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गगन प्रणाली: पहली बार स्वदेशी तकनीक से वाणिज्यिक विमान ने की लैंडिंग, जानें क्या है इसकी खासियत?
Mon, 29 Jun 2026 09:37 PM IST
निर्मल कांत
आईएएनएस, नई दिल्ली।
आईएएनएस, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 29 Jun 2026 09:37 PM IST
सार
इंडिगो के एयरबस ए320 ने स्वदेशी गगन प्रणाली की सहायता से उपग्रह आधारित सुरक्षित लैंडिंग की। यह परीक्षण डीजीसीए की निगरानी में हुआ और पहली बार किसी वाणिज्यिक जेट ने इस तकनीक का उपयोग किया। इस प्रणाली में क्या खास है, विस्तार से पढ़िए रिपोर्ट-
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इंडिगो (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
भारत की विमानन क्षेत्र ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इंडिगो के एयरबस ए320 विमान ने स्वदेशी रूप से विकसित गगन प्रणाली की मदद से सफलतापूर्वक उपग्रह आधारित लैंडिंग की है। यह प्रदर्शन उड़ान 27 जून को विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) की निगरानी में हुआ। यह पहली बार है, जब किसी वाणिज्यिक विमान ने इस स्वदेशी तकनीक से लैंडिंग की है।
अब तक विमान लैंडिंग के लिए आमतौर पर वाद्य यंत्र आधारित लैंडिंग प्रणाली का उपयोग होता है। इसमें हवाई अड्डे पर लगे जमीन आधारित उपकरण मदद करते हैं। लेकिन इस उड़ान में विमान ने उपग्रह आधारित लैंडिंग प्रणाली का इस्तेमाल किया। इससे पहले इंडिगो ने इस तकनीक को अपने एटीआर विमान पर आजमाया था। लेकिन यह पहली बार था, जब बड़े यात्री विमान ने इसे सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया।
कैसे हुई सुरक्षित लैंडिंग?
इस उड़ान में विमान को लैंडिंग के समय रनवे पर सही दिशा में सीधा रखने और सही ऊंचाई से धीरे-धीरे नीचे उतारने के लिए खास तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिससे लैंडिंग सुरक्षित और सटीक हुई। एयरबस के अनुसार, यह तकनीक वाद्य यंत्र आधारित लैंडिंग प्रणाली जैसी ही सटीकता देती है। लेकिन इसके लिए हवाई अड्डे पर भारी-भरकम उपकरण लगाने की जरूरत नहीं होती।
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क्या है गगन प्रणाली?
यह उपलब्धि भारत की गगन प्रणाली को भी सामने लाती है, जो वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली आधारित एक सुधार प्रणाली है। इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) ने मिलकर विकसित किया है। यह प्रणाली वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली संकेतों को और ज्यादा सटीक बनाती है और उसकी गलतियों को सुधारती है, ताकि विमान सुरक्षित तरीके से उड़ान भर सके और लैंडिंग कर सकें।
उपग्रहों से मिलता है मार्गदर्शन
गगन खुद अलग से स्थान नहीं बताता, बल्कि वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली की जानकारी को और बेहतर बनाता है। इसमें अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों का उपयोग होता है, जो पूरे भारतीय हवाई क्षेत्र को कवर करते हैं। इससे विमान को लगातार और भरोसेमंद मार्गदर्शन मिलता रहता है।
सामान्य प्रणाली क्यों नहीं है पर्याप्त?
सामान्य वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली मोबाइल फोन में तो काम करती है। लेकिन विमान की लैंडिंग के लिए इतनी सटीकता पर्याप्त नहीं होती। इसके अलावा, वायुमंडलीय बदलावों से संकेत प्रभावित हो सकते हैं, खासकर भारत जैसे क्षेत्र में जहां सिग्नल में गड़बड़ी की संभावना रहती है। इसलिए विमानन के लिए ज्यादा सुरक्षित और सटीक प्रणाली की जरूरत होती है।
ये भी पढ़ें: रक्षा अलंकरण समारोह: ले.ज. धीरज सेठ को मिला उत्तम युद्ध सेवा मेडल, जानें और किन्हें मिला वीरता पुरस्कार?
