अपराजिता: चुनौतीपूर्ण रण क्षेत्रों में साहस की मिसाल, महिला अधिकारियों से जानिए उनके कार्य, प्रेरणा और संदेश
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विस्तार
धरती के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र से लेकर आसमान की ऊंचाई तक भारतीय महिला शक्ति आज देश की रक्षा में पूरे जोश से जुटी है। सेना में सेवा देते हुए वे भारत को नई मजबूती, नया आयाम दे रही हैं।
सातों दिन चौबीस घंटे रहना होता है सजग: मेजर अभिलाषा बरक, कॉम्बैट एविएटर
2018 में सेना की वायु रक्षा कोर में कमीशन प्राप्त मेजर अभिलाषा वर्ष 2022 में सेना की पहली महिला कॉम्बैट एविएटर बनीं। इस समय कश्मीर में तैनात हैं, कॉम्बैट एविएशन स्क्वाॅड्रन का हिस्सा हैं, लड़ाकू हेलिकॉप्टर पायलट के तौर भारतीय वायु क्षेत्र की रक्षा करती हैं।
मेजर अभिलाषा बरक कहती हैं मैं अपने कर्नल पिता को देखते हुए बड़ी हुई। सेना के प्रति रुचि बचपन में ही पनप चुकी थी। सेना में कॉम्बैट एविएटर बनने के बाद बेहद संतुष्ट हूं। यहां वादियों में उड़ान अनुभव और सुंदरता के बीच सेवा का अनुभव कहीं और नहीं मिल सकता।
महिला सैनिक होने के मायने
महिला या पुरुष सैनिकों को चुनौतीपूर्ण जगहों पर तैनाती के दौरान समान जिम्मेदारियां दी जाती हैं। खासतौर पर ऐसी जगह, जहां आतंकी घटनाओं से लेकर एवलांच और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में हमें तत्काल मदद पहुंचानी होती है। इस दौरान आपको सप्ताह के सातों दिन, चौबीस घंटे अलर्ट पर रहना होता है, अपनी जिम्मेदारी निभाना आपका लक्ष्य होता है।
- अभिलाषा कहती हैं कि लड़कियां किसी से कमतर नहीं है। सफल हो रही अन्य लड़कियों को देखें। जब वे कोई काम कर सकती हैं, तो आप भी कर सकती हैं।
हिंसाग्रस्त विदेशी धरती पर भारतीय महिला शक्ति कायम कर रही शांति
मेजर रुचि अग्रवाल: लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो की राजधानी गोमा में फीमेल इंगेजमेंट टीम की कमान अधिकारी
मेजर रुचि अग्रवाल कहती हैं, सेना में काम का स्तर अलग है, कर्तव्य पूरा करने की जिम्मेदारी भी है। मानसिक मजबूती होनी चाहिए, आप किसी बिंदु पर टूट नहीं सकते। मुझे शुरू से यूनिफॉर्म पसंद है। सीआईएसएफ असिस्टेंट कमांडेंट के लिए पास हो चुकी थी, लेकिन पिता ने मुझे ऑलिव ग्रीन यूनिफॉर्म चुनने के लिए प्रेरित किया। परिवार में दूर-दूर तक कोई सेना में नहीं था, इसलिए पिता से मिली प्रेरणा को मैं सेना से जुड़ने में अहम योगदान मानती हूं।
न टूटने वाली मानसिक मजबूती लेकर बढ़ें
दो सितारों से सजी यूनिफॉर्म को साथ लेकर अकादमी से निकलने का सपना आपको प्रेरित करता है। वरना किसी न किसी बिंदु पर हर कैडेट को ऐसा लग सकता है कि अब हो गया, अब नहीं हो सकता आगे।
महिला सैनिक होने के मायने
विदेशी भूमि पर काम करते हुए हमें कम समय में चीजों को जानना होता है। फीमेल इंगेजमेंट टीम कांगो में हाल में शुरू हुई है। हम इसके जरिये इंफैंट्री बटालियन के साथ काम कर रहे हैं। यह बेहद संवेदनशील और हिंसाग्रस्त क्षेत्र है। फील्ड में जाकर काम करना लगातार मुश्किल बना हुआ है। हमें पीस-कीपर के रूप में अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत ही काम करना होता है।
काम से ही होती है परख, बनती है पहचान
