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India-US Relation:अमेरिका से आएगी अच्छी खबर और खूब चलेगी भारत से दोस्ती, रणनीतिकारों ने तेज किया काम
सार
भारत अमेरिका से आने उत्पाद पर ड्यूटी को घटाने, आयात को संतुलित करने पर भी काम कर रहा है। निर्यात, तकनीकी सौदे, रक्षा सौदे, ईधन तेल के कारोबार में संतुलन लाकर भी इसे साधने की योजना बन रही है।
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पीएम नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो : PTI
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विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट और प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्र सर्वप्रथम की नीति रंग लाएगी। भारतीय रणनीतिकारों को भरोसा है कि अगले महीनों में अच्छी खबर आएगी। वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारी भी लक्ष्य को साधने में जुटे हैं। विदेश मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि कोशिश सही दिशा में चल रही है। पूर्व विदेश सचिव शशांक भी कह रहे हैं भारत सावधानी से आगे बढ़ रहा है। उम्मीद है कि सब अच्छा होगा।
भारत अमेरिका से आने उत्पाद पर ड्यूटी को घटाने, आयात को संतुलित करने पर भी काम कर रहा है। निर्यात, तकनीकी सौदे, रक्षा सौदे, ईधन तेल के कारोबार में संतुलन लाकर भी इसे साधने की योजना बन रही है। नाम नहीं छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अमेरिका के टैरिफ का जितना टेरर है, उतना खतरे की आशंका नहीं है। भारत अमेरिका के साथ तकनीकी सहयोग और साझेदारी के जरिए अपने लक्ष्य को साध लेगा।
प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, एनएसए समेत अन्य से मिलीं तुलसी गबार्ड
अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तुलसी गबार्ड रविवार को ढाई दिन की यात्रा पर भारत आईं। इस दौरान उन्होंने अपने समकक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की। कूटनीति के गलियारे में इस वार्ता को सफल और दूरगामी माना जा रहा है। अजीत डोभाल अर्जुन की तरह चिड़िया की एक आंख भेदना जानते हैं। डोभाल के पास एशियाई क्षेत्र को लेकर एक अलग सोच और समझ है। इसमें वो भारतीय हितों के साथ टकराव से बचने का प्रयास करते हैं। तुलसी गबार्ड रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मिली हैं।
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उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी हुई। प्रधानमंत्री ने उन्हें महाकुंभ का जल दिया तो गबार्ड ने प्रधानमंत्री को तुलसी की माला भेंट की। चर्चा है कि भारत ने अमेरिका के साथ सामरिक और रणनीतिक साझेदारी को अधिक विश्वसनीय बनाने, रक्षा, प्रौद्योगिकी और सूचनाओं को साझा करने में विश्वसनीयता बढ़ाने पर चर्चा की है। समुद्री क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाने, दक्षिण चीन सागर, दोनों देशों में सैन्य अभ्यास, समेत अन्य मुद्दों पर भी वार्ता हुई। गबार्ड ने इस यात्रा के दौरान अमेरिका की जमीन से भारत विरोधी गतिविधियों की अनुमति न होने देने का भरोसा दिया है। माना जा रहा है कि भारत ने गबार्ड के माध्यम से अमेरिका तक अपना संदेश पहुंचाया है।
भारत की रणनीति क्या?
