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Centre: 'टैरिफ का सहारा लेकर आईटीए समझौते से बाहर निकल सकता है भारत', संसदीय समिति ने सरकार से की सिफारिश
Mon, 15 Sep 2025 04:52 PM IST
बशु जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: बशु जैन
Updated Mon, 15 Sep 2025 04:52 PM IST
सार
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में भारत द्वारा 1997 में हस्ताक्षरित समझौते को आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की अनेक समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया है। इनमें व्यापक व्यापार घाटा और अधिक उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के लाभ के लिए भारतीय निर्माताओं को अप्रतिस्पर्धी बनाना शामिल है।
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भाजपा सांसद निशिकांत दुबे
- फोटो : ANI
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विस्तार
अमेरिकी टैरिफ के बीच संसदीय समिति ने आईटीए समझौते को लेकर सरकार से बड़ी सिफारिश की है। संसदीय समिति ने कहा कि अमेरिका की ओर से लगाए गए टैरिफ का सहारा लेकर भारत अपने घरेलू उद्योग की रक्षा के लिए बहुपक्षीय सूचना प्रौद्योगिकी समझौते (आईटीए) से बाहर निकल सकता है या फिर इसके प्रावधानों पर बातचीत कर सकता है।
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में भारत द्वारा 1997 में हस्ताक्षरित समझौते को आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की अनेक समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया है। इनमें व्यापक व्यापार घाटा और अधिक उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के लाभ के लिए भारतीय निर्माताओं को अप्रतिस्पर्धी बनाना शामिल है। समिति ने कहा कि आईटीए के साथ भारत का अनुभव निराशाजनक रहा है। इसने भारत से आईटी/इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को लगभग समाप्त कर दिया। जबकि लागत में कमी और प्रौद्योगिकी तक पहुंच के संदर्भ में उपभोक्ताओं को होने वाले इसके लाभों को स्वीकार किया गया है।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने समिति को बताया कि विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत आईटीए के भागीदार सदस्य के रूप में भारत एकतरफा रूप से इससे बाहर नहीं निकल सकता। समिति ने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि मौजूदा दौर में यह काफी संभव लगता है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली समिति ने सदस्य देशों के बीच उनके पारस्परिक राष्ट्रीय हित में द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर मुक्त व्यापार समझौतों का आह्वान किया।
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समिति ने कहा कि अमेरिका द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ की एकतरफा घोषणा और दुनिया के अन्य देशों पर अलग-अलग टैरिफ बढ़ाए जाने से उत्पन्न व्यापार परिदृश्य भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों प्रस्तुत करता है। विश्व व्यापार व्यवस्था तेजी से बदल रही है और इसलिए भारत को आईटीए के प्रति सक्रिय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
समिति ने पिछले सप्ताह अपनी रिपोर्ट स्वीकार कर ली और लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी। उम्मीद है कि संसद अगले सत्र में इसे स्वीकार कर लेगी। संसदीय निकाय ने समझौते से संबंधित सभी मंत्रालयों, विभागों और संगठनों को शामिल करते हुए एक उच्च स्तरीय अधिकार प्राप्त अंतर-मंत्रालयी समिति की सिफारिश की है।
इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी, विदेश मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय तथा वित्त मंत्रालय के अलावा अन्य हितधारक भी शामिल होंगे, जो आईटीए 1.0 और आईटीए 2.0, उनके संभावित भविष्य के प्रभावों की जांच करेंगे तथा बदलती विश्व आर्थिक व्यवस्था और बदलते वैश्विक गठबंधनों को ध्यान में रखते हुए देश के आर्थिक और रणनीतिक हितों में आगे का रास्ता सुझाएंगे।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने समिति को बताया कि आईटीए 1.0 के साथ भारत के अनुभव से मिली सीख के मद्देनजर समझौते के विस्तार में भाग न लेने का निर्णय लिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति मानती है कि अगर अमेरिका एकतरफा रूप से डब्ल्यूटीओ दायित्वों से बाहर आ सकता है, तो भारत को भी इसे आईटीए के तहत अनुकूल प्रावधानों के लिए डब्ल्यूटीओ में आगे बातचीत करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए तथा बाहर निकलने के विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए।
मेक इन इंडिया को सही दिशा में उठाए गए कदमों के रूप में सराहना करते हुए समिति ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने और मजबूत करने के लिए स्टार्ट अप्स और एमएसएमई के लिए कर रियायतों और सब्सिडी जैसे वित्तीय प्रोत्साहनों के साथ-साथ सतत नीति समर्थन, बुनियादी ढांचे के विकास को बढ़ावा देने और अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार में उचित निवेश की वकालत की।
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भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में भारत द्वारा 1997 में हस्ताक्षरित समझौते को आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की अनेक समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया है। इनमें व्यापक व्यापार घाटा और अधिक उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के लाभ के लिए भारतीय निर्माताओं को अप्रतिस्पर्धी बनाना शामिल है। समिति ने कहा कि आईटीए के साथ भारत का अनुभव निराशाजनक रहा है। इसने भारत से आईटी/इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को लगभग समाप्त कर दिया। जबकि लागत में कमी और प्रौद्योगिकी तक पहुंच के संदर्भ में उपभोक्ताओं को होने वाले इसके लाभों को स्वीकार किया गया है।
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इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने समिति को बताया कि विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत आईटीए के भागीदार सदस्य के रूप में भारत एकतरफा रूप से इससे बाहर नहीं निकल सकता। समिति ने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि मौजूदा दौर में यह काफी संभव लगता है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली समिति ने सदस्य देशों के बीच उनके पारस्परिक राष्ट्रीय हित में द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर मुक्त व्यापार समझौतों का आह्वान किया।
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समिति ने कहा कि अमेरिका द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ की एकतरफा घोषणा और दुनिया के अन्य देशों पर अलग-अलग टैरिफ बढ़ाए जाने से उत्पन्न व्यापार परिदृश्य भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों प्रस्तुत करता है। विश्व व्यापार व्यवस्था तेजी से बदल रही है और इसलिए भारत को आईटीए के प्रति सक्रिय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
समिति ने पिछले सप्ताह अपनी रिपोर्ट स्वीकार कर ली और लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी। उम्मीद है कि संसद अगले सत्र में इसे स्वीकार कर लेगी। संसदीय निकाय ने समझौते से संबंधित सभी मंत्रालयों, विभागों और संगठनों को शामिल करते हुए एक उच्च स्तरीय अधिकार प्राप्त अंतर-मंत्रालयी समिति की सिफारिश की है।
इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी, विदेश मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय तथा वित्त मंत्रालय के अलावा अन्य हितधारक भी शामिल होंगे, जो आईटीए 1.0 और आईटीए 2.0, उनके संभावित भविष्य के प्रभावों की जांच करेंगे तथा बदलती विश्व आर्थिक व्यवस्था और बदलते वैश्विक गठबंधनों को ध्यान में रखते हुए देश के आर्थिक और रणनीतिक हितों में आगे का रास्ता सुझाएंगे।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने समिति को बताया कि आईटीए 1.0 के साथ भारत के अनुभव से मिली सीख के मद्देनजर समझौते के विस्तार में भाग न लेने का निर्णय लिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति मानती है कि अगर अमेरिका एकतरफा रूप से डब्ल्यूटीओ दायित्वों से बाहर आ सकता है, तो भारत को भी इसे आईटीए के तहत अनुकूल प्रावधानों के लिए डब्ल्यूटीओ में आगे बातचीत करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए तथा बाहर निकलने के विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए।
मेक इन इंडिया को सही दिशा में उठाए गए कदमों के रूप में सराहना करते हुए समिति ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने और मजबूत करने के लिए स्टार्ट अप्स और एमएसएमई के लिए कर रियायतों और सब्सिडी जैसे वित्तीय प्रोत्साहनों के साथ-साथ सतत नीति समर्थन, बुनियादी ढांचे के विकास को बढ़ावा देने और अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार में उचित निवेश की वकालत की।