India-China LAC face-off: चीन की हरकत और आशंकाओं के बीच एक बड़ा सवाल, कैसे निपटेगा भारत?
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विस्तार
साउथ ब्लॉक में नौ दिसंबर को तवांग के यांगत्से में चीन की घुसपैठ की कोशिशों से माहौल गर्म है। रक्षा मंत्रालय के अस्त्र-शस्त्रों की खरीद परिषद भावी चुनौतियों और आशंकाओं को देखकर काफी सतर्क है। सेना मुख्यालय के तमाम डिवीजन भी अपने साजो-सामान की जरूरत को भांपकर आपात खरीद योजना से लेकर अन्य के गुणा-भाग में जुटे हैं। इस बार सेना मुख्यालय और रक्षा मंत्रालय लद्दाख में चीन की घुसपैठ के बाद मची अफरा-तफरी के झमेले में नहीं फंसना चाहती। अमर उजाला को यह जानकारी सूत्रों के माध्यम से मिली है। जितनी हलचल रक्षा मंत्रालय में है, उतनी विदेश मंत्रालय, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सचिवालय में भी है।
एक शीर्ष अधिकारी ने बातचीत में कहा कि दुनिया के अन्य देशों से आप चीन की तुलना नहीं कर सकते। वह (चीन) काफी अनप्रेडिक्टेबल रहे हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर चीन की सीमा पर घुसपैठ की कोशिशों को एक तरफा अवधारणा बदलने का प्रयास करार देते हैं। इसे लेकर वह द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी चीन पर आरोप लगा चुके हैं। विदेश और रक्षा मंत्रालय के अलावा तमाम रक्षा और सामरिक विशेषज्ञों, विदेश मंत्रालय के जानकारों का अनुमान है कि चीन आगे भी इस तरह के प्रयास जारी रखेगा। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि 2020 में गलवां में झड़प हुई। 2022 में यांगत्से में हुई। क्या पता यह 2023 में भी हो जाए। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि आखिर इसके बारे में क्या भविष्यवाणी की जाए? आपने गलवां सुना। इससे पहले डोकलाम और अब अरुणाचल के तवांग में। जबकि दोनों देशों के नेता, अधिकारी, सैन्य अधिकारी सब बात भी कर रहे हैं।
बड़ा सवाल, चीन से कैसे निपटेगा भारत?
विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार को भारत और चीन के बीच में युद्ध होने की आशंका न के बराबर दिखाई देती है। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह भी यही कहते हैं। हालांकि एनबी सिंह सैन्य बलों की भाषा दोहराते हैं। पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल बलविंदर सिंह संधू भी एनबी सिंह की भाषा में कहते हैं कि किसी को 1962 वाला भारत समझने की गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए। सेना मुख्यालय और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक भारतीय सैन्य बल हमेशा और हर समय हर चुनौती से निपटने के लिए तैयार हैं। रक्षा मंत्री साफ कहते हैं कि हम किसी की नापाक हरकत को कामयाब नहीं होने देंगे।
वहीं विदेश मंत्रालय के अधिकारी कहते हैं कि चीन के रुख में आए बदलाव को देखते हुए हमेशा सतर्क, सावधान रहने की जरूरत है। विदेश मंत्रालय के एक पूर्व प्रवक्ता और वर्तमान राजनयिक कहते हैं कि हमें चीन को सीमा पर ही रोकना होगा। क्योंकि उनके सैनिक सीमा में भीतर तक घुस आने के बाद गलवां घाटी की घुसपैठ की तरह वापस नहीं जाना चाहते। उन्हें तमाम प्रयासों से पीछे धकेलना पड़ता है। सूत्र का कहना है कि ताजा बदलाव को देखते हुए लगता है कि यदि सीमा पर ही न रोका गया, तो वास्तविक नियंत्रण रेखा लांघकर कहां तक आएंगे, कहा नहीं जा सकता। इसलिए भारत को लद्दाख में 2020 में हुई घुसपैठ के बाद अपनाई गई रणनीति को केंद्र में रखकर चलना होगा।
