International Women's Day 2020: सपने, साहस और शौर्य, पढ़ें जोश भर देने वाली वीरांगनाओं की गाथा...
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26 जनवरी को परेड की अगुवाई करते हुए देश की बेटी तान्या शेरगिल के चेहरे पर जो स्वाभिमान था, वह प्रतीक है देश की महिलाओं के शौर्य का। वह प्रतीक है लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम काेर्ट से आए उस फैसले का, जिसके जरिये सेना में बेटियों को स्थायी कमीशन और कमांड पोस्ट मिलने की राह खुली।
अमर उजाला ने महिला दिवस के मौके पर उन वीर नारियों से खास बातचीत की, जिन्होंने देश के लिए सर्वस्व समर्पित कर चुके सैन्य अफसरों की शहादत के बाद साहसपूर्वक शौर्य का वही मार्ग चुना, जिसे उनके पति ने अपनाया था।
उनकी जिंदगी की बेशकीमती चीज उनसे छिन गई। जिंदगी दोराहे पर आ गई । क्या करें, कुछ नहीं सूझ रहा था। लेकिन परिवार, देश, समाज के प्रति कुछ कर गुजरने के उनके जज्बे ने उन्हें नई शुरुआत का हौसला दिया। उनके चट्टानी इरादों से टकराकर हर मुश्किल चकनाचूर हो गई। पेश है ऐसी ही वीरांगनाओं की गाथा...
''सपुष्ट हो उतंग हो, ज्यों सिंहनी प्रचंड हो...हुंकार से फुंकार से, हर दर्प खंड खंड हो
कलेश में ना जूझना, ना कांपना ना सूखना...मौलिक सुमेरू तुंग सी, खड़ी रहो, अड़ी रहो।''
कभी वर्दी लगती थी सौतन... फिर उसी में मिला ‘संतोष’: लेफ्टिनेंट स्वाति महादिक
जब तक संतोष रहे, तब तक सेना और वर्दी का ख्याल ही नहीं आया। असल में वर्दी को तो मैं सौतन समझती थी, क्योंकि मुझे लगता था कि यही मुझे संतोष से दूर करती है। लेकिन यकीन मानिये, जिस दिन मैंने संतोष का पार्थिव शरीर देखा, उसके बाद सिर्फ यह वर्दी ही एक मजबूत सहारा बनी।
गम के उन क्षणों को बर्दाश्त करना बेहद मुश्किल होता है। लगता है जीवन समाप्त हो गया। लेकिन एक दिन मुझे अहसास हुआ कि अगर संतोष दूर चले गए हैं तो क्या, यह वर्दी मुझे दोबारा उनके करीब ला सकती है। मैं सोचती थी कि जिस यूनिफॉर्म में पति को इतनी बार गले लगाया है, क्यों न फिर से उसके पास चली जाऊं। करीब एक महीना लगा लेकिन फिर मैंने मजबूत इरादे से फैसला लिया कि सेना में ही ‘संतोष’ मिल सकता है।
मुझे भलीभांति अहसास हुआ कि मैं पति के जैसा जीवन अपनाकर ही बच्चों और परिवार को मजबूत कर सकती हूं। बच्चों को दुनिया की बेचारगी से बचा सकती हूं। हालांकि, अन्य सैनिक महिलाओं की तरह ही मुझे भी ससुराल, पीहर पक्ष की आपत्ति झेलनी पड़ी, लेकिन ठान लिया था, मैं पीछे नहीं हटूंगी।
इस दौरान सेना का भरपूर समर्थन मिला। मुझे उम्र सीमा में छूट मिली और ट्रेनिंग पूरी कर आखिरकार 2017 में तैनाती मिली। वर्दी में देख मेरी सास ने तो मुझे संतोष ही मान लिया। आज मैं कह सकती हूं कि वर्दी ने वाकई मुझे संतोष के करीब पहुंचाया है।
हजारों ‘प्रिया’ फौज में आ सकें, इसलिए उठाया पहला कदम: कैप्टन प्रिया सेमवाल
कैप्टन प्रिया सेमवाल
