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नई तकनीक: गन्ने के अपशिष्ट से तैयार होगा चीनी का सुरक्षित विकल्प, शोधकर्ताओं ने विकसित की उत्पादन की विधि
Thu, 22 Jun 2023 05:29 AM IST
वीरेंद्र शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: वीरेंद्र शर्मा
Updated Thu, 22 Jun 2023 05:29 AM IST
सार
डायबिटीज रोगियों के साथ-साथ अन्य लोगों में सफेद चीनी (सुक्रोज) के प्रतिकूल प्रभाव के बारे में बढ़ती जागरूकता की वजह से चीनी के सुरक्षित विकल्पों की खपत में वृद्धि हुई है।
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चीनी (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने गन्ने की खोई (पेराई के बाद बचे अवशेष) से जाइलिटोल नामक चीनी के सुरक्षित विकल्प का उत्पादन करने के लिए अल्ट्रासाउंड आधारित किण्वन (फर्मेंटेशन) विधि विकसित की है। यह विधि पारंपरिक किण्वन में लगने वाले समय को कम कर सकती है।
डायबिटीज रोगियों के साथ-साथ अन्य लोगों में सफेद चीनी (सुक्रोज) के प्रतिकूल प्रभाव के बारे में बढ़ती जागरूकता की वजह से चीनी के सुरक्षित विकल्पों की खपत में वृद्धि हुई है। जाइलिटोल प्राकृतिक उत्पादों से प्राप्त सुगर अल्कोहल है, जिसके एंटी-डायबिटिक और एंटी-ओबेसोजेनिक प्रभाव हो सकते हैं। जाइलिटोल एक हल्का प्री-बायोटिक है और दांतों के क्षरण को रोकने में मदद करता है।
48 की जगह 15 घंटे में किण्वन
शोधकर्ताओं के मुताबिक, अल्ट्रासाउंड के उपयोग से पारंपरिक तरीकों से लगने वाला लगभग 48 घंटे का किण्वन समय घटकर 15 घंटे का हो गया है और उत्पादन में भी लगभग 20% की वृद्धि हुई है। किण्वन के दौरान मात्र 1.5 घंटे के अल्ट्रासोनिकेशन का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है कि अधिक अल्ट्रासाउंड पावर की खपत नहीं होती है। किण्वन विधि से गन्ने की खोई से जाइलिटोल के उत्पादन को गन्ना उद्योग के लिए एक सकारात्मक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
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अल्ट्रासाउंड तरंगों से अधिक उत्पादन
शोधकर्ताओं का कहना है कि अल्ट्रासाउंड तरंगों के बिना प्रति ग्राम जाइलोस में केवल 0.53 ग्राम जाइलिटोल का उत्पादन होता है, लेकिन अल्ट्रासाउंड तरंगों के उपयोग से यह उत्पादन बढ़कर 0.61 ग्राम हो जाता है। इस प्रक्रिया में प्रति किलो खोई से 177 ग्राम जाइलिटोल का उत्पादन होता है। खमीर को पॉलीयूरेथेन फोम में स्थिर करके प्रति ग्राम जाइलोस पर उत्पादन को 0.66 ग्राम तक बढ़ाया जा सकता है।
रासायनिक प्रतिक्रिया से निर्मित
जाइलिटोल औद्योगिक रूप से एक रासायनिक प्रतिक्रिया से निर्मित होता है, जिसमें लकड़ी के व्युत्पन्न डी-जाइलोज को बहुत उच्च तापमान और दबाव पर निकल उत्प्रेरक के साथ उपचारित किया जाता है। डी-जाइलोज एक महंगा रसायन है। इस प्रक्रिया में अत्यधिक ऊर्जा की खपत होती है और जाइलोज की केवल 8-15 फीसदी मात्रा ही जाइलिटोल में परिवर्तित हो पाती है। खास बात यह है कि किण्वन विधि काफी किफायती है।
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डायबिटीज रोगियों के साथ-साथ अन्य लोगों में सफेद चीनी (सुक्रोज) के प्रतिकूल प्रभाव के बारे में बढ़ती जागरूकता की वजह से चीनी के सुरक्षित विकल्पों की खपत में वृद्धि हुई है। जाइलिटोल प्राकृतिक उत्पादों से प्राप्त सुगर अल्कोहल है, जिसके एंटी-डायबिटिक और एंटी-ओबेसोजेनिक प्रभाव हो सकते हैं। जाइलिटोल एक हल्का प्री-बायोटिक है और दांतों के क्षरण को रोकने में मदद करता है।
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48 की जगह 15 घंटे में किण्वन
शोधकर्ताओं के मुताबिक, अल्ट्रासाउंड के उपयोग से पारंपरिक तरीकों से लगने वाला लगभग 48 घंटे का किण्वन समय घटकर 15 घंटे का हो गया है और उत्पादन में भी लगभग 20% की वृद्धि हुई है। किण्वन के दौरान मात्र 1.5 घंटे के अल्ट्रासोनिकेशन का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है कि अधिक अल्ट्रासाउंड पावर की खपत नहीं होती है। किण्वन विधि से गन्ने की खोई से जाइलिटोल के उत्पादन को गन्ना उद्योग के लिए एक सकारात्मक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
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अल्ट्रासाउंड तरंगों से अधिक उत्पादन
शोधकर्ताओं का कहना है कि अल्ट्रासाउंड तरंगों के बिना प्रति ग्राम जाइलोस में केवल 0.53 ग्राम जाइलिटोल का उत्पादन होता है, लेकिन अल्ट्रासाउंड तरंगों के उपयोग से यह उत्पादन बढ़कर 0.61 ग्राम हो जाता है। इस प्रक्रिया में प्रति किलो खोई से 177 ग्राम जाइलिटोल का उत्पादन होता है। खमीर को पॉलीयूरेथेन फोम में स्थिर करके प्रति ग्राम जाइलोस पर उत्पादन को 0.66 ग्राम तक बढ़ाया जा सकता है।
रासायनिक प्रतिक्रिया से निर्मित
जाइलिटोल औद्योगिक रूप से एक रासायनिक प्रतिक्रिया से निर्मित होता है, जिसमें लकड़ी के व्युत्पन्न डी-जाइलोज को बहुत उच्च तापमान और दबाव पर निकल उत्प्रेरक के साथ उपचारित किया जाता है। डी-जाइलोज एक महंगा रसायन है। इस प्रक्रिया में अत्यधिक ऊर्जा की खपत होती है और जाइलोज की केवल 8-15 फीसदी मात्रा ही जाइलिटोल में परिवर्तित हो पाती है। खास बात यह है कि किण्वन विधि काफी किफायती है।