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Rambo: भारतीय सेना का 'रैंबो', जिसने करगिल में पाकिस्तान के छुड़ाए छक्के, आंखें देख कर आतंकी लगा थर-थर कांपने
सार
भारतीय सेना में अपने शौर्य के लिए मशहूर और 1971 की जंग में परमवीर चक्र से सम्मानित मेजर होशियार सिंह की रेजिमेंट 3 ग्रेनेडियर्स की कमान संभाल चुके रिटायर्ड कर्नल आशुतोष काले ने ढाई साल की कड़ी मेहनत के बाद मेजर सुधीर वालिया पर उन्होंने ''रैंबो" नाम से एक किताब लिखी है।
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मेजर सुधीर वालिया।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
एक रैंबो में क्या खूबियां होनी चाहिए। तेज तर्रार दिमाग, फुर्तिला शरीर, बाज सी पैनी नजरें और लड़ाई के लिए हमेशा तैयार। फिल्मी रैंबो की कहानियां तो आपने बहुत सुनी होंगी। लेकिन फिल्मी दुनिया से इतर भारतीय सेना में भी ''रैंबो" की कोई कमी नहीं है, जिनके किस्से आप में रोमांच पैदा कर देंगे। उनमें से एक थे 9 पैरा स्पेशल फोर्सेज के मेजर सुधीर वालिया, जो अपने साथियों में रैंबो के नाम से ही मशहूर थे। जैसा उनका नाम था, वैसे ही उनके कारनामे भी थे। भले ही वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शौर्य गाथाएं आज भी सेना में लोग भूले नहीं हैं। शांति काल के सर्वोच्च सैन्य पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित मेजर सुधीर वालिया ने न सिर्फ करगिल की पहाड़ियों में पाकिस्तानी फौज के छक्के छुड़ाए, बल्कि कई आतंकियों को भी ढेर किया। मेजर सुधीर वालिया के बहादुरी के किस्सों को सेना के ही एक कर्नल आशुतोष काले ने बड़ी मेहनत के बाद एक किताब ''रैंबो" में संजोया है, जो जल्द ही बाजार में आने वाली है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक 17 मई को उनकी इस किताब का विमोचन करेंगे।
मेजर सुधीर में थी दिलेरी और गजब का जोश
भारतीय सेना में अपने शौर्य के लिए मशहूर और 1971 की जंग में परमवीर चक्र से सम्मानित मेजर होशियार सिंह की रेजिमेंट 3 ग्रेनेडियर्स की कमान संभाल चुके रिटायर्ड कर्नल आशुतोष काले ने ढाई साल की कड़ी मेहनत के बाद मेजर सुधीर वालिया पर उन्होंने ''रैंबो" नाम से एक किताब लिखी है। अमर उजाला से खास बातचीत में कर्नल आशुतोष काले बताते हैं कि मेजर सुधीर वालिया के अंदर दिलेरी, गजब का जोश और लक्ष्य के प्रति समर्पण था। मेजर सुधीर वालिया का जन्म पालमपुर में हुआ था। बचपन से ही वे बेहद साहसी थे। वह बताते हैं कि वे कभी सुधीर को जानते भी नहीं थे। यहां तक कि उनके एनडीए के कोर्स में भी चार बैच का अंतर था। 72वें बैच के मेजर सुधीर उनसे काफी जूनियर थे। 1998 में जब वे आईएमए में इंस्ट्रक्टर नियुक्त हुए, तब भी सुधीर की पोस्टिंग वहां हुई थी। उस दौरान भी उनकी कम ही बातचीत होती थी। 2009 में कर्नल आशुतोष ने रिटारमेंट ले लिया और सिविल जॉब में आ गए। कुछ साल पहले ही उनके एक जानकार प्रकाशक को मेजर सुधीर की वीरता के बारे में पता चला, तो उन्होंने उनसे मेजर सुधीर के बारे में पूछा और उन पर किताब लिखने के लिए प्रेरित किया।
