फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   India should maintain the tradition of dialogue, cooperation, relations with Nepal, only then the path will come out

भारत को नेपाल से संवाद, सहयोग, संबंध की परंपरा को बनाए रखना चाहिए, तभी निकलेगा रास्ता

Fri, 22 May 2020 09:16 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 22 May 2020 09:16 PM IST
सार

  • चीन के करीब आना भारत के पक्ष में नहीं
  • चीन ने राष्ट्रवादी ओली की सरकार बचाई है
  • 2015 में पैदा हुए इस भ्रम को संवाद से ही दूर किया जा सकता है

विज्ञापन
India should maintain the tradition of dialogue, cooperation, relations with Nepal, only then the path will come out
नेपाल के प्राधानमंत्री के साथ पीएम मोदी - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

नेपाल में भारत विरोधी लहर चल रही है। 2015 में भारत की तरफ से सीमाएं सील करने के बाद यह स्थिति पैदा हुई, लेकिन भारत को चाहिए कि वह नेपाल को झुलाए नहीं। और बातचीत करता रहे।

विज्ञापन


प्रो. एसडी मुनि भारतीय विदेश नीति पर अच्छी पकड़ रखते हैं। दक्षिण पूर्वी देशों में राजदूत, 1990 के दशक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद में रहे भारत-नेपाल संबंधों पर भी गहरी पकड़ रखते हैं।
विज्ञापन


उन्होंने कहा कि भारत को नेपाल के साथ अपने संबंधों को लेकर संवेदनशीलता बढ़ानी चाहिए। नेपाल में चीन के दखल को रोकने के लिए लगातार संबंधों को नया आयाम देने की पहल करनी चाहिए। यह संवाद से ही होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

नेपाल हमारा छोटा भाई

प्रो. सुखदेव मुनि नेपाल को भारत का छोटा भाई मानते हैं। उनका कहना है कि भारत-नेपाल संबंध इसी बुनियाद पर चला, फला और फूला है। 2015 में भारत सरकार ने सीमाएं सील कर दी थीं। इसके बाद नेपाल में भारत विरोधी भावना ने काफी बड़ा आकार ले लिया।


वामपंथी भी इसका फायदा उठा रहे थे। यह वही दौर है, जिसने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को वहां का बड़ा राष्ट्रवादी नेता बना दिया। प्रो. एसडी मुनि 2015 में भारत सरकार के उठाए कदम को बड़ी भूल मानते हैं। वह बताते हैं इसने नेपाली जनमानस को भारत विरोधी बनाने का काम किया। चीन ने इसका खूब फायदा उठाने की कोशिश की।

चीन ने बचाई ओली की सरकार

प्रो. मुनि का कहना है कि सही माने में केपी शर्मा ओली की सरकार डांवाडोल हो रही थी। चीन के सहयोग से बच पाई है। अंदरखाने में प्रधानमंत्री ओली पर भारी दबाव है। वहां के राष्ट्रवादी भी ओली पर सवाल उठाने लगे हैं।

वहीं, ओली दूसरी बार सत्ता में आना चाहते हैं। इसलिए वह विवादित क्षेत्र में अपनी सैनिकों की तैनाती करके देश की जनता को राष्ट्रवाद का संदेश दे रहे हैं।

नेपाल का नया नक्शा पेश करना, कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधूरा को अपना बताना, नेपाल के प्रधानमंत्री का यह बयान कि भारत से आने वाला वायरस को चीन-इटली से ज्यादा खतरनाक कहना इसी का हिस्सा है।

दरअसल वह नेपाल के लोगों का गुस्सा शांत कर रहे हैं। चीन इस समय इसी का फायदा उठा रहा है। कालापानी और लिपुलेख को लेकर चीन ने नेपाल को विरोध करने के लिए उकसाया है।

एसडी मुनि का कहना है कि इस संभावना से इंकार करने का कोई कारण नहीं है।

मुद्दा पुराना है, नेपाल की नाराजगी भी ठीक नहीं

एसडी मुनि का कहना है कि कालापानी, लिपुलेख या लिम्पियाधुरा को लेकर भारत-नेपाल में विवाद काफी पुराना है। यह मुद्दा 20-25 साल से उठ रहा है। इसे हम जानबूझकर टालते जाते हैं। भारत इस क्षेत्र को खाली नहीं करना चाहता, इसलिए तूल भी नहीं देता।

पहले नेपाल भी बातचीत के दौरान केवल मुद्दा उठाकर रह जाता था। कुछ मुद्दे 1954 से चले आ रहे हैं। अब यह झगड़े की शक्ल में बदल रहा है। यह अच्छी बात नहीं है।

उनका कहना है कि नेपाल की नाराजगी में हमारा नुकसान और चीन का फायदा ज्यादा है। चीन की शह पर नेपाल इसे विवाद का रूप देकर अंतरराष्ट्रीय अदालत में ले जा सकता है। वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोर मचा सकता है।

सड़क के उद्घाटन से गरमाया मामला

प्रो. मुनि का कहना है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेख तक जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया है। यह सड़क चीन के बार्डर तक जा रही है। नए नक्शे में काली नदी का भी जिक्र आया है।

सड़क के उद्घाटन के बाद यह मुद्दा नेपाली जनता के बीच में फैल गया है। चीन भी बौखलाया है। क्योंकि भारत लद्दाख, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश तक लगी चीन सीमाओं तक अपनी सड़क बना रहा है।

यह सड़क रक्षा क्षेत्र के हिसाब से महत्वपूर्ण है। इसके कारण चीन लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक सीमा पर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा है। नेपाल को भी उसने इसी एजेंडे के तहत उकसाया है। यह मामला अब झगड़े की शक्ल ले रहा है। 

भारत करेगा बात तो बदलेगी सूरत

प्रो. मुनि कहते हैं कि 2015 में प्रधानमंत्री मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री ने संयुक्त वक्तव्य में लिपुलेख को भारत का हिस्सा कहा था। यह तो भारत का पक्ष था। दोनों देशों के दस्तावेजों में एक दूसरे के पक्ष में काफी कुछ है। चीन यहां कहीं नजर आता।

इसलिए भारत को संवाद, सहयोग, संबंध की परंपरा को बनाए रखना चाहिए। मेरे ख्याल में बात होगी तो हर रास्ता निकलेगा। नेपाल में भारत विरोध कम होगा। अभी भारत ने कहा कि है कि वह इस मुद्दे पर कोविड-19 संक्रमण से निबटने के बाद बात करेगा।



मुनि का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी जब चाहें नेपाल के प्रधानमंत्री से टेलीफोन पर या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बात कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने पहले भी किया है। यह होते रहना चाहिए।
 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed