Gujarat Election 2022: हर दिन लाख कचौरियों की खपत वाले दाहोद में किसकी होगी जीत, क्या हैं लोगों के मुद्दे?
दाहोद विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस 2007 से जीत रही है। कांग्रेस ने इस बार हर्षदभाई निनामा को टिकट दिया है। भाजपा ने पिछली बार हारने वाले कन्हैयालाल को फिर से मैदान में उतारा है।
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पूर्वी गुजरात में दूधमति नदी तट पर बसे दाहोद निवासियों को कचौरी विशेष प्रिय है। यहां कचौरी की खपत प्रति दिन एक लाख से भी ज्यादा है। दाहोद के नामकरण से दिलचस्प कहानियां जुङी हैं। मान्यता है कि दधिची ऋषि का आश्रम यहीं दूधमति नदी तट पर स्थित था और उन्हीं के नाम पर इस इलाके का नाम दाहोद पड़ा। एक अन्य मान्यता के मुताबिक यहां दो राज्यों मध्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा गुजरात से मिलती है इसलिए इसका नाम दाहोद पड़ा। राजस्थान और मध्यप्रदेश का व्यापक प्रभाव यहां के जनजीवन पर भी है। यहां का रहन सहन ठेठ गुजराती न होकर दोनों सीमावर्ती राज्यों के जनजाति समुदाय से मिलता जुलता है। मुगल बादशाह औरंगजेब का जन्म दाहोद के किले में हुआ था जिसे अब औरंगजेब के किले के नाम से जाना जाता है। जनजाति बहुल इलाके में सबसे ज्यादा संख्या भील जनजाति की है। इसके बाद बोहरा समुदाय के लोग हैं। यह व्यवसाय से जुङा संपन्न तबका है। यहां मतदाताओं की संख्या 2 लाख 44 हजार 614 है। इनमें 70 फीसदी अनुसूचित जनजाति और 2.68 अनुसूचित जाति के मतदाता हैं।
दाहोद
कांग्रेस ने काटा मौजूदा विधायक का टिकट
दाहोद विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस 2007 से जीत रही है। दाहोद लोकसभा सीट से भाजपा के जसवंत सिंह भामोर सांसद हैं, लेकिन 2017 में चार में से तीन विधानसभा सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित इस सीट से कांग्रेस के वजेसिंगभाई परसिंगभाई पणदा जीते थे। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के कन्हैयालाल बचुभाई किशोरी को 15,503 वोटों के अंतर से हराया था। लगातार तीन बार से जीत रहे वजेसिंहभाई की जगह कांग्रेस ने इस बार हर्षदभाई निनामा को टिकट दिया है। वहीं, भाजपा ने पिछली बार हारने वाले कन्हैयालाल को फिर से मैदान में उतारा है। आप से दिनेश मुनिया मैदान में हैं।
जनजाति बहुल क्षेत्र में पैठ रखने वाली भारतीय ट्रायबल पार्टी के उम्मीदवार देवेंद्र मेड़ा भी इस बार मैदान में हैं। इस बार कुल छह प्रत्याशी मैदान में हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में सीट से भाजपा, कांग्रेस के अलावा एनसीपी, ऑल इंडिया हिंदुस्तान सहित बहुजन समाज पार्टी से मुकेश भाई हीराभाई परमार मैदान में थे। हालांकि मुख्य रूप से इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच लड़ाई रही। 1990 से 2017 तक इस सीट से तीन बार भाजपा और चार बार कांग्रेस को जीत मिली है।
आदिवासी बहुल सीटों पर कैसे रहे हैं नतीजे?
राज्य की 27 जनजाति बहुल विधानसभा सीटों पर 2017 में 15, 2012 में 16 और 2007 में 14 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार विजयी रहे। दाहोद में साल 1968 में हुए चुनावों के बाद अबतक तीन बार भाजपा को जीत मिली है। पिछले चुनाव में सीट गंवाने के कारण इस बार भाजपा इन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे रही है। कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस क्षेत्र के लिए 22 हजार करोड़ की परियोजनाओं की घोषणा की है।
शहर से मात्र चार किमी पर स्थित मोती खांजूरी गांव तक पक्की सड़क जाती है। इस गांव में दो स्कूल हैं। गांव के लोग अपने पारंपरिक पहनावों के बजाए सामान्य कपड़ों में नजर आते हैं। अपने कच्चे घर के पास बाइक पर बैठे ईश्वर भाई के कहते हैं कि गांव में रोजगार की कमी है। उन्हें रोजी रोटी की तलाश में बार-बार शहर जाना पड़ता है। 15 दिन गांव और 15 दिन शहर में रोजी रोटी तलाशनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि पानी की कमी यहां दूसरी प्रमुख समस्या है। खेती और पेयजल दोनों की कमी है।
दाहोद के व्यापारियों के क्या हैं मुद्दे?
दाहोद निवासी व व्यवसायी अतुल भाई का कहना था कि बस स्मार्ट सिटी की चर्चा होती रहती है, विकास के ठोस काम नहीं हुए हैं। लोग पानी और बिजली के बढ़ते बिल से परेशान हैं। पेशे से शिक्षक अतुल भाई ने शिक्षा की बदहाली का सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले साल बोर्ड का परिणाम शून्य फीसदी रहा। क्लास की कमी के कारण कई क्लास के बच्चों को एक ही क्लास में बैठना पड़ता है। उन्होंने कहा कि लोग भ्रष्टाचार से परेशान हैं और बदलाव चाहते हैं। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पिछले चुनावों में सीट गंवाने के कारण इस बार भाजपा इन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे रही है। दाहोद में मतदान गुजरात विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में 5 दिसबंर को होगा। मतगणना 8 दिसबंर को होगी।