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घर के अंदर मौजूद वायु प्रदूषण से हर साल 13 लाख लोग मर जाते हैं, ऐसे बचें
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 02 Oct 2018 12:53 PM IST
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घर के अंदर की हवा ले रही है जान
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आपके चारों तरफ मौजूद आबोहवा इतनी प्रदूषित है कि वह लोगों की जान ले रही है। घर के बाहर के वायु प्रदूषण पर तो हमारा ध्यान होता है। लेकिन हम घर के अंदर मौजूद वायु प्रदूषण से अनजान हैं, जो दूसरा सबसे बड़ा हत्यारा है। घर के अंदर के वायु प्रदूषण से भारत में हर साल करीब 13 लाख लोगों की जान चली जाती है।
घर के अंदर की हवा एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है, और भारत जैसे देश में, जहां घर के अंदर खाना पकाने से लेकर हानिकारक रसायनों और अन्य सामग्रियों के कारण मकान के अंदर की हवा की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है और यह बाहरी वायु प्रदूषण की तुलना में 10 गुना अधिक नुकसान कर सकती है।
विशेषज्ञों की मानें तो हवादार घर नहीं होने और साफ हवा के अंदर नहीं आने की वजह से फेफड़ों के कामकाज में कठिनाई सहित कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। स्थिति इससिलए ज्यादा खराब हो रही है क्योंकि भारत में घर के अंदर हवा की गुणवत्ता पर कोई ठोस नीति नहीं है। जिस कारण इसके वास्तविक प्रभाव को जान पाना बहुत मुश्किल है।
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घर के अंदर प्रदूषण के कुछ दुष्प्रभावों में आंखों, नाक और गले में जलन, सिरदर्द, चक्कर आना, थकान शामिल हैं। इसके अलावा यह लंबे समय में दिल की बीमारी और कैंसर का कारण बन सकता है।
50 फीसदी लोग प्रदूषित वातावरण में करते हैं काम
हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआई) के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. केके अग्रवाल की मानें तो लोग अपने जीवन का 90 फीसदी से ज्यादा समय घरों में बिताते हैं। 50 फीसदी से ज्यादा कामकाजी वयस्क दफ्तरों या गैर-औद्योगिक वातावरण में काम करते हैं। यह बड़े पैमाने पर प्रदूषण के कारण इमारत से संबंधित बीमारियों का कारण बनता है।
कुछ अन्य कारकों में विषैले रासायनों, जैसे सफाई उत्पादों, अस्थिर कार्बनिक यौगिकों, धूल, एलर्जेंस, संक्रामक एजेंट, सुगंध और तंबाकू का धुआं शामिल हैं। भारत में घर के अंदर वायु की गुणवत्ता के लिए कोई औपचारिक मानक नहीं है। ऐसे में इनडोर एअर पॉल्यूशन से होने वाले स्वास्थ्य प्रभावों का अनुभव वर्षों बाद ही किया जा सकता है।
घर के अंदर के प्रदूषण के बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि आदर्श समाधान तो यही है कि सभी खिड़कियों को खोला जाए और इनडोर प्रदूषकों से बचने की सलाह दी जाए। हालांकि, प्रदूषित शहरों में यह मुश्किल है, क्योंकि बाहरी प्रदूषक घर में घुस सकते हैं।
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घर के अंदर की हवा एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है, और भारत जैसे देश में, जहां घर के अंदर खाना पकाने से लेकर हानिकारक रसायनों और अन्य सामग्रियों के कारण मकान के अंदर की हवा की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है और यह बाहरी वायु प्रदूषण की तुलना में 10 गुना अधिक नुकसान कर सकती है।