सामरिक मामलों के जानकार पूर्व एयर वाइस माशर्ल एन बी सिंह कहते हैं कि मुझे भारत का रुख साफ दिखाई दे रहा है। इसमें कोई भ्रम की स्थिति नहीं है। प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा, विदेश मंत्री एस जयशंकर का रुख और भारत के बयान लगातार सुलझी हुई रणनीति का इशारा कर रहे हैं। भारत को पता है कि अमेरिका से उच्च तकनीकी की जरूरत है। अमेरिका दुनिया की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर रहा है। इसके अलावा ट्रंप-2 में अमेरिका और रूस के रिश्ते टकराव का संकेत नहीं दे रहे हैं। चीन के साथ अमेरिका संभलकर चल रहा है। चीन भारत का पड़ोसी देश है। इसलिए भारत यूरोप को महत्व देने के साथ-साथ सभी मोर्चे पर संतुलन साध कर चल रहा है। प्रधानमंत्री और शीर्ष नेताओं के रुख से भी साफ है कि भारत अमेरिका को नाराज करने और किसी देश को बहुत खुश करने के पक्ष में नहीं है। एनबी सिंह के मुताबिक ऐसा लग रहा है कि समय के साथ सब सध जाने के संकेत धीरे-धीरे दिखाई दे रहे हैं। हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
बार्डर लाइन को समझिए
विदेश मामलों के एक और जानकार हैं। रूस और भारत के साथ रिश्तों के संतुलन में कभी बहुत सक्रिय रहते थे। उनका कहना है कि ट्रंप के इस दौर में भारत का अमृतकाल चल रहा है। एशिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसे साथ रखकर अमेरिका चीन के साथ अपने हित, संतुलन दोनों साध सकता है। सूत्र का कहना है कि ट्रंप के रणनीतिकार इस बारीकी को समझते हैं। उन्हें (अमेरिका रणनीतिकारों) यह भी पता है कि भारत चीन से चौकन्ना रहता है, लेकिन उसके साथ किसी तरह का टकराव नहीं चाहता। वह चीन के खिलाफ सैन्य भमिका से परहेज करता है। ऐसे में भारत को तकनीकी सहयोग और प्रौद्योगिकी में अवसर देकर काफी कुछ किया जा सकता है। नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार समेत अन्य देशों के साथ अमरिकी रिश्तों के समीकरण बनाए जा सकते हैं। सूत्र का कहना है कि यही वजह थी कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के समय में भी अमेरिका ने संबंध की खिड़की को बहुत नहीं सिकोड़ा।
जार्ज वॉकर बुश का वह दौर याद है?
एसके शर्मा का कहना है कि दिल्ली के पुराना किला परिसर में कार्यक्रम चल रहा था। अमेरिका ने 2005 में 18 जुलाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पीठ थप थपाई थी। इसकी लोगों ने बड़ी आलोचना की थी, लेकिन इसने अमेरिका द्वारा भारत के साथ परमाणु करार का रास्ता खोला था। शर्मा कहते हैं कि अमेरिका ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर परमाणु करार को अंजाम तक पहुंचाया। इससे अमेरिका के साथ रिश्ते पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से आगे निकल गए थे। इसलिए भारत को बहुत चिंतित होने की जरूरत नहीं है।
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भारत अमेरिका से आने उत्पाद पर ड्यूटी को घटाने, आयात को संतुलित करने पर भी काम कर रहा है। निर्यात, तकनीकी सौदे, रक्षा सौदे, ईधन तेल के कारोबार में संतुलन लाकर भी इसे साधने की योजना बन रही है। नाम नहीं छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अमेरिका के टैरिफ का जितना टेरर है, उतना खतरे की आशंका नहीं है। भारत अमेरिका के साथ तकनीकी सहयोग और साझेदारी के जरिए अपने लक्ष्य को साध लेगा।
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प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, एनएसए समेत अन्य से मिलीं तुलसी गबार्ड
अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तुलसी गबार्ड रविवार को ढाई दिन की यात्रा पर भारत आईं। इस दौरान उन्होंने अपने समकक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की। कूटनीति के गलियारे में इस वार्ता को सफल और दूरगामी माना जा रहा है। अजीत डोभाल अर्जुन की तरह चिड़िया की एक आंख भेदना जानते हैं। डोभाल के पास एशियाई क्षेत्र को लेकर एक अलग सोच और समझ है। इसमें वो भारतीय हितों के साथ टकराव से बचने का प्रयास करते हैं। तुलसी गबार्ड रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मिली हैं।
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उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी हुई। प्रधानमंत्री ने उन्हें महाकुंभ का जल दिया तो गबार्ड ने प्रधानमंत्री को तुलसी की माला भेंट की। चर्चा है कि भारत ने अमेरिका के साथ सामरिक और रणनीतिक साझेदारी को अधिक विश्वसनीय बनाने, रक्षा, प्रौद्योगिकी और सूचनाओं को साझा करने में विश्वसनीयता बढ़ाने पर चर्चा की है। समुद्री क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाने, दक्षिण चीन सागर, दोनों देशों में सैन्य अभ्यास, समेत अन्य मुद्दों पर भी वार्ता हुई। गबार्ड ने इस यात्रा के दौरान अमेरिका की जमीन से भारत विरोधी गतिविधियों की अनुमति न होने देने का भरोसा दिया है। माना जा रहा है कि भारत ने गबार्ड के माध्यम से अमेरिका तक अपना संदेश पहुंचाया है।
भारत की रणनीति क्या?
सामरिक मामलों के जानकार पूर्व एयर वाइस माशर्ल एन बी सिंह कहते हैं कि मुझे भारत का रुख साफ दिखाई दे रहा है। इसमें कोई भ्रम की स्थिति नहीं है। प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा, विदेश मंत्री एस जयशंकर का रुख और भारत के बयान लगातार सुलझी हुई रणनीति का इशारा कर रहे हैं। भारत को पता है कि अमेरिका से उच्च तकनीकी की जरूरत है। अमेरिका दुनिया की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर रहा है। इसके अलावा ट्रंप-2 में अमेरिका और रूस के रिश्ते टकराव का संकेत नहीं दे रहे हैं। चीन के साथ अमेरिका संभलकर चल रहा है। चीन भारत का पड़ोसी देश है। इसलिए भारत यूरोप को महत्व देने के साथ-साथ सभी मोर्चे पर संतुलन साध कर चल रहा है। प्रधानमंत्री और शीर्ष नेताओं के रुख से भी साफ है कि भारत अमेरिका को नाराज करने और किसी देश को बहुत खुश करने के पक्ष में नहीं है। एनबी सिंह के मुताबिक ऐसा लग रहा है कि समय के साथ सब सध जाने के संकेत धीरे-धीरे दिखाई दे रहे हैं। हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
बार्डर लाइन को समझिए
विदेश मामलों के एक और जानकार हैं। रूस और भारत के साथ रिश्तों के संतुलन में कभी बहुत सक्रिय रहते थे। उनका कहना है कि ट्रंप के इस दौर में भारत का अमृतकाल चल रहा है। एशिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसे साथ रखकर अमेरिका चीन के साथ अपने हित, संतुलन दोनों साध सकता है। सूत्र का कहना है कि ट्रंप के रणनीतिकार इस बारीकी को समझते हैं। उन्हें (अमेरिका रणनीतिकारों) यह भी पता है कि भारत चीन से चौकन्ना रहता है, लेकिन उसके साथ किसी तरह का टकराव नहीं चाहता। वह चीन के खिलाफ सैन्य भमिका से परहेज करता है। ऐसे में भारत को तकनीकी सहयोग और प्रौद्योगिकी में अवसर देकर काफी कुछ किया जा सकता है। नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार समेत अन्य देशों के साथ अमरिकी रिश्तों के समीकरण बनाए जा सकते हैं। सूत्र का कहना है कि यही वजह थी कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के समय में भी अमेरिका ने संबंध की खिड़की को बहुत नहीं सिकोड़ा।
जार्ज वॉकर बुश का वह दौर याद है?
एसके शर्मा का कहना है कि दिल्ली के पुराना किला परिसर में कार्यक्रम चल रहा था। अमेरिका ने 2005 में 18 जुलाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पीठ थप थपाई थी। इसकी लोगों ने बड़ी आलोचना की थी, लेकिन इसने अमेरिका द्वारा भारत के साथ परमाणु करार का रास्ता खोला था। शर्मा कहते हैं कि अमेरिका ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर परमाणु करार को अंजाम तक पहुंचाया। इससे अमेरिका के साथ रिश्ते पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से आगे निकल गए थे। इसलिए भारत को बहुत चिंतित होने की जरूरत नहीं है।