इंडिया जस्टिस रिपोर्ट: हर 10 लाख आबादी पर बस 19 जज, 4.8 करोड़ लंबित मुकदमों का बोझ
वर्ष 1987 में विधि आयोग ने 50 जजों की जरूरत बताई थी, लेकिन 35 साल में भी यह अंतर खत्म नहीं हुआ। न्याय देने के आधार पर राज्यवार रैंकिंग जारी की गई है। एक करोड़ से अधिक आबादी वाले राज्यों में कर्नाटक शीर्ष पर है।
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विधि आयोग ने वर्ष 1987 में प्रति 10 लाख लोगों पर कम से कम 50 जजों की जरूरत बताई थी। बावजूद इसके वर्तमान में अनुपात 10 लाख लोगों पर 19 जज का है। नतीजा...लंबित मुकदमों का बढ़ता बोझ, जो वर्तमान में 4.8 करोड़ तक पहुंच चुका है। यह चौंकाने वाले तथ्य मंगलवार को जारी इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (आईजेआर) 2-022 में सामने आए हैं। इसमें लोगों को न्याय देने के आधार पर राज्यवार रैंकिंग भी दी गई है। रिपोर्ट कहती है, एक करोड़ से अधिक आबादी वाले 18 राज्यों में कर्नाटक इस मामले में शीर्ष पर है, तो उत्तर प्रदेश सबसे नीचे। खास बात यह है कि इस रैंकिंग में शीर्ष पांच राज्यों में चार राज्य दक्षिण भारत से हैं।
न्यायपालिका पर खर्च में दिल्ली आगे
दिल्ली व चंडीगढ़ के अलावा किसी भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश ने अपने सालाना खर्च का एक प्रतिशत से ज्यादा न्यायपालिका पर खर्च नहीं किया। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के अनुसार देश में 20,076 जज हैं और 22 प्रतिशत आवंटित पद रिक्त हैं। उच्च न्यायालयों में ही 30 प्रतिशत पद खाली हैं। यानी, हर 71,224 नागरिकों पर सहायक अदालतों में 1 और 17,65,760 नागरिकों पर उच्च न्यायालयों में एक जज है। वहीं, 25 राज्य मानवाधिकार आयोगों में मार्च 2021 तक 33,312 केस लंबित थे, यहां भी 44% पद खाली हैं।
4 में से 1 केस 5 साल से ज्यादा समय से लंबित
28 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में हर चार में से एक केस पांच साल से अधिक समय से चल रहा है। 11 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की जिला अदालतों में भी यही हाल हैं। कम बजट की वजह से न्याय प्रणाली प्रभावित हो रही है।
- रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा कि पुलिस में महिला अधिकारियों की कमी नजर आ रही है। विधि सहायता सुधरी है, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में लोगों को बेहतर नि:शुल्क सहायता की जरूरत है।
अभी और काम की जरूरत
रिपोर्ट के मुख्य संपादक माजा दारुवाला ने कहा कि 2030 तक सभी को न्याय और प्रभावी व जवाबदेह संस्थाओं का वादा किया गया है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि अभी काफी काम करना होगाे। टाटा ट्रस्ट द्वारा 2020 से शुरू की गई यह रिपोर्ट भारत सरकार के आंकड़ों पर बनती है।
- इससे राज्यों के हालात व जरूरतों को समझा जा सकता है। रिपोर्ट विभिन्न संगठनों दक्ष, कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव, कॉमन कॉज, सेंटर फॉर सोशल जस्टिस, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी और टीआईएसएस द्वारा तैयार की गई।
वंचित वर्ग काे उचित प्रतिनिधित्व सिर्फ कर्नाटक में
कर्नाटक में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग का पुलिस अधिकारियों व स्टाफ में उचित प्रतिनिधित्व है। गुजरात व छत्तीसगढ़ में एससी, अरुणाचल प्रदेश, तेलंगाना व उत्तराखंड में एसटी और केरल, सिक्किम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना व तमिलनाडु में ओबीसी वर्ग का पुलिस में तय प्रतिनिधित्व है। किसी भी राज्य की सहायक व जिला अदालतों में तीनों वर्गों का निर्धारित कोटा पूरा नहीं है।
554 साल लगेंगे त्रिपुरा को 33% महिला पुलिसकर्मी रखने में
रिपोर्ट ने रोचक ढंग से बताया कि राज्यों में महिला पुलिसकर्मी मौजूदा दर से बढ़ती रहीं तो अनुपात 33 प्रतिशत पहुंचाने में कितने वर्ष लगेंगे? इनमें त्रिपुरा को सबसे ज्यादा 554 वर्ष, पुडुचेरी को 318 वर्ष, अंडमान-निकोबार को 226 वर्ष, झारखंड को 206 वर्ष और राजस्थान को 103 वर्ष लगने का अनुमान दिया गया। वहीं यूपी को इसमें 6 वर्ष, हरियाणा को 27, पंजाब को 25, उत्तराखंड को 20 और हिमाचल प्रदेश को 53 वर्ष लगेंगे।
सिक्किम-चंडीगढ़ की खास उपलब्धि
- सिर्फ अरुणाचल प्रदेश ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार सभी 24 पुलिस स्टेशनों में 14 जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।
- पुलिस 19 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में गांवों के मुकाबले शहरी आबादी को ज्यादा कवर कर रही है, केरल में तो शहरी पुलिस गांवों के मुकाबले 10 गुना औेर गुजरात में चार गुना आबादी को कवर कर रही है।
- केवल सिक्किम उच्च न्यायालय व चंडीगढ़ जिला अदालत में जजों के सभी पद भरे हुए हैं।
रैंकिंग में उत्तर भारत
- पुलिस, जेल, न्यायपालिका और कानूनी सहायता में राज्यों के प्रदर्शन पर आधारित रैंकिंग में यूपी को 10 में से 3.78 अंक मिले। बीते दो साल की तरह यूपी इस बार भी आखिरी 18वें स्थान पर रहा।
- पंजाब 5.10 अंक के साथ 12वें, हरियाणा 4.79 अंक के साथ 13वें, उत्तराखंड 14वें स्थान पर।
- 1 करोड़ से कम आबादी वाले राज्यों में हिमाचल छठवां रहा।