करगिल में जुलु टॉप को पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ाया
रिटायर्ड कर्नल आशुतोष काले बताते हैं कि जब करगिल की जंग शुरू हुई तो उस दौरान मेजर सुधीर तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक के एडीसी (एड डे कैंप) यानी पर्सनल सेक्रेटरी थे। सेना प्रमुख के साथ होने के नाते वे करगिल में हो रहे सैन्य ऑपरेशन से पूरी तरह से वाकिफ थे। जब किसी की मौत की खबर आती थी, तो उन्हें बेहद गुस्सा आता था। आखिरकार उन्होंने जनरल वीपी मलिक से करगिल जंग में हिस्सा लेने के लिए विशेष अनुमति मांगी और अनुमति मिलने के बाद वे अपनी पेरेंट यूनिट चले गए। 24 मई को अपना जन्मदिन मनाने के बाद उन्हें करगिल भेजा गया। जहां उन्हें मश्कोह घाटी में जुलु टॉप पर कब्जा करने का टास्क सौंपा गया। वह चोटी उस समय पाकिस्तान के कब्जे में थी और भारत के लिए सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण थी। कर्नल काले बताते हैं कि 25 जून 1999 को भारतीय सेना ने मेजर सुधीर के नेतृत्व में जुलु टॉप पर एक जबरदस्त हमला किया और जो टास्क दिया गया था, उसे पूरा करते हुए करगिल की जुलु टॉप पर तिरंगा लहराया। उस दौरान उन्हें फील्ड मेजर भी बनाया गया। वह बताते हैं कि यह आखिरी चोटी थी और इस चोटी पर कब्जे के साथ ही करगिल जंग की औपचारिक समाप्ति हो गई।
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बिना हथियार का इस्तेमाल किए आतंकी को धरदबोचा
कर्नल आशुतोष काले बताते हैं कि वैसे तो मेजर सुधीर ने श्रीलंका के जंगलों से लेकर बहुत से अफगानी आतंकवादियों के खिलाफ कई गुप्त अभियानों और आतंक निरोधी दस्तों का नेतृत्व किया। करगिल की जंग के बाद उनकी पोस्टिंग कश्मीर के कुपवाड़ा में हो गई, जो उस समय कभी आतंकियों का गढ़ हुआ करता था। यहां का एक किस्सा वह बताते हैं कि मेजर सुधीर को डर बिल्कुल नहीं लगता था। दिलो दिमाग से वे एकदम मजबूत थे। कुपवाड़ा की लोलाब घाटी में एक ऑपरेशन में वे दो आतंकियों का भाग कर पीछा कर रहे थे। उनमें से एक आतंकी को मार गिराया, तो दूसरा भाग कर पहाड़ी में एक गुफा में छुप गया। वे बिना डरे और सोचे समझे उस गुफा में घुस गए। गुफा में आतंकी अपनी एके47 ताने उन पर निशाना लगाने के लिए तैयार था। गुफा इतनी संकरी थी कि कोहनी मोड़ने की भी जगह नहीं थी। दोनों आमने सामने थे। मेजर सुधीर की आंखों में तो खून उतर आया था, उनका गुस्सा देख कर ही आतंकी घबरा गया और हथियार ही नहीं चला पाया। मेजर सुधीर ने उसे बिना हथियार का इस्तेमाल किए बिना ही वहीं दबोच लिया।
सीटी मार कर आतंकी का ध्यान बंटाया
कर्नल आशुतोष काले मेजर सुधीर का दूसरा किस्सा सुनाते हुए बताते हैं कि वह हमेशा टीम को लीड करते थे। कभी पीछे से ऑर्डर नहीं देते थे। एक एंबुश के दौरान उन्हें चार आतंकी दिखाई दिए। संयोग से वे जहां छुपे हुए थे, वहीं एक आतंकी हथियार समेत पेशाब करने लगा। मेजर सुधीर वहीं झाड़ियों में झुपे हुए थे। तभी वे अचानक खड़े हुए और जोर से सीटी मारी। आतंकी घबरा गया और अपनी एके-47 असॉल्ट राइफल उठाने लगा। लेकिन इससे पहले वह उन पर हमला करता, उन्होंने उसे सीधे गोली मार दी।
चार आतंकियों को किया ढेर
मेजर सुधीर की बहादुरी का एक और किस्सा सुनाते हुए कर्नल आशुतोष बताते हैं कि 29 अगस्त 1999 में ही उनकी युनिट को खबर लगी कि कुपवाड़ा के हाफफ्रूडा के घने जंगल मे 16-17 आतंकियों का एक गुट छिपा हुआ है। मेजर सुधीर आतंकियों के छुपने की जगह की खोजबीन करने में जुट गए। वहीं साइड में एक आतंकी ने उन्हें देख लिया और उनके साथी खड़े सिंह को गोली मार दी। मेजर सुधीर ने तुरंत पोजिशन लेते हुए चार आतंकियों को वहीं ढेर कर दिया। हालांकि उसी बीच वे भी गोलियों से छलनी हो गए। मात्र 30 साल की उम्र में यह उनका आखिरी ऑपरेशन था। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने रेस्क्यू से इंकार कर दिया और टीम के साथ बाकी आतंकियों को मार गिराया। लेकिन जब हेप्टर से उन्हें श्रीनगर अस्पताल ले जा रहे थे, तभी रास्ते में उनकी मौत हो गई और वे वतन पर शहीद हो गए। कर्नल आशुतोष बताते हैं कि आज मेजर सुधीर के परिवार में उनके बुजुर्ग पिता और बहन ही हैं। उनके भाई का भी बाद में देहांत हो गया।
सामने वाला दिमाग पढ़ने की थी काबलियत
कर्नल आशुतोष काले बताते हैं कि मेजर सुधीर की वीरता के कई अनगिनत और हैरान करने वाले किस्से किताब में लिखे हैं, जो रोमांच पैदा कर देंगे। वह बताते हैं कि महज 30 साल की उम्र और नौ साल की सर्विस में मेजर सुधीर वीरता की वह गाथा लिख गए, जो बिरले ही सुनी जाती है। वह कोई आम इंसान नहीं थे, वह सामने वाला दिमाग पढ़ लिया करते थे। दिमाग में ही सीन को विजुलाइज कर लिया करते थे। उन्हें कोई स्ट्रेस नहीं होता था। वह कहते थे कि मेरी ट्रेनिंग इन आतंकियों से बेहतर है। मैंने भारतीय फौज में ट्रेनिंग ली है, ये आतंकी तो कैंपों में ट्रेनिंग लेकर आए हैं। वह अक्सर कहा करते थे कि आतंकियों की प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं होती। गोली चलाते हुए उनके हाथ लड़खड़ाते हैं, आतंकियों की एक-आध गोली उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी, बल्कि वे ही उससे पहले दो गोलियां उसके सिर में दाग देंगे। सरकार ने मेजर सुधीर के अदम्य साहस और वीरता को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत शांतिकाल के सर्वोच्च सम्मान अशोक चक्र से सम्मनित किया। उन्हें दो बार सेना मेडल से भी सम्मानित किया गया।
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मेजर सुधीर में थी दिलेरी और गजब का जोश
भारतीय सेना में अपने शौर्य के लिए मशहूर और 1971 की जंग में परमवीर चक्र से सम्मानित मेजर होशियार सिंह की रेजिमेंट 3 ग्रेनेडियर्स की कमान संभाल चुके रिटायर्ड कर्नल आशुतोष काले ने ढाई साल की कड़ी मेहनत के बाद मेजर सुधीर वालिया पर उन्होंने ''रैंबो" नाम से एक किताब लिखी है। अमर उजाला से खास बातचीत में कर्नल आशुतोष काले बताते हैं कि मेजर सुधीर वालिया के अंदर दिलेरी, गजब का जोश और लक्ष्य के प्रति समर्पण था। मेजर सुधीर वालिया का जन्म पालमपुर में हुआ था। बचपन से ही वे बेहद साहसी थे। वह बताते हैं कि वे कभी सुधीर को जानते भी नहीं थे। यहां तक कि उनके एनडीए के कोर्स में भी चार बैच का अंतर था। 