पढ़ें, संसद हमले में तीन आतंकियों को मारने वाले हवलदार संतोष की कहानी उन्हीं की जुबानी
संसद पर हमले के दौरान गेट नंबर छह पर तैनात रहे सीआरपीएफ के हवलदार डी. संतोष कुमार के अनुसार हैंड ग्रेनेड और फायरिंग की आवाज सुनकर मैने तुरंत अपने इंचार्ज को बताया। इससे पहले आतंकियों से निपटने की कोई रणनीति बनती, संसद के गेट नंबर नौ की तरफ चार आतंकी, जिनमें एक मानव बम भी था, भागे आ रहे थे। चारों आतंकी हैंड ग्रेनेड फैंकने के अलावा ताबड़तोड़ फायरिंग कर रहे थे। मैंने अपनी एसएलआर से पहले दो-तीन गोलियां दागीं।
चूंकि आतंकी एक साथ फायरिंग कर रहे थे, इसलिए पेड़ की आड़ ली। इसके बाद यह सोचते हुए गोली कहीं भी लगे, बाहर निकल कर आतंकियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। मात्र छह मिनट में तीन आतंकी मारे गिराए। चौथा आतंकी जो मानव बम था, उसे हमारे जवान सुखविंद्र सिंह ने खत्म कर दिया।
14 साल बाद पूरा हुआ पत्नी-बेटी का सपना
पत्नी सिंधु दूबे और बेटी सौम्या (कक्षा आठ की छात्रा) ने कई बार कहा कि हमें संसद भवन का वह स्थान देखना है, जहां पर आतंकी मारे गए थे। मैंने भी उनसे वादा किया था कि वह उन्हें संसद भवन परिसर जरूर दिखाएंगे। हमले के बाद मेरी पोस्टिंग कश्मीर में हो गई। उसके बाद उत्तर-पूर्व और फिर नक्सली इलाकों में। इसी में 14-15 साल बीत गए, लेकिन परिवार को संसद भवन दिखाने का समय ही नहीं मिला।
संसद भवन हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरू, जिसे फरवरी 2013 में फांसी दी गई थी, उस वक्त संतोष कुमार दिल्ली में तैनात थे। उन्होंने बल मुख्यालय को परिवार साथ रखने के लिए आवेदन दिया था। मंजूरी मिलने के बाद ही वे अपने परिवार को संसद भवन दिखाने में कामयाब हुए।