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Hindi News ›   India News ›   Interview of Finance Minister Nirmala Sitharaman on Budget 2020

मनरेगा के लिए आवंटन अंतिम फैसला नहीं, जरूरत पड़ी तो और मिलेगी राशि : वित्त मंत्री

Mon, 03 Feb 2020 03:28 AM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Mon, 03 Feb 2020 03:28 AM IST
सार

  • 71,002 करोड़ का प्रावधान था मनरेगा में 2019-20 में संशोधन के बाद
  • 61,500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं मरनेगा के मद में 2020-21 में

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Interview of Finance Minister Nirmala Sitharaman on Budget 2020
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

वित्त वर्ष 2020-21 के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में आवंटन घटाने पर घिर रही केंद्र सरकार का कहना है कि बजट प्रस्ताव कोई अंतिम फैसला नहीं है। इस योजना में मांग के आधार पर राशि आवंटित होती है। यदि जरूरत पड़ी तो और राशि दी जाएगी। आम बजट के बाद अमर उजाला ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से बजटीय प्रावधानों से जुड़े विभिन्न मसलों पर बातचीत की। पेश है अंश :

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प्रश्न : सरकार इसे गांव-किसानों का बजट कह रही है। इसके बावजूद मनरेगा का आवंटन घटा दिया है। इससे गांवों से पलायन नहीं बढ़ेगा?

वित्त मंत्री : यह गांवों-किसानों का ही बजट है। इनके लिए तीन लाख करोड़ का प्रावधान किया है। इसमें से भी अधिकतर राशि संपत्तियों के सृजन में खर्च होगी। मनरेगा की जहां तक बात है, तो यह मांग आधारिक योजना है। इसमें मांग के हिसाब से राशि दी जाती है। चालू वित्त वर्ष में 61,815 करोड़ का प्रावधान था, जिसे मांग बढ़ने पर संशोधित कर 71,002 करोड़ कर दिया गया। यह इसलिए हुआ क्योंकि युवाओं को उनके गांव में ही रोजगार मिले और उन्हें पलायन नहीं करना पड़े। लेकिन, 2020-21 के बजट में 61,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। जरूरत पड़ी तो और राशि दी जाएगी। स्पष्ट कर दूं कि चाहे स्वास्थ्य हो या शिक्षा, कौशल विकास, आवास, स्वच्छ पेयजल या स्वच्छता... किसी के आवंटन में कमी नहीं हुई है बल्कि बढ़ाई है।
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प्रश्न : रोजगार देना सरकार की उच्च प्राथमिकता है। बजट में अलग से ऐसी कोई घोषणा नहीं है, जिससे इस मोर्चे पर राहत मिले?

वित्त मंत्री : हमारा हर बजट प्रस्ताव रोजगार बढ़ाने में सहायक होगा। गांवों-किसानों के लिए दिए 2.83 लाख करोड़ से रोजगार नहीं बढ़ेगा? वहां जो परिसंपत्ति बनेगी, उसमें रोजगार मिलेगा। जो लोहा-इस्पात और सीमेंट-रेत की मांग निकलेगी, निर्माण या खनन में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
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एक उदाहरण... ब्लू इकोनॉमी के लिए समुद्र में मछली पकड़ने वालों के लिए एक योजना की घोषणा की है। अभी भारतीय मछुआरे पारंपरिक नाव से मछली पकड़ते हैं। वे समुद्र में ज्यादा दूर तक नहीं जा पाते और कुछ ही दिन में उन्हें तट की ओर लौटना पड़ता है। इसके उलट, चीन के मुछआरों के पास अत्याधुनिक और बड़ी नाव हैं, जो समुद्र में बहुत दूर तक जाने में सक्षम हैं। हम चाहते हैं कि हमारे मछुआरों के पास भी ऐसी नाव हो, जिसमें वे 15 दिन तक समुद्र में रहें और दूर-दूर जाकर मछली एवं अन्य समुद्री जीवों को पकड़ें। नाव में भंडारण व खाने-पीने की व्यवस्था भी होगी। एक नाव पर 15-20 लाेगों को रोजगार मिलेगा। जब बड़ी मात्रा में मछली एवं समुद्री जीव पकड़ेंगे तो प्रसंस्करण और निर्यात में भी रोजगार मिलेगा।

