात करते हैं, लेकिन तथ्य ये है कि वैश्विक व्यापार के नियमों में भी खिलवाड़ किया जा रहा है। आज हमारे सामने कई चुनौतियां हैं और हम ये भी जानते हैं कि कैसे देश अपने फायदे के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं।'
जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की खामियां गिनाते हुए कहा कि 'कई मामलों में हम बीच का रास्ता नहीं निकाल सके। पुराने मुद्दों के अलावा, नए मुद्दे भी हैं। कनेक्टिविटी, कर्ज, व्यापार आदि मुद्दे भी हैं और कैसे इनसे फायदा उठाया जा रहा है। ये जरूरी नहीं है कि ये सब कुछ पश्चिमी देश कर रहे हैं, लेकिन शुरुआत में पश्चिमी देशों का ही संयुक्त राष्ट्र में दबदबा था और आज जो स्थिति है, उसके लिए पश्चिमी देश भी जिम्मेदार हैं। संयुक्त राष्ट्र के जो नए सदस्य बन रहे हैं, उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बात करें तो वहां सबसे बड़े विरोधी पश्चिमी देश नहीं है। ऐसे में यह एक समग्र समस्या है और हमें बदलाव के लिए धीरे-धीरे संघर्ष करना होगा। किसी साझा सहमति पर पहुंचने के लिए हमें लंबी दूरी तय करनी होगी।'
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'पुराने ढर्रे के आधार पर नहीं चल सकता संयुक्त राष्ट्र'
जयशंकर ने कहा कि 'जब संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ था तो उस वक्त इसके करीब 50 सदस्य थे। आज इसके चार गुना ज्यादा सदस्य देश हैं। ऐसे में ये स्वभाविक बात है कि संयुक्त राष्ट्र पुराने ढर्रे के आधार पर नहीं चल सकता। अगर पिछले पांच वर्षों को देखें तो कई बड़े मुद्दे हैं, जिनका हम बहुपक्षीय समाधान नहीं निकाल सके हैं। नतीजे नहीं मिल रहे हैं, तभी सुधार की मांग उठ रही है। कई मामलों में नियमों के साथ खिलवाड़ हुआ है। हम वैश्वीकरण की बात करते हैं, लेकिन तथ्य ये है कि वैश्विक व्यापार के नियमों में भी खिलवाड़ किया जा रहा है। आज हमारे सामने कई चुनौतियां हैं और हम ये भी जानते हैं कि कैसे देश अपने फायदे के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं।'
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#WATCH | Delhi: EAM S Jaishankar says, "When the UN was invented, it had approximately 50 members. We have four times the members. So it's a common sense proposition that you can't continue the same way when you have four times the members... If you look at the last five years,… pic.twitter.com/wvX3xZtfKe
विज्ञापन विज्ञापन— ANI (@ANI) February 22, 2024
जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की खामियां गिनाते हुए कहा कि 'कई मामलों में हम बीच का रास्ता नहीं निकाल सके। पुराने मुद्दों के अलावा, नए मुद्दे भी हैं। कनेक्टिविटी, कर्ज, व्यापार आदि मुद्दे भी हैं और कैसे इनसे फायदा उठाया जा रहा है। ये जरूरी नहीं है कि ये सब कुछ पश्चिमी देश कर रहे हैं, लेकिन शुरुआत में पश्चिमी देशों का ही संयुक्त राष्ट्र में दबदबा था और आज जो स्थिति है, उसके लिए पश्चिमी देश भी जिम्मेदार हैं। संयुक्त राष्ट्र के जो नए सदस्य बन रहे हैं, उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बात करें तो वहां सबसे बड़े विरोधी पश्चिमी देश नहीं है। ऐसे में यह एक समग्र समस्या है और हमें बदलाव के लिए धीरे-धीरे संघर्ष करना होगा। किसी साझा सहमति पर पहुंचने के लिए हमें लंबी दूरी तय करनी होगी।'