WMO: 50 वर्षों में खराब मौसम-प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारत में गई 1.3 लाख लोगों की जान; UN की रिपोर्ट में दावा
WMO ने हर चार साल में होने वाले विश्व मौसम विज्ञान कांग्रेस में यह आंकड़े जारी किए हैं। विश्व मौसम विज्ञान कांग्रेस सोमवार को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में शुरू हुआ है। इसमें 2027 के अंत तक पृथ्वी पर सभी लोगों तक शुरुआती वार्निंग सिस्टम सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई में तेजी लाने और बढ़ाने पर उच्च स्तरीय वार्ता की गई।
विस्तार
दुनियाभर में गर्मी की तपन दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। वैश्विक तपन और जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनियाभर में बहस भी लंबे समय से चल रही है। कुछ देश इस मुद्दे पर साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं तो कुछ इसकी चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए अपने यहां अंधाधुंध औद्योगिक विकास को बढ़ावा दे रहे हैं। इस बीच, सामने आया है कि 1970 से 2021 के बीच पचास सालों में भारत में गंभीर मौसमी दशाओं, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं के कारण 1.3 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई है। संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी विश्व मौसम विज्ञान विभाग ने अपनी रिपोर्ट नें यह दावा किया है।
खराब मौसमी दशाओं और प्राकृतिक आपदाओं से भारत में मारे गए 1.3 लाख लोग
यूएन की विशेष एजेंसी विश्व मौसम विज्ञान विभाग ने अपनी इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन सालों में खराब मौसम, जलवायु और जल संबंधी घटनाओं के कारण भारत को 573 आपदाओं का सामना करना पड़ा है। इन आपदाओं में 1,38,377 लोगों की जान गई है। साथ ही 5 से 12 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। वहीं, भारत मौसम विज्ञान विभाग ने भारत की जलवायु पर जो वार्षिक वक्तव्य जारी किया था उसमें विभाग ने बताया था कि 2022 में चरम मौसम की घटनाओं के कारण देश में 2,227 लोग हताहत हुए थे।
वैश्विक स्तर पर 20 लाख लोगों की हुई मौत
वहीं, वैश्विक स्तर पर 11,778 आपदा की घटनाएं इस समयावधि में दर्ज की गईं। साथ ही वैश्विक स्तर पर इस अवधि के दौरान 20 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हुई और 4.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दुनिया भर में रिपोर्ट की गई मौतों में से 90 प्रतिशत से अधिक विकासशील देशों में हुई हैं।
WMO विश्व मौसम विज्ञान कांग्रेस में जारी किए गए आंकड़े
WMO ने हर चार साल में होने वाले विश्व मौसम विज्ञान कांग्रेस में यह आंकड़े जारी किए हैं। विश्व मौसम विज्ञान कांग्रेस सोमवार को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में शुरू हुआ है। इसमें 2027 के अंत तक पृथ्वी पर सभी लोगों तक शुरुआती वार्निंग सिस्टम सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई में तेजी लाने और बढ़ाने पर उच्च स्तरीय वार्ता की गई। गौरतलब है कि 'यूनाइटेड नेशंस अर्ली वार्निंग्स फॉर ऑल इनिशिएटिव' विश्व मौसम विज्ञान कांग्रेस की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था द्वारा समर्थित है।
अफ्रीका में आया उष्णकटिबंधीय चक्रवात इडाई सबसे भयानक घटना
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मार्च 2019 में उष्णकटिबंधीय चक्रवात इडाई अफ्रीका (2.1 बिलियन अमरीकी डालर) में हुई घटना सबसे भयानक थी। डब्ल्यूएमओ के महासचिव प्रोफेसर पेटेरी तालस ने कहा कि समाज के सबसे कमजोर समुदाय के लोग खराब मौसमी दशाओं, जलवायु परिवर्तन और पानी से संबंधित खतरों का खामियाजा भुगतते हैं।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई वातावरण में अस्थिरता
बता दें कि जलवायु परिवर्तन ने वातावरण में अस्थिरता को बढ़ा दिया है। इसके कारण आंधी, बिजली और भारी बारिश की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। मौसम विज्ञानियों ने यह भी दावा किया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में चक्रवाती तूफान भी और तीव्र हो रहे हैं। साथ ही ये लंबी अवधि के लिए अपनी भयावहता बनाए रख रहे हैं।
35,000 से ज्यादा प्रजातियों पर संकट
बढ़ते तापमान की वजह से 35 हजार से ज्यादा प्रजातियों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्युशन जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में पृथ्वी की सतह के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने से दुनिया की 15 फीसदी प्रजातियों के प्राकृतिक अधिवास नष्ट होने लगेंगे। जबकि, 2.5 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा, तो 30 फीसदी प्रजातियां खतरे में होंगी। हालांकि, यह शोध का विषय है कि ये प्रजातियां इन बदलावों के साथ किस तरह समायोजन करती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां नई परिस्थितियों में ढल सकती हैं, जबकि कुछ विलुप्त हो सकती हैं।