मार्च 2014 में हुईं नियुक्ति, बतौर अधिकारी नियुक्त होने वाली पहली वीरांगना (पति नायक अमित शर्मा, 14 राजपूत रेजीमेंट में थे। 20 जून 2012 को अरुणाचल प्रदेश में ऑपरेशन ऑर्किड के दौरान शहीद हुए।)
2005 में 12वीं ही पास की थी। परिवार ने शादी करा दी। आगे न पढ़ पाने का डर सता रहा था, लेकिन अमित ने फौरन हाथ थाम लिया। न सिर्फ मेरी पढ़ाई पूरी हुई बल्कि उन्होंने मुझे आत्मनिर्भर बनने की आजादी भी दी। वे कहते थे तुम पत्नी नहीं, दोस्त हो। उन्होंने अपनी बातों-आदतों से मुझे ‘आधा फौजी’ बना दिया।
जब जून 2012 में वह शहीद हुए तो मुझे उनकी 14 साल की सेवा ने सेना में आने के लिए प्रेरित किया। वर्दी की ताकत को पहचानते हुए मैंने देश सेवा का मौका गंवाना उचित नहीं समझा। हालांकि तब बेटी बहुत छोटी थी। लगता था घर कैसे चलेगा। जीवन ही एक जंग जैसा लगने लगा था, लेकिन पति का ख्याल आते ही मुझे इसे जीतने का हौसला मिल जाता।
जब निर्णय लिया तो कई रिश्तेदारों ने कहा, कहना आसान है लेकिन सेना का जीवन बहुत मुश्किल है। मैंने ठान लिया था कि इन्हें गलत साबित करके ही दम लूंगी। जब नियुक्ति मिली तो वही लोग कहने लगे कि हमें तुम पर भरोसा था। मैंने वर्दी पहनने का कदम उठाया क्योंकि मुझे कई कमजोर महिलाओं के लिए प्रेरणा बनना था। मैं चाहती थी कि अगर मैं सेना में गई तो मुझ जैसी हजारों प्रिया अपनी पहचान बनाने आगे आएंगी।
दृढ़ संकल्प ने झुकने नहीं दिया पति की तरह चुना कर्तव्य पथ: लेफ्टिनेंट नीरू संब्याल
लेफ्टिनेंट नीरू संब्याल
जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स, सितंबर 2018 में नियुक्ति (2015 में शहीद हुए राइफलमैन रविंदर सिंह संब्याल की पत्नी। रविंदर -जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में तैनात थे। )
27 साल की ही थी कि पति शहीद हो गए और गोद में थी तीन माह की बेटी। हम शादी के सिर्फ तीन साल साथ रह पाए। मेरे सामने दो रास्ते थे-बच्ची और परिवार को संभालते हुए ‘बेचारगी’ की जिंदगी जीना या पति की राह चुनना। इसी दौरान एक महिला कैप्टन का लेख पढ़ा, जिनके पति शहीद हो गए थे। पढ़कर हौसला बढ़ा, जज्बा पैदा हुआ।
फिर मैंने पति की यूनिट, जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स (जैकरिफ) की एक महिला अधिकारी को फोन किया और कहा-मैं सेवा में आना चाहती हूं। उन्होंने बेहद सकारात्मक रुख दिखाया। बस यहीं से ठान लिया था कि अब पति की तरह वर्दी पहनकर देश सेवा ही करनी है। मुझे कहा गया कि घर संभालना चाहिए। कुछ रिश्तेदारों ने दोबारा शादी करने का सुझाव तक दिया।
लेकिन मेरे दृढ़ संकल्प ने मुझे किसी के सामने झुकने नहीं दिया। एसएसबी का इम्तिहान पास किया और 49 हफ्तों की कड़ी ट्रेनिंग के बाद 8 सितंबर 2018 को नियुक्ति मिल गई। उस दिन माता-पिता, ससुराल पक्ष सब बहुत खुश हुए। सास ने कहा कि तू ही हमारी ‘पम्मू’ (पति का निकनेम) है। मैं मानती हूं कि आज पति होते तो वह मुझे इस मुकाम पर पाकर सबसे ज्यादा गर्व महसूस करते।