फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Inclusion of more women in the cabinet a step of reform or a compulsion to get votes?

कैबिनेट विस्तार: कैबिनेट में ज्यादा महिलाओं को शामिल करना सुधारवादी कदम या वोट पाने की मजबूरी?

Thu, 08 Jul 2021 06:29 PM IST
प्रतिभा ज्योति न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली,
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली, Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Thu, 08 Jul 2021 06:29 PM IST
सार

भाजपा नेतृत्व भी इस बात को गहराई से समझता है कि आधी आबादी में विश्वास की भावना जगाए बगैर सत्ता पाना मुश्किल है। इसलिए माना जा रहा है कि मोदी मत्रिमंडल में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के पीछे कहीं न कहीं हालिया विधानसभा चुनाव के परिणाम हैं जिसमें महिला मतदाताओं की अच्छी भागादारी रही है।

विज्ञापन
Inclusion of more women in the cabinet a step of reform or a compulsion to get votes?
मोदी टीम के सात महिला चेहरे - फोटो : twitter

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कैबिनेट फेरबदल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व और सम्मान दोनों बढ़ा है। बुधवार को हुए फेरबदल के बाद नरेंद्र मोदी सरकार में पहले के मुकाबले इस बार महिला मंत्रियों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है. इस फेरबदल से पहले मोदी मंत्रिमंडल में केवल छह महिला मंत्री थी जिनकी संख्या अब बढ़कर 11 हो गई है। 2004 के बाद से केंद्र सरकार में अभी सबसे अधिक महिला मंत्री है। मौजूदा कैबिनेट मंत्री निर्मला सीतारमन और स्मृति ईरानी, राज्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति और रेणुका सिंह के अलावा बुधवार को सरकार में सात नई महिला मंत्रियों को शामिल किया गया।

विज्ञापन


मोदी सरकार से पहले मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के दोनों कार्यकालों को मिलाकर देखें तो अधिकतम 10 महिला नेताओं को ही मंत्री बनने का मौका मिल पाया था। जबकि मोदी सरकार के 2014 के कार्यकाल में भी 6 महिलाएं मंत्री बनी थीं।  2019 में भी दोबारा सत्ता में आने के बाद भी 6 महिलाओं को ही मंत्री बनने का मौका दिया गया जिसे लेकर सरकर की काफी आलोचना भी हुई थी। वहीं इससे पहले 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली सरकार में भी महिला मंत्रियों की संख्या 11 थी। 
विज्ञापन


भाजपा नेताओं ने बताया ऐतिहासिक

मंत्रालय में फेरबदल की घोषणा के बाद, महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने ट्विटर पर कहा: "भारत के इतिहास में सबसे कम उम्र की महिला मंत्रियों का महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व है..." एक नए आत्म निर्भर भारत की आकांक्षाएं"।  
विज्ञापन
विज्ञापन

भाजपा के राष्ट्रीय महसचिव (संगठन) बी एल संतोष ने भी ट्वीट कर कहा-  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में महिलाओं का सच्चा सशक्तिकरण उच्च स्तर पर है। 

इस बार संसद में भी पिछली बार के मुकाबले ज्यादा महिला सांसद चुन कर आई हैं। 17वीं लोकसभा में कुल 78 महिलाएं चुनी गईं।  भाजपा नेतृत्व ने 2014 के बाद से लेकर अब तक 8 महिलाओं को राज्यपाल और एलजी बनाया है। जबकि मनमोहन सिंह के 10 साल की सरकार में 6 महिलाओं को राज्यपाल और एलजी बनाया था।  अब टीम मोदी में नारी शक्ति बढ़ गई है। नारी शक्ति के जरिए आने वाले चुनाव में महिला मतदाताओं को साधने की एक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। 
अधिक से अधिक महिलाओं को चुनाव में टिकट देने की कोशिश करना और उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करने की आकांक्षा यह भाजपा की नेतृत्व वाली सरकार का सुधारवादी कदम है या चुनावी जरुरत जिसने पार्टी नेतृत्व को महिलाओं की भागादारी बढ़ाने के लिए मजबूर किया है।

