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भारत-थाईलैंड संबंध: ताड़ के पत्तों पर अंकित अति प्राचीन बौध साहित्य को सुरक्षित करने पर समझौता
Tue, 26 Apr 2022 07:29 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली/वांग नोई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली/वांग नोई
Published by: Amit Mandal
Updated Tue, 26 Apr 2022 07:29 PM IST
सार
साल 1947 में भारत की आजादी के बाद जिन देशों से उसके शुरुआती संबंध बने, उनमें थाईलैंड भी शामिल रहा। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक रूप से संबंध रहे हैं।
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India Thailand Relations
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
थाईलैंड में ताड़ के पत्तों पर अंकित अति प्राचीन बौध साहित्य को सुरक्षित करने, उसके अध्ययन- शोध और उसे आम लोगों के बीच लाने का प्रयास शुरू हुआ है। इसके लिए थाईलैंड में अयूथया प्रांत के वांग नोई स्थित एमसीयू के रेक्टर बिल्डिंग में भारत के राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (एनएमएम), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और थाईलैंड की एमसीयू (चियांग माई परिसर) के बीच एक सहमति बनी है। एमसीयू के रेक्टर प्रो. फरा धमवज्रबंडित की मौजूदगी में सहमति पत्र पर इंदिरा गांधी कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी और एमसीयू के वाइस रेक्टर फरा विमोलमुनि ने हस्ताक्षर किए।
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नई दिल्ली में इंदिरा गांधी कला केंद्र के मीडिया नियंत्रक अनुराग पुनेठा ने यह जानकारी दी है। समझौते के मुताबिक, उक्त साहित्य का डिजटलीकरण भी किया जाएगा। राष्ट्रीय कला केंद्र इसके लिए एमसीयू के चियांग माई परिसर में एक संरक्षण प्रोयगशाला का भी निर्माण करेगा।
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दक्षिण पूर्व एशिया में भारत प्रभावी देशों के रूप में थाईलैंड के साथ लाओस, कंबोडिया, म्यामार जैसे देशों के नाम लिए जाते हैं। इन देशों से भारत के लगभग दो हजार वर्ष पुराने संबंध हैं। यह भी प्रमाण मिलते हैं कि सम्राट अशोक ने अनेक बौध भिक्षुओं को थाईलैंड भेजा था। संस्कृत और पाली से थाई भाषाओं में अनुवाद किया गया ढेर सारा साहित्य वहां मूल रूप में मौजूद है। साल 1947 में भारत की आजादी के बाद जिन देशों से उसके शुरुआती संबंध बने, उनमें थाईलैंड भी शामिल रहा। पिछले कुछ वर्षों में तो दोनों देशों के बीच न केवल सांस्कृतिक-सामाजिक बल्कि समुद्री बंदरगाहों के जरिए व्यापारिक और रणनीतिक रिश्ते भी बने हैं।
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