मेजर भावना स्याल : अपने परिवार से तीसरी पीढ़ी की सैनिक...पूर्वी लद्दाख में तैनात
मेजर भावना स्याल कहती हैं, मेरे पिता, दादा-नाना सेना में थे, उनके कंधों पर लगा ब्रास मुझे सेना में आने के लिए बचपन से ही प्रेरित करता था। ऑलिव ग्रीन रन्स इन ब्लड।
सैनिक बनना है तो खुद को मजबूत बनाएं
सेना में महिलाओं को शामिल करने की शुरुआत को 31 वर्ष से अधिक हो चुके हैं। सैन्य प्रशिक्षण भी एक जैसा होता है। इसलिए खुद को मजबूत करते हुए सेना में आने की तैयारी करें।
- सवाल है, क्या आप उस क्षेत्र के लायक खुद को मानती हैं, जहां जाना चाहती हैं? अपने मन से पूछें कि वे क्या चाहती हैं? इनका उत्तर खोजें। इसके बाद सपना पूरा करने में जुट जाएं।
महिला सैनिक होने के मायने
सेना में कई अवसर व चुनौतियां सैन्य अधिकारियों को मिलते हैं। महिला अधिकारी के लिए भी यह बात अलग नहीं है। मुझे आज तक कोई अभियान ऐसा नहीं लगा जिसके मिलने पर लगा कि शायद इसे न कर सकूंगी। नागरिकों के बीच काम करने के दौरान मैंने पाया है कि आप चाहे सैनिक हों या किसी अन्य क्षेत्र से, काम से परखा जाता है। पहचान बनती है।
अभियान नहीं कर पाएंगे, ऐसा कभी सोचते ही नहीं
कैप्टन शिवा चौहान, इंजीनियरिंग कोर
16 हजार फुट ऊंचाई पर संसार के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र सियाचिन में तैनात पहली महिला सैन्य अधिकारी। सेना की इंजीनियरिंग कोर की कैप्टन शिवा चौहान को किसी भी समय कार्रवाई के लिए अलर्ट रहना होता है।
कैप्टन शिवा चौहान कहती हैं, बड़ी बहन एनसीसी में थी, उसे यूनिफॉर्म में देखकर मुझे लगता कि मुझे सैनिक बनना चाहिए। आप किस क्षेत्र में जाना चाहते हैं, यह आपकी रुचियों पर निर्भर है, लेकिन सैनिक बनने के लिए मानसिक मजबूती पहली शर्त है।
महिला सैनिक होने के मायने
मैं और सहकर्मी साथ-साथ देश की रक्षा की जिम्मेदारी निभाते हैं। सियाचिन में बतौर सैनिक महिला या पुरुषाें की भूमिका व जिम्मेदारियां अलग-अलग नहीं होती। मुझे कोई अभियान ऐसा नहीं लगा, जिसे मैं न कर सकूं। यहां असली चुनौती ठंडा वातावरण है। यह किसी को भी मुश्किल में डाल सकता है, जिससे केवल मानसिक मजबूती ही आपको निकाल सकती है। यहां हर काम करना ही है, हमारे सामने कोई विकल्प नहीं होता।
- शिवा का कहना है...जो लड़कियां भारतीय सेना में या किसी अन्य क्षेत्र में भी सफल होना चाहती हैं, इसके लिए उन्हें सबसे पहले खुद को मानसिक रूप से मजबूत करना होगा।
रोमांच और गर्व के साथ देश की सेवा
डॉ. कैप्टन दीक्षा,पैराशूट रेजिमेंट, स्पेशल फोर्सेस बटालियन
पढ़ाई के दौरान ही नेशनल कैडेट कोर से जुड़ गई थी। सैनिकों को मिलने वाले सम्मान को देखकर खुद भी भारतीय सेना में आने का सपना देखा और इसे अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। सेना में शामिल होना आसान नहीं था, लेकिन अपने सपने के बारे में सोचती, क्या करना चाहती हूं, खुद को क्या बनाना चाहती हूं यह सब सोचती तो मेहनत के लिए नई ऊर्जा मिलती।
महिला सैनिक होने के मायने
हमें अक्सर नागरिकों के बीच काम करने का मौका मिलता है। इस दौरान लोगों से जो सम्मान मिलता है, वह मुझे गर्व से भर देता है। वे हमें एक मजबूत सैनिक की तरह देखते हैं और खुद भी वैसा ही बनने के लिए प्रेरित होते हैं, यह विचार काफी प्रेरित करने वाला है।
मजबूत बनें लड़कियां, रनिंग व पुश-अप करें, खाने में प्रोटीन शामिल करें
शानदार कॅरिअर बनाने के लिए लड़कियों के सामने भारतीय सेना से बेहतर संगठन शायद ही कोई और है, जहां देश सेवा का मौका है और हर रोज रोमांच भी। मजबूत कैसे बनें, यहां आपको सिखाया जाता है। नेतृत्व क्षमता भी सीखने को मिलती है। केवल सेना नहीं, किसी भी क्षेत्र में लड़कियों को अगर कोई बाधा नजर आती हैं तो इनसे उबरना सीखें। सैनिक बनना चाह रही लड़कियों को सुझाव देना चाहूंगी कि खुद को फिजिकली फिट रखने पर जोर दें। खाने में प्रोटीन की उचित मात्रा जरूर रखें, नियमित रनिंग करें, शारीरिक फुर्तीलापन हासिल करें। मानसिक मजबूती याद रखें।
- दीक्षा कहती हैं...बाधाएं हर क्षेत्र में हैं और लोग सोचते हैं महिला इन्हें पार कैसे करेंगी? आप सिर्फ लक्ष्य और विजन याद रखे। उन्हें हासिल करने पर ध्यान दें। निडर बनें, अपने सपनों को फॉलो करें।
- साल 2019 में कमीशन, 2022 में आगरा में प्रोबेशन पूरा किया और स्पेशल फोर्सेस यूनिट में पहली महिला सैन्य अधिकारी बनीं, इस समय उत्तराखंड में मेडिकल ऑफिसर।
आसमान में दुश्मन के छुड़ाएंगी छक्के
नासिक स्थित कॉम्बैट आर्मी एविएशन ट्रेनिंग स्कूल में प्रशिक्षण ले रही महिला पायलटों के सफर के बारे में पढ़िए, क्या मुश्किलें आई और किन बातों ने प्रेरित किया -
मौका मिलते ही पूरा किया उड़ान का सपना: कैप्टन श्रद्धा शिवडावकर
मुंबई में जन्मीं कैप्टन श्रद्धा शिवडावकर ने बीएससी आईटी करते समय एनसीसी कैडेट को प्रशिक्षण लेते देखा तो सेना में पायलट बनने की इच्छा घर कर गई। मार्च 2020 में सेना की वायु रक्षा कोर में शामिल हुईं। हालांकि, पायलट बनने का विकल्प नहीं था। 2021 में आर्मी एविएशन के महिला सैन्य अधिकारियों की हेलिकॉप्टर फ्लीट पायलट के तौर पर भर्ती की जानकारी मिली। पुराना सपना पूरा होता दिखा, तो उन्होंने यह मौका नहीं गंवाया और प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए चुनी गईं।
सफलता से पहले कड़ा संघर्ष जरूरी: लेफ्टिनेंट हंसजा शर्मा
661 आर्मी एविएशन स्क्वाॅड्रन जालंधर में तैनात लेफ्टिनेंट हंसजा जम्मू की रहने वाली हैं। एनसीसी कैंप में शामिल होने का मौका मिला तो दुनिया बदल गई। यहां सैन्य जीवन, अनुशासन, यूनिफॉर्म और सम्मान ने सैनिक बनने के लिए प्रेरित किया। शुरुआती मुश्किलों से गुजरने के बाद सेना के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोलर बनीं। डेढ़ वर्ष एटीसी तैनात रहने के बाद चीजें बदलीं, सेना में महिला अधिकारियों को पायलट बनाने की राह खुली। आज वह प्रशिक्षण ले रहे बैच का हिस्सा हैं। अपने तमाम संघर्ष को वह इन शब्दों में बयान करती हैं कि सफलता से पहले कड़ा संघर्ष जरूर होता है।
पायलट बनने की चुनौती की स्वीकार: लेफ्टिनेंट कीर्ति सक्सेना
राजस्थान के शांत शहर बीकानेर की रहने वाली लेफ्टिनेंट कीर्ति सक्सेना विजय दिवस 16 दिसंबर 1994 को जन्मीं। उनके सेना से जुड़ने के पीछे यह भी एक फैक्टर था। मां डॉ. संगीता और पिता जगमोहन सक्सेना सिविल सेवा में हैं। इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद कीर्ति ने नवंबर 2020 में ओटीए से प्रशिक्षण पूरा किया और आर्मी एविएशन में शामिल हुईं। उन्होंने इसे अपने लिए उपयुक्त चुनौती मानते हुए अपनाया।