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विशेषज्ञों की मानें तो हवादार घर नहीं होने और साफ हवा के अंदर नहीं आने की वजह से फेफड़ों के कामकाज में कठिनाई सहित कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। स्थिति इससिलए ज्यादा खराब हो रही है क्योंकि भारत में घर के अंदर हवा की गुणवत्ता पर कोई ठोस नीति नहीं है। जिस कारण इसके वास्तविक प्रभाव को जान पाना बहुत मुश्किल है।
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घर के अंदर प्रदूषण के कुछ दुष्प्रभावों में आंखों, नाक और गले में जलन, सिरदर्द, चक्कर आना, थकान शामिल हैं। इसके अलावा यह लंबे समय में दिल की बीमारी और कैंसर का कारण बन सकता है।
50 फीसदी लोग प्रदूषित वातावरण में करते हैं काम
हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआई) के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. केके अग्रवाल की मानें तो लोग अपने जीवन का 90 फीसदी से ज्यादा समय घरों में बिताते हैं। 50 फीसदी से ज्यादा कामकाजी वयस्क दफ्तरों या गैर-औद्योगिक वातावरण में काम करते हैं। यह बड़े पैमाने पर प्रदूषण के कारण इमारत से संबंधित बीमारियों का कारण बनता है।
कुछ अन्य कारकों में विषैले रासायनों, जैसे सफाई उत्पादों, अस्थिर कार्बनिक यौगिकों, धूल, एलर्जेंस, संक्रामक एजेंट, सुगंध और तंबाकू का धुआं शामिल हैं। भारत में घर के अंदर वायु की गुणवत्ता के लिए कोई औपचारिक मानक नहीं है। ऐसे में इनडोर एअर पॉल्यूशन से होने वाले स्वास्थ्य प्रभावों का अनुभव वर्षों बाद ही किया जा सकता है।
घर के अंदर के प्रदूषण के बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि आदर्श समाधान तो यही है कि सभी खिड़कियों को खोला जाए और इनडोर प्रदूषकों से बचने की सलाह दी जाए। हालांकि, प्रदूषित शहरों में यह मुश्किल है, क्योंकि बाहरी प्रदूषक घर में घुस सकते हैं।
दूषित हवा में सांस लेने से होती हैं ये बीमारियां
Pollution
दमा
दूषित हवा से सांस लेने में तकलीफ हो सकती है और अगर यह तकलीफ दमे का रूप ले ले, तो जानलेवा भी साबित हो सकती है। खासकर बच्चों पर इसका बेहद बुरा असर होता है।
खराब फेफड़े
सिगरेट फेफड़ों के लिए हानिकारक होती है, लेकिन अगर हवा ही दूषित हो, तो क्या किया जाए? दिल्ली के हाल ऐसे रहे हैं कि एक दिन वहां सांस लेना 44 सिगरेट पीने के बराबर था।
निमोनिया
इस बीमारी का ताल्लुक भी फेफड़ों से ही है। घर में दूषित हवा के साथ निमोनिया का बैक्टीरिया शरीर में चला जाता है और तेज बुखार हो जाता है।
ब्रोंकाइटिस
हवा के साफ ना होने पर थोड़ी बहुत खांसी और आंखों में जलन आम बात हो गई है, लेकिन अगर यह ब्रोंकाइटिस का रूप ले ले, तो इससे जान पर खतरा हो सकता है।
ब्लड और लिवर कैंसर
पेट्रोल और डीजल का धुआं सांस के साथ हमारे शरीर में जाता है और खून में मिल जाता है। इससे खून के कैंसर का खतरा बन जाता है।
दूषित हवा से सांस लेने में तकलीफ हो सकती है और अगर यह तकलीफ दमे का रूप ले ले, तो जानलेवा भी साबित हो सकती है। खासकर बच्चों पर इसका बेहद बुरा असर होता है।
खराब फेफड़े
सिगरेट फेफड़ों के लिए हानिकारक होती है, लेकिन अगर हवा ही दूषित हो, तो क्या किया जाए? दिल्ली के हाल ऐसे रहे हैं कि एक दिन वहां सांस लेना 44 सिगरेट पीने के बराबर था।
निमोनिया
इस बीमारी का ताल्लुक भी फेफड़ों से ही है। घर में दूषित हवा के साथ निमोनिया का बैक्टीरिया शरीर में चला जाता है और तेज बुखार हो जाता है।
ब्रोंकाइटिस
हवा के साफ ना होने पर थोड़ी बहुत खांसी और आंखों में जलन आम बात हो गई है, लेकिन अगर यह ब्रोंकाइटिस का रूप ले ले, तो इससे जान पर खतरा हो सकता है।
ब्लड और लिवर कैंसर
पेट्रोल और डीजल का धुआं सांस के साथ हमारे शरीर में जाता है और खून में मिल जाता है। इससे खून के कैंसर का खतरा बन जाता है।
आंकड़े बताते हैं प्रदूषित हवा कितनी खतरनाक
air pollution