आधी आबादी का जिसे मिला साथ, उसकी नैया लगी पार
अब सत्ता की चाभी आधी आबादी के हाथ में है। यह बात कहीं न कहीं सच साबित होती है।  पिछले कुछ चुनावों पर नजर डालें तो बड़ी तादाद में महिलाएं वोट देने के लिए घरों से निकल रही हैं। आमतौर पर यह देखने को मिल रहा है कि मतदान करने में महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में बेहतर हो रहा है. एक दिलचस्प आंकड़ें के मुताबिक पिछले 57 वर्षों में महिलाओं के वोट प्रतिशत में करीब 19 फीसदी का इजाफा हुआ है। जबकि पुरुषों के मतदान प्रतिशत में बमुश्किल चार फीसदी का इजाफा हुआ है। इस वजह से महिला वोट बैंक एक अहम मुद्दा साबित हो रहा है और राजनीतिक दल महिला मतदाताओं को एक उभरते हुए निर्वाचन क्षेत्र के रूप में देख रहा है। 

2019 के लोकसभा चुनाव में आधी-आबादी ने भाजपा पर भरोसा जताया था। भाजपा नेतृत्व भी इस बात को गहराई से समझता है कि आधी आबादी में विश्वास की भावना जगाए बगैर सत्ता को पाना मुश्किल है। इसलिए माना जा रहा है कि मोदी मत्रिमंडल में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के पीछे कहीं न कहीं हालिया विधानसभा चुनाव के परिणाम हैं जिसमें महिला मतदाताओं की अच्छी भागादारी रही है।

कहीं हालिया विधानसभा चुनाव का परिणाम एक बड़ा कारण तो नहीं
हाल के दो विधानसभा चुनावों पर गौर करें तो देखते हैं कि महिलाओं के हितों में उठाए गए कदमों के कारण यहां  महिलाओं ने राज्यों में सत्तारूढ़ दलों के परिणामों को काफी हद तक प्रभावित किया है। जैसे नीतीश कुमार बिहार में अपना महिला वोट आधार बनाए रखने में कामयाब रहे, वहीं ममता बनर्जी ने भाजपा के साथ कड़ी लड़ाई के बावजूद पश्चिम बंगाल में शानदार जीत दर्ज की। इन दोनों मुख्यमंत्रियों ने महिलाओं के लिए कई योजनाएं चलाई और उनके हितों का ध्यान रखा जिससे बड़ी तादाद में महिलाओं ने उन्हें वोट किया। 

नीतीश, ममता पर महिला मतदाता रहीं मेहरबान
माना जाता है कि नीतीश कुमार पर महिला मतदाताओं की मेहरबानी बनी रहती है। नीतीश भी लंबे समय से महिला वोटरों की अहमियत समझ रहे हैं और वे बिहार में अपने महिला मतदाताओं को मजबूती से जोड़े रखना चाहते हैं. इसलिए चुनाव जीतने के बाद उन्होंने एक के बाद एक ऐसे सुधारवादी फैसले लिए हैं जिससे महिला मतदाताओं के बीच उनकी साख बनी रहे।

इस बार चुनाव जीतने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री ने बिहार के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज में लड़कियों के लिए आरक्षण देने के बाद उन्होंने जदयू में भी महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीट आरक्षित कर दी है। जदयू का दावा है कि देश में वही एकमात्र पार्टी है जिसने महिलाओं को आरक्षण दिया है। इससे पहले पंचायतों और सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं को आरक्षण देकर वे महिला मतदाताओं का विश्वास हासिल कर चुके हैं। 

इसी तरह ममता बनर्जी को भी आधी आबादी का पूरा साथ मिला है। ममता ने महिलाओं और कन्याओं के लिए कन्याश्री, रूपाश्री, मातृत्व/शिशु देखभाल योजना, शिक्षा और विवाह के लिए नकद राशि का भुगतान, छात्राओं को मुफ्त साइकिल देना, विधवा पेंशन जैसी कई छोटी-बड़ी योजनाएं चलाईं जिससे महिलाओं ने उन पर अपना भरोसा बरकरार रखा। वहीं ममता ने इस बार के विधानसभा चुनाव में 291 उम्मीदवारों में से 50 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था। कुल मिलाकर महिला सशक्तिकरण के लिए उठाए गए इन कदमों ने महिलाओ का दिल जीत लिया। हालांकि चुनाव के दौरान महिला वोटरों को रिझाने में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस में होड़ दिखी थी।  


गौतरब है कि मोदी मंत्रिमंडल में जिन सात नई महिला नेताओं को मंत्री बनाया गया है उनमें दिल्ली की मीनाक्षी लेखी, शोभा कारंदलजे, दर्शना जरदोश, अन्नपूर्णा देवी, प्रतिमा भौमिक, भारती पवार और अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल ने राज्य मंत्री के तौर पर शपथ ली। इनमें अनुप्रिया को छोड़कर सभी छह नेता पहली बार केंद्रीय मंत्री बनी हैं। अनुप्रिया मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री रह चुकी हैं। 


 




 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed