26/11 पीड़ित का दर्द : 8 साल, 100 चिट्ठियां, हजार वादों के बाद भी मिली बेबसी-लाचारी
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26/11 के आठ साल गुजर गए लेकिन 45 वर्षीय सबीरा खान को आज तक इंसाफ नहीं मिला। सबीरा अपने बड़े बेटे हामिद के साथ मुंबई के बीपीटी कॉलोनी में एक किराये के मकान में रहती हैं। आतंकवादी हमले के दौरान सबीरा बुरी तरह जख्मी हो गई थीं और वो लगभग 70 फीसदी विकलांग हो गई। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टर सुकृता बरुआ से बातचीत में सबीरा ने बताया कि इलाज के दौरान जो खर्च हुए, उसके लिए सैकड़ों चिट्ठियां अधिकारियों से लेकर कई नेताओं को लिख चुकी हूं लेकिन आश्वासन के अलावा कुछ भी नहीं मिला।
26/11 के रात सबीना ट्यूशन पढ़ाने के लिए गई थी। लौटते समय टैक्सी में जोरदार धमका हुआ और सबीरा बुरी तरह घायल हो गई। सबीरा ने बताया कि धमाका इतना जोरदार था कि लगभग 20 फीट दूर जाकर गिरी। इस दौरान मेरे शरीर से खून का फव्वारा निकल रहा था। खुशी-खुशी चल रही जिंदगी अब बैशाखी के सहारे जीवन गुजर बसर कर है।
सबीरा ने बताया कि इलाज के लिए दो महीनों तक सरकारी अस्पताल में पड़ा हुआ था, क्योंकि पैर में संक्रमण हो गया था। उसने बताया कि 6 ऑपरेशन के बाद बैशाखी के सहारे अब चल पाती हूं। इलाज में कम से कम 12 लाख रुपये खर्च हुए। सबीना और उसकी परिवार की सबसे बड़ी शिकायत है कि इलाज में खर्च हुए पैसे का आजतक मुआवजा नहीं मिला। उस दौरान कहा गया कि पीड़ित के एक परिजन को नौकरी और 3 लाख रुपये मुआवजा दिया जाएगा। लेकिन न नौकरी मिली और न ही मुआवजा।
सबीरा बोलीं- पैरों के नीचे दबी सारी खुशियां
सबीरा के परिवार का कहना है कि आतंकवाद में शिकार लोगों की राजनीतिक दल इस्तेमाल करते हैं। हामिद ने कहा, " जब कांग्रेस सत्ता में थी, एक बीजेपी नेता आए और मुआवजे की मांग करने के लिए अन्य पीड़ितों के साथ-साथ मंत्रालय में मेरी मां को ले गए। उस समय वो आश्वासन दिया कि जब बीजेपी सरकार में आएगी तो वो हमारी हर कीमत पर ख्याल करेंगे। लेकिन आज उनकी पार्टी सता में है, संपर्क करने की कोशिश की तो बताया जाता है वो अभी दिल्ली में हैं।"
हामिद ने दावा किया कि अबतक 100 से ज्यादा पत्र विभिन्न अधिकारियों को लिख चुके हैं। लेकिन आजतक केवल आश्वसन ही मिला। सबीरा ने बताया कि इलाज के दौरान अस्पताल में मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल आई थीं। सबने वादा किया था कि सरकारी या प्राइवेज अस्पताल में इलाज में खर्च किए गए पैसे मिल जाएंगे। लेकिन नहीं मिला।
सबीरा रोते हुए बोलती हैं कि आज मेरे पैरों के नीचे सारी खुशियां दबी हुई हैं। मेरे पास बेबसी और लाचारी के अलावा कुछ भी नहीं हैं। उसने कहा कि मैं फिर से बच्चों को पढ़ाना चाहती हूं।