- हमारे देश में हर साल 10 लाख से ज्यादा लोगों की मौत प्रदूषित हवा में सांस लेने से होती है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 10 में से 9 लोग प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं।
- वायु प्रदूषण घर के भीतर रहने वाले या बाहर घूमने वाले लोगों में से 70 लाख लोगों की हर साल जान ले रहा है।
- दुनिया की 92 फीसदी जनसंख्या खराब गुणवत्ता वाली हवा में सांस ले रही है।
- दुनिया में 11 बिलियन मूल्य की फसल वायु प्रदूषण के कारण हर साल खराब हो जाती है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 10 में से 9 लोग प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं।
- वायु प्रदूषण घर के भीतर रहने वाले या बाहर घूमने वाले लोगों में से 70 लाख लोगों की हर साल जान ले रहा है।
- दुनिया की 92 फीसदी जनसंख्या खराब गुणवत्ता वाली हवा में सांस ले रही है।
- दुनिया में 11 बिलियन मूल्य की फसल वायु प्रदूषण के कारण हर साल खराब हो जाती है।
घर में प्रदूषण से बचाव के लिए इन बातों का रखें ख्याल
पूरी दुनिया इस वक्त बढ़ते प्रदूषण से परेशान है।
पेड़ ऑक्सीजन छोड़ते हैं और हवा को साफ करते हैं। इसलिए घरेलू सजावट में पौधों को ज्यादा से ज्यादा शामिल करें। मनी प्लांट जैसे पौधे ताजा हवा का अच्छा स्रोत हो सकते हैं। साथ अपने घर में होने वाले प्रदूषण पर निगाह रखें।
धूम्रपान नहीं करना चाहिए क्योंकि वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अगर आपको इसकी लत है तो खासतौर पर घर के अंदर तो धूम्रपान से बचें ही। साथ ही सुनिश्चित करें कि जहरीली गैसों और पदार्थों को घर के अंदर सर्द-गर्म मौसम में न छोड़ा जाए।
रिसाव को ठीक करके और गर्मी और ठंड के दौरान अंदरूनी कमियों को दुरुस्त करने तथा उचित रखरखाव व मरम्मत से हवा की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है।
घर में मौजूद रेफ्रिजरेटर, बैटरी, ओवन जैसे उपकरण बंद कमरे में ना रखें। साथ ही यह उपकरण नियमित रखरखाव के बिना हानिकारक गैसों को उत्सर्जित कर सकते हैं। आप नियमित समय पर उनकी सर्विस करवाते रहें।
घर में डस्टिंग का खास महत्व है। हर घर धूल और गंदगी को अंदर खींच सकता है। अक्सर घर के कई सारे कोने और फर्नीचर सेट के नीचे अकसर सफाई नहीं हो पाती है। इस कारण डस्ट एलर्जी हो सकती है।
घर में कीटनाशकों के उपयोग से जितना हो सके, बचना चाहिए। जैव-अनुकूल उत्पादों का उपयोग करें। वायु में घुले जहरीले रसायनों की संख्या सीमित कर घर में प्रदूषण कम कर सकते हैं।
धूम्रपान नहीं करना चाहिए क्योंकि वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अगर आपको इसकी लत है तो खासतौर पर घर के अंदर तो धूम्रपान से बचें ही। साथ ही सुनिश्चित करें कि जहरीली गैसों और पदार्थों को घर के अंदर सर्द-गर्म मौसम में न छोड़ा जाए।
रिसाव को ठीक करके और गर्मी और ठंड के दौरान अंदरूनी कमियों को दुरुस्त करने तथा उचित रखरखाव व मरम्मत से हवा की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है।
घर में मौजूद रेफ्रिजरेटर, बैटरी, ओवन जैसे उपकरण बंद कमरे में ना रखें। साथ ही यह उपकरण नियमित रखरखाव के बिना हानिकारक गैसों को उत्सर्जित कर सकते हैं। आप नियमित समय पर उनकी सर्विस करवाते रहें।
घर में डस्टिंग का खास महत्व है। हर घर धूल और गंदगी को अंदर खींच सकता है। अक्सर घर के कई सारे कोने और फर्नीचर सेट के नीचे अकसर सफाई नहीं हो पाती है। इस कारण डस्ट एलर्जी हो सकती है।
घर में कीटनाशकों के उपयोग से जितना हो सके, बचना चाहिए। जैव-अनुकूल उत्पादों का उपयोग करें। वायु में घुले जहरीले रसायनों की संख्या सीमित कर घर में प्रदूषण कम कर सकते हैं।