करतारपुर साहिब कॉरिडोर खोलने को पाक राजी, पढ़िए कॉरीडोर से जुड़ी कई अहम जानकारी
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भारत और पाकिस्तान के दरकते रिश्तों के बीच एक खास खबर आई है। पाकिस्तान में कांग्रेस सांसद नवजोत सिंह सिद्धू की 'हग डिप्लोमेसी' का बड़ा असर हुआ है। पाकिस्तान आखिरकार पंजाब में स्थित करतारपुर साहिब कॉरीडोर को भारत में रहने वाले सिख समुदाय के लिए खोलने को राजी हो गया है।
हालांकि, अभी इस पर भारत सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री फवाद चौधरी के श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व पर करतारपुर कॉरीडोर खोलने के एलान से गदगद सिद्धू ने कहा कि अब जीवन में कुछ नहीं चाहिए, यह सबसे बड़ी तृप्ति है।
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अब से भारत के सिख बिना वीजा दर्शन के लिए जा सकेंगे। आपको बताते हैं आखिर क्या है सिख समुदाय के लिए करतारपुर साहिब कॉरीडोर की अहमियत और क्यों यह दोनों देशों के बीच हाल ही में राजनीति का मुद्दा बन गया है।
गुरु नानक देव जी ने आखिरी 17 साल यहीं बिताए थे
सिख धर्म के प्रथम गुरु नानक देव जी की 16वीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले भाई सुखदेव सिंह कहना है कि बाबा नानक ने अपनी जिंदगी के आखिरी 17 साल 5 महीने 9 दिन करतार साहिब में ही गुजारे थे। उनका सारा परिवार यहीं आकर बस गया था। उनके माता पिता का देहांत भी इसी जगह पर हुआ। इस लिहाज से यह पवित्र स्थल सिखों के मन से जुड़ा धार्मिक स्थान है।
पाकिस्तानी सरकार बना सकती है रास्ता
लाहौर निवासी इंजीनियर राय साहिब बताते हैं कि पाकिस्तान सरकार दोनों तरफ कंटीली बाढ़ लगाकर बीच में रास्ते का निर्माण कर सकती है। रावी पर जब तक पक्के पुल बनाया जा सकता है। इस तरह पाकिस्तान सरकार चाहे तो कु छ महीनों में ही इस प्रोजेक्ट का पूरा कर सकती है।
पाकिस्तान सरकार ने इस बात का इशारा दे ही दिया है कि गुरुद्वारे के दर्शन के लिए टिकट लगाई जाएगी। वास्तव में यह टिकट ही वीजा या परमिट का काम करेगी। हर श्रद्धालु को सुबह जाकर शाम तक लौटना होगा। करतारपुर में ही गुरुनानक साहब का समाधि स्थल है, जिसे करतारपुर साहिब के नाम से जाना जाता है।
करतारपुर साहिब कॉरीडोर क्यों है खास?
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास पाकिस्तान के जिला नारोवाल स्थित गुरुद्वारा साहिब सिख जगत का पहला गुरुद्वारा है। करतारपुर शहर की नींव भी उस समय श्री गुरु नानक देव जी ने रखी थी। उनका जन्म भले ही ननकाना साहिब में हुआ हो, लेकिन उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 18 साल इसी स्थान पर बिताए थे और 1539 में आखिरी सांस यहीं ली। इतना ही नहीं, गुरुनानक देव जी ने लंगर परंपरा की शुरूआत भी यही पर की थी। गुरुनानाक देव ने करतारपुर में सिख धर्म की स्थापना की थी।
भारत से श्रद्धालु सीमा से खड़े होकर ही करते हैं दर्शन
सिर्फ तीन किलोमीटर की दूरी यह श्राइन रावी नदी के करीब स्थित है और डेरा साहिब रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी चार किलोमीटर है। यह गुरुद्वारा भारत-पाकिस्तान सीमा से सिर्फ तीन किलोमीटर दूर है। श्राइन भारत की तरफ से साफ नजर आती है।
पाकिस्तानी अथॉरिटीज इस बात का ध्यान रखती है कि श्राइन के आस-पास घास न जमा हो पाए और वह समय-समय पर इसकी कटाई-छटाई करते रहते हैं ताकि इसे देखा जा सके। भारत की तरफ बसे श्रद्धालु सीमा पर खड़े होकर ही इसका दर्शन करते हैं। मई 2017 में अमेरिका स्थित एक एनजीओ इकोसिख ने श्राइन के आसपास 100 एकड़ की जमीन पर जंगल का प्रस्ताव भी दिया था।
करतारपुर कॉरीडोर खोलने की खबर का एसजीपीसी ने किया स्वागत
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) ने पाकिस्तान सरकार की तरफ से श्री गुरु नानक देव जी के 550वीं पुण्यतिथि पर करतारपुर साहिब कॉरीडोर खोलने के दिए बयान का स्वागत किया है। एसजीपीसी प्रधान भाई गोबिन्द सिंह लोंगोवाल ने कहा कि यदि करतारपुर कॉरीडोर खुल जाता है तो इसके साथ दोनों देशों की सिख संगत को फायदा होगा। भाई लोंगोवाल ने भारत सरकार को इस बारे में पाक सरकार से बातचीत करने की अपील की है। इस दौरान एसजीपीसी प्रधान ने पाक प्रधानमंत्री इमरान खान का भी धन्यवाद किया है।
पाकिस्तान के फैसले पर भारत का क्या रुख?
सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान की ओर से अभी तक कोई औपचारिक बयान नहीं आया है। पाकिस्तान की ओर बयान में मंशा जाहिर की गई है, इसके लिए एक औपचारिक प्रस्ताव की जरूरत होगी। कितने लोगों को वीजा दिया जाएगा, कितने यात्री जाएंगे ये सारी चीजें अभी कूटनीतिक स्तर पर तय होनी बाकी है। जब तक पाकिस्तान की ओर से कोई प्रस्ताव नहीं आता तब भारत की ओर इस पर कुछ भी नहीं कहा जाएगा।
खारिज कर दी गई थी कॉरिडोर की मांग
पटियाला के महाराजा ने दी रकम गुरुद्वारे की वर्तमान बिल्डिंग करीब 1,35,600 रुपए की लागत से तैयार हुई थी। इस रकम को पटियाल के महाराज सरदार भूपिंदर सिंह की ओर से दान में दिया गया था। बाद में साल 1995 में पाकिस्तान की सरकार ने इसकी मरम्मत कराई थी और साल 2004 में यह काम पूरा हो सका।
हालांकि इसके करीब स्थित रावी नदी इसकी देखभाल में कई मुश्किलें भी पैदा करती है। साल 2000 में पाकिस्तान ने भारत से आने वाले सिख श्रद्धालुओं को बॉर्डर पर एक पुल बनाकर वीजा फ्री एंट्री देने का फैसला किया था।
जुलाई 2012 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रमुख अवतार सिंह मक्कड़ ने कॉरिडोर खोलने की वकालत करते हुए कहा था कि पाकिस्तान ने 1999 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पाकिस्तान यात्री के वक्त इसे खोलने की पेशकश की थी, लेकिन भारत की तरफ से बात आगे नहीं बढ़ी।
स्थायी कॉरिडोर की मांग करने वालों की मांग उस समय टूट गई जब 2 जुलाई 2017 को शशि थरूर की अध्यक्षता वाले विदेश मामलों की सात सदस्यीय संसदीय समिति के सदस्यों ने इस कॉरिडोर की मांग को रद्द कर दिया था जिसमें यह कहा गया था कि मौजूदा राजनीतिक माहौल इस कॉरिडोर को बनाने के अनुकूल नहीं है।