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सूखाः पानी की बेतहाशा जरूरत, सूखती जा रही धरती की कोख

Wed, 13 Apr 2016 11:07 AM IST
Updated Wed, 13 Apr 2016 11:07 AM IST
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In the lack of Water management, India faces drought in many states
जल संरंक्षण - फोटो : जल संरंक्षण

सुजलां सुफलां मलयज शीतलां शस्य श्यामलां मांतरम्....। ये पंक्ति एक ऐसे राष्ट्र की गौरव गाथा बयान करती है, जो लहलहाते खेतों, हरी-भरी वादियों, जलाशयों, झीलों और नदियों से भरा है। हालां‌कि वर्तमान समय में इसी देश की तस्वीर इस वाक्य से बिल्कुल उलट हो चुकी है। देश में भारी सूखे की स्थिति पैदा हो गई, जिससे 11 राज्य प्रभावित हैं। सबसे ज्यादा प्रभाव महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा, बुंदेलखंड, तेलंगाना और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में देखने को मिल रहा है। सूखे की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन इलाकों में रहने वाले लोगों को पीने का पानी भी नसीब नहीं हो रहा। बर्बाद हुई फसलों की अपनी ही कहानी है। 

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जमीन के अंदर पानी का जल स्तर नीचे जा चुका है, कुएं और हैंडपंप सूख गए हैं। तालाबों और नदियों का वजूद भी नजर नहीं आ रहा है। इस भयावह स्थिति का सामना करने के लिए सरकार की ओर से कुछ कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन वो पर्याप्त और दीर्घकालिक नहीं हैं। वैसे भी सूखे की समस्या से पहली बार देश का सामना नहीं हुआ है। इससे पहले भी कई बार देश को सूखे की मार झेलनी पड़ी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमने पिछले सूखे से हुई तबाहियों से कोई सबक नहीं लिया या अगर सीखा है तो फिर हमने उससे निपटने के लिए कोई ठोस कदम अब तक क्यों नहीं उठाया? और अगर उठाया भी है तो उसका लाभ जनता को क्यों नहीं मिला? देश को सूखे की मार से बचाने के लिए जल प्रबंधन जैसी चीजों की सख्त जरूरत है और पिछले कई दशकों से जल प्रबंधन के क्षेत्र में नई कामयाबियां हासिल करने का सरकारें दावा भी करती रही हैं।
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सूखे को लेकर देश भर में चिंता की लहर है। यह बेहद स्वाभाविक है। सूखे की मार झेल रहे लोगों के लिए सरकारी घोषणाएं भी हो रही हैं लेकिन जैसा ज्यादातर सरकारी घोषणाओं के साथ होता है, वैसा ही हश्र अगर इन घोषणाओं का भी हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सूखे को लेकर नीतियों का निर्धारण करने वाले लंबे-चौड़े बयान जरूर दे रहे हैं लेकिन बुनियादी सवालों की चर्चा करने से हर कोई कतरा रहा है। आखिर क्यों नहीं सोचा जा रहा है कि यह समस्या क्यों पैदा हुई? इस बात पर क्यों नहीं विचार किया जा रहा है कि इस तरह की समस्या का सामना करने के लिए सही रणनीति क्या होनी चाहिए और इसके लिए क्या तैयारी होनी चाहिए? जल प्रबंधन के मसले पर कहीं से काई आवाज नहीं आ रही है। एक आवाज आई भी है तो वह अपने देश से नहीं बल्कि सात समंदर पार अमेरिका से आई है। जी हां, समस्याएं भारत की होती हैं लेकिन उस पर शोध करने और उसके अध्ययन करने का काम भी यहां नहीं होता बल्कि इस काम को भी नासा जैसे किसी संस्था को अंजाम देना पड़ता है। नासा की यह रपट पानी को लेकर देश भर में बरती जा रही लापरवाही के प्रति आंखे खोलने वाली है।
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नासा की रिपोर्ट में सूखे की भयावह तस्वीर
नासा की रिपोर्ट के मुताबिक देश में जो भयावह सूखे की तस्वीर उभरकर सामने आई है उसके लिए जिम्मेवार कारणों में से एक अहम कारण अंधाधुंध जल दोहन को बताया गया है। इसमें देश के कई राज्यों नाम शामिल है जहां क्षमता से ज्यादा जल का दोहन होता है। नासा ने यह अध्ययन 2002 से 2008 के बीच की स्थितियों के आधार पर किया है। नासा ने अपनी रिपोर्ट में सूखे से निपटने के लिए जल प्रबंधन पर जोर दिया। नासा के मुताबिक अगर भारत को सूखे की समस्या से निजात पाना है तो उसे जल प्रबंधन की दिशा में तेजी से और ठोस काम करने की जरूरत है। नासा की यह रपट बताती है कि अंधाधुंध जल दोहन की वजह से पूरे उत्तर पश्चिम भारत के भूजल स्तर में हर साल 4 सेंटीमीटर यानी 1.6 इंच की कमी आ रही है। रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि देश के उत्तर पश्चिम क्षेत्र में 2002 से 2008 के दौरान तकरीबन 109 क्यूबिक किलोमीटर पानी की कमी हुई है। यह मात्रा कितनी अधिक है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह अमेरिका के सबसे बड़े जलाशय लेक मीड की क्षमता से दुगने से भी कहीं ज्यादा है। तो आइए जानते हैं आखिर क्या है यह जल प्रबंधन और यह कैसे सूखे से निपटने में मददगार साबित हो सकता है

वरदान साबित हो सकता है जल प्रबंधन

In the lack of Water management, India faces drought in many states
सूखा प्राकृतिक है या लोगों द्वारा पैदा किया गया? - फोटो : getty

जल प्रबंधन के तहत पानी के सुचारु इस्तेमाल, रख रखाव, जमाव और सही इस्तेमाल के तरीकों पर काम किया जाता है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत सरकारें कई स्तरों पर पीने योग्य पानी मुहैया कराने के लिए पानी के संवर्धन पर ध्यान देती है। साथ ही बाढ़, सूखे और भारी बारिश जैसी स्थिति में उससे कैसे निपटा जाए उस दिशा में भी काम किया जाता है। ठोस तौर पर देखा जाए तो यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत हर जरूरत के अनुसार उचित मात्रा में पानी मुहैया के कराने की व्यवस्था की जाती है। बात हो पीने के पानी की या फिर खेती के लिए पानी की। इस प्रबंधन के जरिए उन हर जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया जाता है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाज और उनके लोगों से जुटा हुआ है। इस प्रक्रिया में पानी के शोधन, दोहन, संरक्षण, वितरण और संवर्धन पर ध्यान दिया जाता है। मोटे तौर पर देखा जाए तो जल प्रबंधन मूल रूप से वर्षा जल पर आधारित है, जिसके तहत वर्षा जल को पूर्ण रूप से संरक्षित करने के तरीकों पर ध्यान दिया जाता है। 

हमारे देश में वर्षा को लेकर कई असमानताएं हैं। कहीं 1000 सेमी तक वर्षा होती है तो कहीं यह 50 का भी आंकड़ा पार नहीं कर पाती। जहां भारी मात्रा में वर्षा होती है वहां भी उस पानी को संरक्षित करने के लिए जल प्रबंधन की जरूरत है और जहां कम वर्षा होती है वहां भी इसकी जरूरत है। ऐसा माना जाता है कि धरती पर गिरने वाले वर्षा जल की प्रत्येक बूंद को रोका जा सकता है। बशर्ते इसके लिए संरचनाओं की ऐसी श्रृंखला तैयार कर दी जाए जिसकी मदद से पानी की एक भी बूंद 10 मीटर से अधिक दूरी पर न बहने पाएं। इस पानी को कोई जल संरचना रोक ले और धरती में अवशोषित कर ले यही संपूर्ण जल प्रबंधन है। जलग्रहण का सिद्धांत है कि ‘पानी दौड़े नहीं, चले’, जबकि संपूर्ण जल प्रबंधन का सिद्धान्त है कि ‘पानी न दौड़े न चले, बल्कि रेंगे और अंततः रुक जाये, और जमीन की गहराईयों में ऐसा समा जाये कि उसे सूरज की रोशनी भी उड़ा के न ले जाये।‘ वह जमीन के अंदर धीरे-धीरे चलता हुआ वहां निकले जहां हम चाहते हैं और वो जगह हैं कुएं, तालाब, हैंडपंप, ट्यूबवेल और नदी-नाले। इस तरह से हम आसानी से स्वच्छ और सुरक्षित जल प्राप्त कर सकते हैं।

इन संरचनाओं में 5 से 10 सें. मी. वर्षा जल एक बार में रोका जा सकता है। इससे अधिक वर्षा यदा-कदा ही दो-तीन वर्षों में एक बार होती है, और इतनी साल में तीन-चार बार। इस प्रकार संपूर्ण वर्षा में 100 सें. मी. तक की योग वर्षा को भूमि में अवशोषित किया जा सकता है। यह जल भूमि में अवशोषित होकर धीमी गति से कुंए, ट्यूबवेल, हेंडपंप व तालाबों में आगामी 6 माह से 12 माह तक प्राप्त होता रहता है। इससे हमारी खरीफ की फसल सुनिश्चित होती है, सुखे से मुक्ति मिलती है, रबी की फसल भी पर्याप्त होती है गर्मी में पेयजल संकट नहीं होता है।

पंचवर्षीय योजनाओं में दम घोटती जल प्रबंधन की योजनाएं

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कई किमी दूर से लाना पड़ता है पानी - फोटो : Getty

नासा के रिपोर्ट के इतर भारत में भी कई तरह के शोध कार्य किए गए हैं लेकिन वो केवल एक शोध कार्य बनकर ही रह गए हैं। हालांकि, सरकार ने अपनी बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) में जल प्रबंधन के जरिए देश में बढ़ती जनसंख्या और उससे उत्पन्न होने वाली पानी से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी उपायों पर जोर दिया है। इस पंचवर्षीय योजना में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि ग्रामीण इलाकों और कस्बों में पीने के साफ पानी और शौचालयों उचित व्यवस्था नहीं है, जिसकी वजह से शौचालयों के अपशिष्ट ने निकला पानी साफ पानी को प्रदूषित कर रहा है। योजना में भूजल स्तर बढ़ाने के लिए कदमों को उठाए जाने की सिफारिश की गई है, जिसमें भूजल जमा करने वाले पत्थरों का इस्तेमाल भी शामिल है। हालांकि, अब तक इस दिशा में कोई ठोस काम होता नजर नहीं आ रहा। अगर ऐसा होता तो देश को इस हद तक सूखे की मार नहीं झेलनी पड़ती।

अध्ययनों के मुताबिक साल 2031 में पानी की मांग मौजूदा मांग से 50 फीसदी ज्यादा रहने के आसार हैं। अगर देश को आर्थिक विकास के अनुमानित लक्ष्य को हासिल करना है तो पानी की इस बढ़ती मांग को पूरा करना जरूरी है। पानी के अतिरिक्त भंडारण और भूजल स्तर को कायम रखने के लिए कदम उठाए जाने से 20 फीसदी मांग को पूरा किया जा सकता है। बाकी मांग को पूरा करने के लिए पानी का किफायती इस्तेमाल करना होगा। पिछले 60 सालों में सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम पर किए जाने खर्च में काफी बढ़ोतरी हुई है। इनमें से कई सिंचाई योजनाएं पूंजी और समय की कमी की वजह से खटाई में पड़ गई हैं। इस वजह से बारहवीं पंचवर्षीय योजना में मौजूदा सिंचाई योजनाओं को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया है और जरूरत पड़ने पर ही नई सिंचाई योजनाएं लागू करने की सिफारिश की गई है। प्रबंधन के लिए नए कानून और नियम बनाने की जरूरत बताई गई है।

दरअसल, इस पूरी समस्या की जड़ में जल का सही प्रबंधन नहीं होना जिम्मेवार है। जब तक जल प्रबंधन की सही नीति नहीं बनाई जाएगी और उस पर उतनी ही तत्परता से अमल नहीं किया जाएगा तब तक इस समस्या का समाधान तो होने से रहा। देश हर दिन इस संकट से घिरता जा रहा है लेकिन सत्ताधीशों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। जल को लेकर एक खास तरह की उदासीनता का भाव सिर्फ सरकारी स्तर पर ही नहीं है बल्कि समाज में भी जल प्रबंधन को लेकर एक खास तरह की उदासीनता दिखती है। यही वजह है कि पानी की समस्या दिनोंदिन गहराती जा रही है। 

आंकड़े कहते हैं और भयावह हो रही है स्थिति

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जरूरत से ज्यादा हो रहा है पानी का दोहन - फोटो : Getty

एक आंकड़े के मुताबिक भारत में दुनिया का हर छठा आदमी रहता है। यानी कहा जाए तो दुनिया के कुल आबादी के तकरीबन सत्रह फीसदी लोग भारत में रहते हैं। जबकि दुनिया का महज साढ़े चार फीसदी पानी ही भारत में उपलब्ध है। ऐसे में जल समस्या से दो-चार होना कोई आनापेक्षित बात नहीं है। एक बात तो तय है कि प्राकृतिक संसाधनों में इजाफा तो नहीं किया जा सकता है लेकिन इसका संरक्षण अवश्य किया जा सकता है। एक अन्य आंकड़े के मुताबिक वर्ष 1984 में भूजल के मात्र 17 प्रतिशत दोहन की तुलना में आज करीब 138 प्रतिशत ज्यादा दोहन हो रहा है। यदि यही स्थिति रही तो वर्ष 2020 तक भूजल भंडार पूरी तरह से खाली हो जाएंगे। इस देश में 35.7 फीसदी लोग हैंड पंप से, 36.7 फीसदी लोग नल से, 18.2 फीसदी लोग तालाब, पोखर या झील से, 5.6 फीसदी कुओं से, 1.2 फीसदी लोग पारंपरिक साधनों से और 2.6 फीसदी लोग अन्य माध्यमों से पीने का पानी प्राप्त करते हैं। इस लिहाज से अगर देखा जाए तो जल संकट को दूर करने के लिए समग्र कार्ययोजना की जरूरत है।

आंकड़े की माने तो देश में करीब 20 से 25 करोड़ लोगों को पीने के स्वच्छ पानी भी नसीब नहीं हो रहा। आजादी के वक्त भारत में पांच हजार क्यूबिक मीटर पानी प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष उपलब्ध था वो अब घटकर 1800 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष ही रह गया है या फिर इससे भी कम। विशेषज्ञों की माने तो अगर इस पानी के बर्बादी का आलम यही रहा तो 2025 तक यह आंकड़ा घटकर हजार क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष ही रह जाएगा। उस समय तक पानी की उपलब्धता में आने वाली इस कमी की वजह से कृषि उत्पादन में तीस फीसदी की कमी आने की अाशंका है। इन परिस्थितियों में देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का क्या होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

अगर बात करें तकनीक की तो इस दिशा में भारत तेजी से अपने पैर आगे बढ़ा रहा है लेकिन जब विकास का पहिया तेजी से घूमने लगता है तो प्रकृति काफी पीछे छूट जाती है। ऐसे में प्रकृति हमारा पीछा करने की बजाय हमें पीछे खींचने की कोशिश करने लगती है। तकनीक के लगातार विकास के बावजूद भारत में जल संरक्षण के प्रति लोगों की उदासीनता बरकरार है। साथ ही इस कार्य के लिए आवश्यक तकनीक की भी कमी है। जो तकनीक उपलब्ध हैं उनसे सामान्य लोग अनजान हैं। बारिश के पानी का संग्रह करके उसे उपयोग में लाना एक अच्छा विकल्प है। पर इस तरह की कोशिश काफी सीमित मात्रा में काफी छोटे स्तर पर हो रही है। यही वजह है कि देश में होने वाली बारिश के पानी का अस्सी फीसदी हिस्सा आज भी समुद्र में पहुंच जाता है।

अगर मानसून के व्यवहार को देखा जाए तो भारत में कुल वार्षिक बारिश औसतन 1,170 मिमी होती है। इतनी भारी मात्रा में बारीश के जल का अगर आधा हिस्सा भी इस्तेमाल कर लिया जाए तो मौजूदा स्थिति में व्यापक बदलाव आने की संभावना जताई जा सकती है।

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