15 स्टेशनों से होती है निगरानी
गगन इस समस्या को दूर करने के लिए देशभर में फैले 15 जमीन आधारित संदर्भ स्टेशनों से डाटा इकट्ठा करता है। ये स्टेशन वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली की छोटी-छोटी गलतियों को पकड़कर उन्हें सुधारते हैं। फिर यह सही जानकारी नियंत्रण केंद्र से होकर उपग्रहों तक भेजी जाती है, जो उसे विमान तक पहुंचाते हैं।
हवाई यात्रा होगी और सुरक्षित
इस प्रणाली की एक खास बात यह है कि यह लगातार सिग्नल की निगरानी करती है। अगर कोई गड़बड़ी होती है तो तुरंत पायलट को चेतावनी दे देती है। इससे उड़ान और लैंडिंग और भी सुरक्षित हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक भारत में हवाई यात्रा को और सुरक्षित, तेज और बेहतर बनाने में मदद करेगी।
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अब तक विमान लैंडिंग के लिए आमतौर पर वाद्य यंत्र आधारित लैंडिंग प्रणाली का उपयोग होता है। इसमें हवाई अड्डे पर लगे जमीन आधारित उपकरण मदद करते हैं। लेकिन इस उड़ान में विमान ने उपग्रह आधारित लैंडिंग प्रणाली का इस्तेमाल किया। इससे पहले इंडिगो ने इस तकनीक को अपने एटीआर विमान पर आजमाया था। लेकिन यह पहली बार था, जब बड़े यात्री विमान ने इसे सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया।
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कैसे हुई सुरक्षित लैंडिंग?
इस उड़ान में विमान को लैंडिंग के समय रनवे पर सही दिशा में सीधा रखने और सही ऊंचाई से धीरे-धीरे नीचे उतारने के लिए खास तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिससे लैंडिंग सुरक्षित और सटीक हुई। एयरबस के अनुसार, यह तकनीक वाद्य यंत्र आधारित लैंडिंग प्रणाली जैसी ही सटीकता देती है। लेकिन इसके लिए हवाई अड्डे पर भारी-भरकम उपकरण लगाने की जरूरत नहीं होती।
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क्या है गगन प्रणाली?
यह उपलब्धि भारत की गगन प्रणाली को भी सामने लाती है, जो वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली आधारित एक सुधार प्रणाली है। इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) ने मिलकर विकसित किया है। यह प्रणाली वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली संकेतों को और ज्यादा सटीक बनाती है और उसकी गलतियों को सुधारती है, ताकि विमान सुरक्षित तरीके से उड़ान भर सके और लैंडिंग कर सकें।
उपग्रहों से मिलता है मार्गदर्शन
गगन खुद अलग से स्थान नहीं बताता, बल्कि वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली की जानकारी को और बेहतर बनाता है। इसमें अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों का उपयोग होता है, जो पूरे भारतीय हवाई क्षेत्र को कवर करते हैं। इससे विमान को लगातार और भरोसेमंद मार्गदर्शन मिलता रहता है।
सामान्य प्रणाली क्यों नहीं है पर्याप्त?
सामान्य वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली मोबाइल फोन में तो काम करती है। लेकिन विमान की लैंडिंग के लिए इतनी सटीकता पर्याप्त नहीं होती। इसके अलावा, वायुमंडलीय बदलावों से संकेत प्रभावित हो सकते हैं, खासकर भारत जैसे क्षेत्र में जहां सिग्नल में गड़बड़ी की संभावना रहती है। इसलिए विमानन के लिए ज्यादा सुरक्षित और सटीक प्रणाली की जरूरत होती है।
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15 स्टेशनों से होती है निगरानी
गगन इस समस्या को दूर करने के लिए देशभर में फैले 15 जमीन आधारित संदर्भ स्टेशनों से डाटा इकट्ठा करता है। ये स्टेशन वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली की छोटी-छोटी गलतियों को पकड़कर उन्हें सुधारते हैं। फिर यह सही जानकारी नियंत्रण केंद्र से होकर उपग्रहों तक भेजी जाती है, जो उसे विमान तक पहुंचाते हैं।
हवाई यात्रा होगी और सुरक्षित
इस प्रणाली की एक खास बात यह है कि यह लगातार सिग्नल की निगरानी करती है। अगर कोई गड़बड़ी होती है तो तुरंत पायलट को चेतावनी दे देती है। इससे उड़ान और लैंडिंग और भी सुरक्षित हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक भारत में हवाई यात्रा को और सुरक्षित, तेज और बेहतर बनाने में मदद करेगी।