हर मोर्चे पर घेर रहा है चीन
चीन ने भारत को हर मोर्चे पर घेरने की रणनीति बनाई है। सामरिक और रणनीतिक मामलों में शोध कर रहे अमित मिश्रा कहते हैं कि भारत को घेरने के लिए ही चीन ने पाकिस्तान के कंधे पर हाथ रखा है। क्योंकि एशिया में चीन के बाद दूसरे नंबर पर भारत है। फर्क बस इतना है कि सीमा विस्तार नीति के चलते चीन के सभी पड़ोसी देश उससे आशंकित रहते हैं। जबकि इस मामले में भारत का रिकार्ड बहुत बेहतर है। भारत पड़ोसियों का सच्चा हितैषी है। अमित मिश्रा कहते हैं कि चीन की समुद्री रास्ते में भारत को घेरने की रिंग ऑफ पर्ल योजना और फाइव फिंगर जैसी योजना कोई नई बात नहीं है। मेरे विचार में चीन को तिब्बत पर काबिज होने के लिए अरुणाचल का तवांग चाहिए। पीओके से गुजरने वाले सिल्क रूट को ध्यान में रखकर वह लद्दाख में महत्वाकांक्षा बढ़ा रहा है। सिक्कम और गंगटोक तक अपनी निगाह के लिए डोकलाम में सैन्य संसाधन बढ़ाता जा रहा है। इसी तरह नेपाल के हिस्से में भी अपनी धमक बढ़ाने का प्रयास करता रहता है।
चीन से निपटने की गुपचुप चल रही है तैयारी
अमर उजाला के पास इसकी पुख्ता जानकारी है कि आर्टिलरी यूनिट को धार देने के लिए भारत ने 155 एमएम और 52 कैलिबर की टोड तोप सौदे के प्रयास को तेज कर दिया है। इन तोपों को वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास तैनात करने की तैयारी है। भारत को इस श्रेणी की 1600 से अधिक तोपें चाहिए। मानव रहित विमान, लक्ष्य भेदने में सक्षम यूएवी समेत अन्य की खरीद प्रक्रिया को हरी झंडी दी जा सकती है। गोला-बारुद समेत अन्य संसाधन को लेकर किसी तरह की कोताही से बचने का प्रयास शुरू हो गया है। सूत्र बताते हैं कि दोनों देशों के सैन्य कमांडरों, विदेश सेवा के अधिकारियों के बीच में बातचीत प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके अलावा डिप्लोमेटिक स्तर पर भी बातचीत जारी है। विदेश मंत्री एस जयशंकर, एनएसए अजीत डोभाल भी अपने समकक्ष के साथ रिश्ते को पटरी पर बनाए रखने की हर कोशिश करते हैं। कुल मिलाकर भारत ने चीन के साथ विश्वास बहाली (सीबीएम) और संवाद का रास्ता पूरी तरह से खुला रखा है। इसके साथ-साथ भारत ने चीन से निपटने की अपनी रणनीति में थोड़ा सा बदलाव किया है। डोकलाम, लद्दाख के बाद भारत ने अपने सैनिकों को यथास्थिति के आधार पर संतुलित रहकर पहले की तुलना में आक्रामक निर्णय लेने की भी छूट दे रखी है।
क्या चीन से निपटने में सक्षम है भारत?
ग्लोबल फायर पॉवर और सामरिक विशेषक्षों की समीक्षा में माना जा रहा है कि फायर पॉवर के मामले में चीन की स्थिति अमेरिका के बाद है। पूर्व विदेश सचिव शशांक और एयर वाइस मार्शल सिंह कहते हैं कि यूक्रेन से टकराव के बाद अमेरिका ने रूस की सैन्य ताकत को काफी कमजोर किया है। इससे पहले माना जाता था कि अमेरिका के बाद रूस है। लेकिन अब अमेरिका, चीन और इसके बाद रूस का नंबर आ रहा है। जबकि इस दृष्टि से भारत का सैन्य शक्ति संतुलन तुलना में कमजोर है। लेकिन युद्ध के अनुभव, समर्पित सैन्य शक्ति समेत अन्य मामले में भारत काफी बेहतर है। हालांकि विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत और चीन के बीच में बड़े पैमाने पर युद्ध की संभावना न के बराबर है। हां, दोनों देशों के बीच में किसी स्थानीय झड़प की स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए माना जा रहा है कि भारत चीन के साथ रक्षात्मक तरीके से अपनी आक्रामकता बनाए रखने की नीति बनाए रखेगा।