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कैसे समाप्त हुई सिंधु घाटी की सभ्यता, IIT खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने किया खुलासा

Mon, 16 Apr 2018 06:02 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता Updated Mon, 16 Apr 2018 06:02 PM IST
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IIT Kharagpur found Indus Valley civilisation was wiped out because of 900-year-long drought
सूखा
सिंधु घाटी की सभ्यता के खत्म होने की वजह सूखा था। यह खुलासा किया है भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने। खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने शोध कर पता लगाया है कि 4350 साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता के खत्म होने की वजह सूखा बताते हुए लिखा है कि सभ्यता खत्म होने की वजह सूखा था जो कुछ साल  या दशक नहीं बल्कि पूरे 900 साल चला था। यही नहीं शोध में यह भी सामने आया है कि सबसे लंबा सूखा 200 साल पहले आया था।
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आईआईटी का यह शोध अतंरराष्ट्रीय एलसेवियर जरनल में पब्लिश की गई है। पिछले कई वर्षों से शोध कर रहे जियोलोजी और जियो फिजिक्स विभाग के शोधकर्ताओं ने करीब 5000 सालों के मॉनसून के पैटर्न को पढ़ा और पाया कि 900 साल पहले तक उत्तर पश्चिम हिमालय में बारिश न के बराबर हुई थी जिसकी वजह से घाटी की अधिकतर नदियां जो बारिश के कारण भरी रहती थीं सूख गईं। नदियों में पानी सूखने की वजह से घाटी में बसे लोग पूर्व और दक्षिण की ओर पानी की तलाश में चले गए जहां बारिश बेहतर होती थी। 
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शोध से जुड़े अनिल कुमाल गुप्ता ने बताया कि, टीम ने लेह-लद्दाख की मोरीरी झील की मैपिंग भी की और 5000 साल तक रहे मॉनसून के पैटर्न्स को भी पढ़ा। शोध में पाया गया कि 2,350 बीसी  यानी 4,350 साल पहले  से 1,450 बीसी तक, मॉनसून काफी कमजोर होने लगा था और फिर धीरे-धीरे सूखा पड़ने लगा।  ऐसे में लोग हरे इलाकों की ओर बढ़ने लगे थे। 
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गुप्ता ने बताया कि सिंधु नदी के पास बसने के कारण ही इस सभ्यता का नाम सिंधु घाटी सभ्यता पड़ा था लेकिन इसके निशान रावी, चिनाब, व्यास और सतलज के किनारे भी मिलते हैं। इन घाटियों से पलायन कर रहे लोग गंगा-यमुना घाटी की ओर पूर्व और केंद्रीय यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, विंध्याचल और गुजरात की बढ़ने लगे और बसने लगे थे। 


अपने अध्ययन के दौरान इस टीम ने पांच मीटर गहरे तलछट के भू-रासायनिक मापदंडों के आधार पर अध्ययन को आगे बढ़ाया। इनसे टीम को यह पता चला कि किस साल मानसून बढ़िया रहा था और किस साल खराब. शोधकर्ताओं ने तलछट के परत की हर पांच मिलीमीटर गहराई का अध्ययन किया। इससे आठ से 10 साल की समयावधि मानसून के चरित्र में बदलाव की जानकारी मिली। गुप्ता बताते हैं कि पांच हजार साल की समयावधि के दौरान मानसून के प्रकृति का पता लगाने के लिए कुल 520 नमूनों का बारीकी से अध्ययन किया गया।
 
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