72वें बैच के मेजर सुधीर उनसे काफी जूनियर थे। 1998 में जब वे आईएमए में इंस्ट्रक्टर नियुक्त हुए, तब भी सुधीर की पोस्टिंग वहां हुई थी। उस दौरान भी उनकी कम ही बातचीत होती थी। 2009 में कर्नल आशुतोष ने रिटारमेंट ले लिया और सिविल जॉब में आ गए। कुछ साल पहले ही उनके एक जानकार प्रकाशक को मेजर सुधीर की वीरता के बारे में पता चला, तो उन्होंने उनसे मेजर सुधीर के बारे में पूछा और उन पर किताब लिखने के लिए प्रेरित किया।
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करगिल में जुलु टॉप को पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ाया
रिटायर्ड कर्नल आशुतोष काले बताते हैं कि जब करगिल की जंग शुरू हुई तो उस दौरान मेजर सुधीर तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक के एडीसी (एड डे कैंप) यानी पर्सनल सेक्रेटरी थे। सेना प्रमुख के साथ होने के नाते वे करगिल में हो रहे सैन्य ऑपरेशन से पूरी तरह से वाकिफ थे। जब किसी की मौत की खबर आती थी, तो उन्हें बेहद गुस्सा आता था। आखिरकार उन्होंने जनरल वीपी मलिक से करगिल जंग में हिस्सा लेने के लिए विशेष अनुमति मांगी और अनुमति मिलने के बाद वे अपनी पेरेंट यूनिट चले गए। 24 मई को अपना जन्मदिन मनाने के बाद उन्हें करगिल भेजा गया। जहां उन्हें मश्कोह घाटी में जुलु टॉप पर कब्जा करने का टास्क सौंपा गया। वह चोटी उस समय पाकिस्तान के कब्जे में थी और भारत के लिए सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण थी। कर्नल काले बताते हैं कि 25 जून 1999 को भारतीय सेना ने मेजर सुधीर के नेतृत्व में जुलु टॉप पर एक जबरदस्त हमला किया और जो टास्क दिया गया था, उसे पूरा करते हुए करगिल की जुलु टॉप पर तिरंगा लहराया। उस दौरान उन्हें फील्ड मेजर भी बनाया गया। वह बताते हैं कि यह आखिरी चोटी थी और इस चोटी पर कब्जे के साथ ही करगिल जंग की औपचारिक समाप्ति हो गई।
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कर्नल आशुतोष काले बताते हैं कि वैसे तो मेजर सुधीर ने श्रीलंका के जंगलों से लेकर बहुत से अफगानी आतंकवादियों के खिलाफ कई गुप्त अभियानों और आतंक निरोधी दस्तों का नेतृत्व किया। करगिल की जंग के बाद उनकी पोस्टिंग कश्मीर के कुपवाड़ा में हो गई, जो उस समय कभी आतंकियों का गढ़ हुआ करता था। यहां का एक किस्सा वह बताते हैं कि मेजर सुधीर को डर बिल्कुल नहीं लगता था। दिलो दिमाग से वे एकदम मजबूत थे। कुपवाड़ा की लोलाब घाटी में एक ऑपरेशन में वे दो आतंकियों का भाग कर पीछा कर रहे थे। उनमें से एक आतंकी को मार गिराया, तो दूसरा भाग कर पहाड़ी में एक गुफा में छुप गया। वे बिना डरे और सोचे समझे उस गुफा में घुस गए। गुफा में आतंकी अपनी एके47 ताने उन पर निशाना लगाने के लिए तैयार था। गुफा इतनी संकरी थी कि कोहनी मोड़ने की भी जगह नहीं थी। दोनों आमने सामने थे। मेजर सुधीर की आंखों में तो खून उतर आया था, उनका गुस्सा देख कर ही आतंकी घबरा गया और हथियार ही नहीं चला पाया। मेजर सुधीर ने उसे बिना हथियार का इस्तेमाल किए बिना ही वहीं दबोच लिया।
सीटी मार कर आतंकी का ध्यान बंटाया
कर्नल आशुतोष काले मेजर सुधीर का दूसरा किस्सा सुनाते हुए बताते हैं कि वह हमेशा टीम को लीड करते थे। कभी पीछे से ऑर्डर नहीं देते थे। एक एंबुश के दौरान उन्हें चार आतंकी दिखाई दिए। संयोग से वे जहां छुपे हुए थे, वहीं एक आतंकी हथियार समेत पेशाब करने लगा। मेजर सुधीर वहीं झाड़ियों में झुपे हुए थे। तभी वे अचानक खड़े हुए और जोर से सीटी मारी। आतंकी घबरा गया और अपनी एके-47 असॉल्ट राइफल उठाने लगा। लेकिन इससे पहले वह उन पर हमला करता, उन्होंने उसे सीधे गोली मार दी।
चार आतंकियों को किया ढेर
मेजर सुधीर की बहादुरी का एक और किस्सा सुनाते हुए कर्नल आशुतोष बताते हैं कि 29 अगस्त 1999 में ही उनकी युनिट को खबर लगी कि कुपवाड़ा के हाफफ्रूडा के घने जंगल मे 16-17 आतंकियों का एक गुट छिपा हुआ है। मेजर सुधीर आतंकियों के छुपने की जगह की खोजबीन करने में जुट गए। वहीं साइड में एक आतंकी ने उन्हें देख लिया और उनके साथी खड़े सिंह को गोली मार दी। मेजर सुधीर ने तुरंत पोजिशन लेते हुए चार आतंकियों को वहीं ढेर कर दिया। हालांकि उसी बीच वे भी गोलियों से छलनी हो गए। मात्र 30 साल की उम्र में यह उनका आखिरी ऑपरेशन था। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने रेस्क्यू से इंकार कर दिया और टीम के साथ बाकी आतंकियों को मार गिराया। लेकिन जब हेप्टर से उन्हें श्रीनगर अस्पताल ले जा रहे थे, तभी रास्ते में उनकी मौत हो गई और वे वतन पर शहीद हो गए। कर्नल आशुतोष बताते हैं कि आज मेजर सुधीर के परिवार में उनके बुजुर्ग पिता और बहन ही हैं। उनके भाई का भी बाद में देहांत हो गया।
सामने वाला दिमाग पढ़ने की थी काबलियत
कर्नल आशुतोष काले बताते हैं कि मेजर सुधीर की वीरता के कई अनगिनत और हैरान करने वाले किस्से किताब में लिखे हैं, जो रोमांच पैदा कर देंगे। वह बताते हैं कि महज 30 साल की उम्र और नौ साल की सर्विस में मेजर सुधीर वीरता की वह गाथा लिख गए, जो बिरले ही सुनी जाती है। वह कोई आम इंसान नहीं थे, वह सामने वाला दिमाग पढ़ लिया करते थे। दिमाग में ही सीन को विजुलाइज कर लिया करते थे। उन्हें कोई स्ट्रेस नहीं होता था। वह कहते थे कि मेरी ट्रेनिंग इन आतंकियों से बेहतर है। मैंने भारतीय फौज में ट्रेनिंग ली है, ये आतंकी तो कैंपों में ट्रेनिंग लेकर आए हैं। वह अक्सर कहा करते थे कि आतंकियों की प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं होती। गोली चलाते हुए उनके हाथ लड़खड़ाते हैं, आतंकियों की एक-आध गोली उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी, बल्कि वे ही उससे पहले दो गोलियां उसके सिर में दाग देंगे। सरकार ने मेजर सुधीर के अदम्य साहस और वीरता को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत शांतिकाल के सर्वोच्च सम्मान अशोक चक्र से सम्मनित किया। उन्हें दो बार सेना मेडल से भी सम्मानित किया गया।