दुखद: भारत के सांस्कृतिक राजदूत राजेंद्र अरुण का निधन, 'मॉरीशस के तुलसी' के तौर पर पहचानते थे लोग
भारत की अध्यात्मिक, सांस्कृतिक धार्मिक व रामायण की ध्वजा फहराने वाले राजेंद्र अरुण का सोमवार को मॉरीशस में निधन हो गया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निर्देशन में कई पत्र-पत्रिकाओं में काम किया। लोग उन्हें मॉरीशस की तुलसी के तौर पर भी जानते थे।
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भारत की अध्यात्मिक, सांस्कृतिक धार्मिक व रामायण की ध्वजा फहराने वाले राजेंद्र अरुण का सोमवार को मॉरीशस में निधन हो गया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निर्देशन में कई पत्र-पत्रिकाओं में काम किया। लोग उन्हें मॉरीशस की तुलसी के तौर पर भी जानते थे।
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के गांव नरवापितम्बरपुर में 29 जुलाई, 1945 को जन्मे राजेंद्र अरुण ने प्रयाग विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद पत्रकारिता को व्यवसाय के रूप में चुना था। अरुण 1970 से ही हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार कर रहे थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निर्देशन में कई हिंदी समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में पत्रकारिता के दायित्वों का निर्वहन किया।
अरुण से प्रभावित होकर मॉरीशस में बना हिंदी के लिए कानून
राजेंद्र अरुण उस वक्त के इलाहाबाद यानी अब के प्रयागराज से प्रकाशित जनता की आवाज के प्रधान संपादक के तौर पर कार्यरत थे। वे वर्ष 1973 में विश्व पत्रकारिता सम्मेलन में भाग लेने मॉरीशस गए। हिंदी भाषा के लिए उनके काम से प्रभावित होकर मॉरीशस के तत्कालीन राष्ट्रपति शिवसागर रामगुलाम ने संसद में कानून बनाकर हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए रामायण सेंटर की स्थापना कर दी और हिदी अकादमी एवं रामायण सेंटर का अरुण को अध्यक्ष बना दिया। जहां से उन्होंने दो दर्जन से अधिक पुस्तकें हिदी में लिखकर भाषा के प्रसार में अहम योगादान दिया। रामायण सेंटर अब रामायण के अध्ययन का अंतरराष्ट्रीय केंद्र बन चुका है।
मॉरीशस के तत्कालीन राष्ट्रपति शिवसागर ने उन्हें अपने हिंदी पत्र 'जनता' का संपादक बनाकर उनसे मॉरिशस में ही रहने का निवेदन किया। उनके निवदेन के बाद अरुण ने मॉरीशस में रहने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। मॉरिशस में रहते हुए उन्होंने धर्मयुग, कादंबिनी, साप्ताहिक हिंदुस्तान से लेकर कई प्रमुख अखबारों में मॉरीशस की साहित्यिक सांस्कृतिक व रचनात्मक गतिविधियों के बारे में रोचक लेख लिखकर मॉरीशस व भारत के साहित्य के जगत में भी अपनी खास पहचान बनाई।
मंथन से रामकथा तक का सफर..
राजेंद्र अरुण गोयल ने 1982 में एम.बी.सी. रेडियो पर रामायण की व्याख्या पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम ‘मंथन’ आरंभ किया। लोगों ने इसे खूब सराहा। यह कार्यक्रम ‘मानस मंथन’ के नाम से अब तक जारी है। इस कार्यक्रम की लोकप्रियता से रामकथा की शुरुआत हुई। वर्ष 2000 में रामकथा को विश्व स्तर पर प्रसारित करने के उद्देश्य से ‘रामायण सेंटर’ की स्थापना की।
स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल हुई रामायण
रामायण सेंटर के शुरु होने का ये प्रभाव हुआ कि रामायण को वहां के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बनाया गया है। रामायण की इसी लोकप्रियता ने इस देश में रामायण सेंटर की नींव रखी है। हालांकि, बाद उन्होंने रामयण सेंटर की ब्रांच अपने गांव समेत कई अन्य स्थानों पर भी बनाई।