दूसरा उदाहरण... गांवों में कृषि उत्पादों के लिए भंडारगृह का है। वहां भारतीय खाद्य निगम, केंद्रीय भंडारण निगम या महिलाओं का स्वयं सहायता समूह के भंडारगृह बना सकता है। स्वयं सहायता समूह को तो प्रधानमंत्री मुद्रा योजना से ऋण भी मिलेगा। इससे नौकरी मिलेगी। किसानों को ज्यादा सहूलियत होगी। जब गांवों में ऐसे भंडारगृह बनने लगेंगे तो कितने लोगों को रोजगार मिलेगा।

प्रश्न : बजट में विकास दर की ही चर्चा होती थी। आपने नॉमिनल रेट ऑफ ग्रोथ का मापदंड शुरू कर दिया। क्या अब सरकारी आंकड़े इसी तरह से आएंगे?

वित्त मंत्री : अर्थशास्त्री जब कुछ कहते हैं तो उनके पास दोनों विकल्प रहते हैं। हम स्थिति के हिसाब से काम करते हैं। अर्थव्यवस्था में महंगाई भी एक महत्वपूर्ण कारक है। इसे नजरंदाज नहीं कर सकते। अंतर सिर्फ इतना है कि अभी तक मिनिमल रेट ऑफ ग्रोथ का जिक्र सिर्फ अर्थशास्त्री करते थे, मैंने इसे बजट दस्तावेज में शामिल कर दिया। यह कोई नया मापदंड नहीं है। सरकार के आंकड़े तो उसी तरह से आते रहेंगे, जैसे आते रहे हैं।

आपने करदाताओं के अधिकार के लिए चार्टर की बात की है। इसका उद्देश्य क्या है?

वित्त मंत्री :
पिछले बजट के बाद करदाता के उत्पीड़न की बातें सामने आईं। उसके बाद मैंने देशभर में उद्योगपतियों, लघु उद्यमियों, कारोबारियों और कर अधिकारियों से बात की। अधिकारियों को साफ कहा कि कर वसूली लक्ष्य पूरा करने के लिए किसी का उत्पीड़न न हो, बल्कि सिस्टम सुधरे। सिर्फ परेशान करने के लिए चिट्ठी मत भेजिए। अगर जरूरी हो तो उसे पहले सेंट्रल पोर्टल पर डालिए। वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति लीजिए। उस दस्तावेज का एक डॉक्यूमेंट आइडेंटिफिकेशन नंबर (डिन) होगा। साथ ही, करदाताओं से कहा कि कोई कागज पाने के बाद आप डिन देखिए। यदि नहीं है तो कागज कूड़े में डाल दीजिए। विचार आया कि जैसे अन्य विभागों में सिटीजन चार्टर है, वैसा ही चार्टर क्यों न बने। हमने अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया के प्रावधानों का अध्ययन किया। प्रधानमंत्री से बात की। हरी झंडी मिलने पर आगे बढ़ी। हम करदाताओं को ईमानदार मानते हैं और उनपर भरोसा करते हुए ऐसा कर रहे हैं।

प्रश्न : बतौर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आपने मेक इन इंडिया की शुरूआत की थी। क्या अब यह असेंबल इन इंडिया बन कर नहीं रह गया?

वित्त मंत्री : 
मैं नहीं मानती। भारत में मेक इन इंडिया भी चल रहा है। असेंबल कार्यक्रम भी चल रहा है। एक मोबाइल फोन बनाने के लिए ढेर सारे कलपुर्जों की जरूरत पड़ती है, जो यहां नहीं बनते हैं। उन्हें बाहर से मंगाया जाता है। फिर उसका निर्यात होता है। इससे यहां लोगों को रोजगार मिलने के साथ आमदनी भी बढ़ रही है। हमारे पास कौशल है, क्षमता है तो फिर कलपुर्जे यहीं क्यों न असेंबल करें।

प्रश्न : विनिवेश का लक्ष्य दोगुना कर दिया है, जबकि इस साल का लक्ष्य आपको घटाना पड़ा। क्या यह लक्ष्य अब हासिल हो पाएगा?

वित्त मंत्री :
मैं लक्ष्य पूरा करने को लेकर आश्वस्त हूं। सही है कि पिछले जुलाई में मैंने 1.05 लाख करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य रखा था, जो समय नहीं मिलने के कारण पूरा नहीं हो पाया। इसलिए लक्ष्य घटाकर 65,000 करोड़ रुपये कर दिया। देखा जाए तो चालू वित्त वर्ष में तो हमें काम करने के लिए सात महीने ही मिल पाए। लक्ष्यों को देखते हुए दीपम बहुत छोटा विभाग है, तब भी काफी काम हुआ है। एयर इंडिया जैसी कंपनी का काम पूरा कर मोडेलिटी तय हुई और उसका एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट (ईओआई) जारी हो गया है। अब जो इसे खरीदेगा, उन्हें भी तो ईओआई को पढ़नेे-समझने के लिए वक्त चाहिए। कुछ सवाल उठेंगे, जिन्हें सुलझाने के लिए भी वक्त चाहिए। इस साल बजट में हमने 2.10 लाख करोड़ रुपये का जो लक्ष्य रखा है, वह इसलिए पूरा होगा क्योंकि कई कंपनियों का काम लगभग पूरा हो गया है। आप देखिए कि चालू वित्त वर्ष में हमें साल भर का समय मिला होता तो एयर इंडिया की भी बिक्री हो जाती।

प्रश्न : आलोचक कह रहे हैं कि भारतीय जीवन बीमा निगम की बिक्री से ही यह लक्ष्य पूरा होगा?

वित्त मंत्री :
 (हंसते हुए...) हमने भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के भरोसे यह लक्ष्य नहीं रखा है। हम तो एलआईसी में प्राथमिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाएंगे। मतलब कि उसका कुछ फीसदी हिस्सा हम बेचेंगे। कैसे बेचेंगे, किन्हें बेचेंगे, इस बारे में दीपम काम कर लेगा। इस बारे में आपको भी समय पर जानकारी दी जाएगी।

प्रश्न : बजट में कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। घरेलू उद्योग को परेशानी नहीं होगी?

वित्त मंत्री :
आयात शुल्क बढ़ाने से घरेलू उद्योग को तब परेशानी होती, जब कच्चे माल या इंटरमीडियरीज गुड्स पर आयात शुल्क बढ़ाते। आप पूरी सूची देख लीजिए... इसमें एक भी वैसी वस्तु शामिल नहीं है। हमने उन वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाया है, जो फिनिश्ड गुड्स हैं। उससे हमारे उद्योग को फायदा होगा और उनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ेगी।

प्रश्न : बजट प्रस्ताव में आपने छूट और कटौती की संख्या घटा दी है। संकेत है कि आने वाले दिनों में इनकी संख्या घटकर शून्य हो जाएगी। यह आम लोगों के लिए झटका नहीं होगा?


वित्त मंत्री :
कोई झटका नहीं होगा। आपने देखा कि पिछले साल कॉरपोरेट टैक्स को सरल करने के साथ दरों में कटौती की गई। सरकार के इस कदम सराहना भी हुई। कर की दर जितनी कम होगी, लोगों पर उसका बोझ उतना कम पड़ेगा। मैंने प्रत्यक्ष कर में देखा कि इसमें एक्जंप्शन ही एक्जंप्शन है। मैंने गहराई से देखा तो यह 127-128 तक पहुंच गया है। अब आप सोचिए कि कोई नया नौकरी करने वाला वेतन लेने के बाद यह सूची देखेगा कि टैक्स बचाने के लिए कहां निवेश करें। वह कम टैक्स भरने के लिए कर विशेषज्ञ को हायर करेगा। यही स्थिति कर विभाग के अधिकारियों में भी है। अधिकारी यह देखेगा कि किस नंबर के एक्जंप्शन का लाभ संबंधित असेसी ने लिया है।

इसका निदान है कि एक्जंप्शन खत्म करो और टैक्स का कम रेट से भुगतान करो। इसमें न तो कर अधिकारियों की दिक्कत होगी और न ही असेसी को। सबको आराम होगा और सरकार को भी पता होगा कि इस साल कितना टैक्स आने वाला है। अभी तो सरकार को सिर्फ यह पता है कि कितने असेसी रिटर्न भरेंगे। यह नहीं पता है कि कितना टैक्स आएगा क्योंकि हर कोई इन एक्जंप्शन में कोई न कोई नंबर चुनने के लिए तैयार बैठा है। अगर कोई नहीं भी चुनता है तो उसका पता कर अधिकारी को पहले कैसे लगेगा। इसके सरलीकरण के लिए कई समितियां बनी हैं लेकिन इसे लागू कभी नहीं किया गया। कहीं-न-कहीं तो शुरुआत करनी होगी। इसलिए हमने इस बार इसकी शुरुआत की है।

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