फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Is the hearing of the Gyanvapi case a violation of the Place of Worship Act and why questions are being raised on this decision of the Banaras Court

Gyanvapi Case: क्या ज्ञानवापी मामले की सुनवाई उपासना स्थल कानून का उल्लंघन है और बनारस कोर्ट के इस निर्णय पर क्यों उठ रहे हैं सवाल? 

Thu, 19 May 2022 11:10 PM IST
amit sharma अमित शर्मा
Updated Thu, 19 May 2022 11:10 PM IST
सार

सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार दुबे ने अमर उजाला को बताया कि ज्ञानवापी विवाद की पूरी प्रक्रिया संविधान में दिए गए प्रावधानों के अनुरूप हो रही है। इसे असंवैधानिक बताना पूरी तरह गलत है। वहीं, कई जानकार इसका विरोध भी कर रहे हैं।

विज्ञापन
Is the hearing of the Gyanvapi case a violation of the Place of Worship Act and why questions are being raised on this decision of the Banaras Court
फाइल फोटो - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

ज्ञानवापी विवाद पर अदालती कार्रवाई शुरू होने के समय से ही इसकी संवैधानिकता पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। उपासना स्थल कानून 1991 के आधार पर दावा किया जा रहा है कि इस कानून के तहत ऐसे किसी भी धार्मिक स्थल विवाद की सुनवाई करने से रोका गया है। इस कानून में राज्य को सभी धार्मिक स्थलों को उसी रूप में संरक्षित रखने का निर्देश दिया गया है, जिस रूप में वह 15 अगस्त 1947 को मौजूद थी, लेकिन संविधान विशेषज्ञों का दावा है कि यह तर्क गलत है और बनारस कोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक में चली कानूनी कार्रवाई पूरी तरह संवैधानिक है। यह सुनवाई उसी 1991 के कानून के अनुरूप है जिसके आधार पर इसको चुनौती दी जा रही है।

विज्ञापन


सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार दुबे ने अमर उजाला को बताया कि ज्ञानवापी विवाद की पूरी प्रक्रिया संविधान में दिए गए प्रावधानों के अनुरूप हो रही है। इसे असंवैधानिक बताना पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि उपासना स्थल कानून 1991 की धारा 3 सभी धार्मिक स्थलों को संरक्षित रखने का निर्देश देती है, लेकिन इसी कानून की धारा 4 की उपधारा 3 (ए) में उन इमारतों, धार्मिक स्थलों को इस कानून की परिधि से बाहर रखा गया है जो एनशियेंट मॉनूमेंट एक्ट की धारा 2(ए) के अंतर्गत आती है।
विज्ञापन


ऐतिहासिक इमारतें उपासना स्थल कानून से बाहर
‘प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (जिसे सामान्य रूप से एनशियेंट मॉनूमेंट एक्ट कहा जाता है) में उन संरचनाओं को एनशिएंट मॉनूमेंट बताया गया है जो स्तूप, गुफा, भित्ति चित्र या कलात्मक अभिरूचि के महत्व की हो और जो 100 वर्ष से ज्यादा पूर्व से अवस्थित हों। ऐसी संरचनाओं को ऐतिहासिक स्मारक का दर्जा देते हुए इन्हें उपासना स्थल कानून से बाहर रखा गया है। चूंकि ज्ञानवापी विवाद की इमारत को बने हुए पांच सौ से भी अधिक समय बीत चुका है, लिहाजा उसे ऐतिहासिक स्मारक माना जा सकता है और इस आधार पर वह इस कानून की परिधि में नहीं आती।
विज्ञापन
विज्ञापन


मालिकाना अधिकार पर रोक, पूजा के अधिकार पर नहीं
वकील अश्विनी कुमार दुबे के मुताबिक, उपासना स्थल कानून 1991 में किसी धार्मिक स्थल के  मालिकाना हक से संबंधित विवाद पर सुनवाई करने पर रोक लगाई गई है। ऐसा इसलिए किया गया था जिससे बाबरी मस्जिद की तरह किसी दूसरे धार्मिक स्थल पर नए विवाद न खड़े हों और देश की शांति-सुरक्षा को कोई खतरा न पैदा हो। लेकिन यह कानून किसी धार्मिक स्थल में पूजा करने के अधिकार से जुड़े विवाद की सुनवाई पर कोई रोक नहीं लगाता है।

चूंकि, ज्ञानवापी विवाद में महिला पक्षकारों ने धार्मिक इमारत पर मालिकाना हक का वाद दायर नहीं किया है, बल्कि उन्होंने माता श्रृंगार गौरी की पूजा करने का अधिकार मांगा है, लिहाजा यह वाद पूरी तरह सुने जाने के योग्य है। बनारस कोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय ने पूरा विवाद कानूनी प्रावधानों की परिधि में सुना है। 

पहली नजर में याचिका खारिज करने योग्य
वहीं, सामयिक विषयों पर अपनी टिप्पणियों के लिए प्रसिद्ध विद्वान प्रो. अपूर्वानंद ने अमर उजाला से कहा कि उपासना स्थल कानून 1991 के आलोक में बनारस कोर्ट को ज्ञानवापी मामले की सुनवाई शुरू ही नहीं करनी चाहिए थी। उसे सर्वे की मांग को भी सिरे से खारिज कर देना चाहिए था। देश की सर्वोच्च विधायी संस्था संसद द्वारा निर्मित उपासना स्थल कानून कानून सभी धर्मों के पूजा स्थलों को उसी रूप में संरक्षित रखने की गारंटी देता है जिस रूप में वे देश की आजादी के दिन यानी 15 अगस्त 1947 को थीं। इस तरह इस मामले की सुनवाई शुरू कर वाराणसी कोर्ट ने इस कानून की उपेक्षा की है।

चूंकि, बाबरी मस्जिद के मामले में अपना निर्णय सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने उपासना स्थल कानून 1991 को संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित ‘पंथनिरपेक्षता’ से जोड़कर देखा  था और इसे देश में शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखने के लिए आवश्यक बताया था, इस मामले की सुनवाई कर बनारस कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय की उपेक्षा भी की है।

प्रो. अपूर्वानंद ने कहा कि इस मामले में हुए सर्वे पर रोक लगाने के लिए मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने अपील की थी। सर्वोच्च न्यायालय को इस सर्वे पर भी तत्काल प्रभाव से रोक लगानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में पूजा करने का अधिकार देना भी मस्जिद की यथास्थिति में बदलाव करना है। 1991 कानून के आलोक में इसकी अनुमति नहीं होनी चाहिए।


उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में बार-बार ‘शिवलिंग’ शब्द का उपयोग किया। इस शब्द का प्रयोग ही प्रतीकात्मक रूप से यह स्वीकार करने जैसा है कि वह स्थल हिंदू समाज का है। जब तक प्रमाणों के आधार पर यह साबित न हो जाए कि यह संरचना शिवलिंग है या फव्वारा, इसके लिए शिवलिंग शब्द का उपयोग गलत है। यह ज्ञानवापी मामले को विवादित बना देता है। भविष्य में यह मामला भी बाबरी मस्जिद मामले की तरह भड़क सकता है, जिसका नुकसान इस पूरे देश और समाज को भुगतना पड़ सकता है।  

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed